सुबह की हवा में हल्की ठंडक थी, लेकिन धूप सुनहरी और सुकून देने वाली थी।
बगीचे में पेड़ों की पत्तियाँ हवा के साथ झूम रही थीं, जैसे जीवन की लय में कोई संगीत चल रहा हो।
मैंने अपने छोटे से आँगन में झाड़ू लगाई, पौधों को पानी दिया, फिर एक कप चाय लेकर कुर्सी पर बैठ गई।
सालों बाद ऐसा लगा कि सुबह सच में सुबह है — बिना किसी चिंता, बिना किसी हड़बड़ी के।
कभी ये वही घर था जहाँ हर समय किसी ना किसी की आवाज गूँजती थी।
“माँ! मोज़े कहाँ हैं?”
“अम्मा, दवा दे दो!”
“माँजी, ज़रा पानी गर्म कर दो।”
और मैं सबकी जरूरत पूरी करते-करते, खुद से बहुत दूर निकल आई थी।
अब घर वही है, दीवारें वही हैं, पर आवाजें गायब हैं।
बच्चे सब अपने-अपने घरों में बस गए हैं, पति जी का देहांत हुए दो साल बीत गए, और सास-ससुर तो बहुत पहले ही चले गए थे।
अब कोई “अम्मा” या “माँजी” कहकर नहीं पुकारता।
जीवन की भागदौड़ में कभी अपने लिए वक्त निकालने का मौका ही नहीं मिला।
हर दिन किसी नई ज़रूरत, किसी नई परेशानी के साथ आता था।
सुबह से रात तक जिम्मेदारियाँ ही जिम्मेदारियाँ थीं — सास-ससुर के दवाइयों से लेकर बच्चों की पढ़ाई तक, और पति की सेवा से लेकर परिवार के खर्च तक।
अब जब सारी जिम्मेदारियाँ खत्म हो चुकी हैं, तो एक अजीब-सी शांति मिलती है — और कभी-कभी यही शांति बहुत भारी लगती है।
आज धूप बहुत सुंदर थी, जैसे खुद आसमान ने कहा हो — चलो, थोड़ा जी लो अब अपने लिए।
मैंने सोचा, “क्यों न आज पार्क चली जाऊँ, वही पुराना पार्क जहाँ बच्चों को झूला झुलाने जाती थी।”
पुराने दिनों की याद के साथ मैंने अपना दुपट्टा ठीक किया और निकल पड़ी।
रास्ते भर मन गुनगुना रहा था —
“पंछी बनूँ उड़ती फिरूँ मस्त गगन में…”
पार्क में कदम रखते ही जैसे बरसों पीछे लौट गई।
वहीं पुराना गुलमोहर का पेड़, जिसके नीचे कभी मैं और मेरे पति बैठकर बच्चों को खेलते देखते थे।
वहीं पत्थर की बेंच, जहाँ से मैं टिफिन निकालकर बच्चों को पराँठे खिलाया करती थी।
आज सब वही था, बस अब बच्चे नहीं थे, और मैं अकेली थी।
थोड़ी देर पार्क में टहलने के बाद नज़र सामने लगे झूले पर पड़ी।
वही झूला — जहाँ कभी मेरे बेटे झगड़ते थे,
“पहले मैं झूलूँगा!”
“नहीं, पहले मैं!”
आज झूला खाली था।
मैं मुस्कुरा दी।
सोचा, “चलो, आज मैं झूलती हूँ। इतने सालों तक दूसरों को झुलाया, अब खुद की बारी है।”
मैं झूले के पास गई और धीरे से हाथ रखकर बोली,
“चलो, आज का दिन अपने नाम करती हूँ।”
पर जैसे ही बैठने लगी, देखा कि झूले का एक पलड़ा टूटा हुआ है।
कुर्सी की तरह झूला अधूरा था।
मैं ठिठक गई —
उस पलड़े को देखकर ऐसा लगा, जैसे किसी ने मेरे अंदर की ही कहानी बोल दी हो।
अचानक हवा चली, और झूले की जंजीर हिली — एक खन-खन की आवाज के साथ।
मुझे लगा जैसे वो झूला बोल रहा हो —
“माँ जी, मेरी तरह… आपके भी मज़े करने के दिन लद गए।”
मेरी आँखों में आँसू आ गए।
सच ही तो कहा उस टूटे झूले ने —
सारी ज़िंदगी दूसरों के लिए दौड़ते-दौड़ते, अपने मज़े, अपनी इच्छाएँ तो कब की छूट गईं।
पर अगले ही पल, मैंने आँसू पोंछ दिए।
और हल्की मुस्कान के साथ फिर वही गीत गुनगुनाने लगी —
“पंछी बनूँ उड़ती फिरूँ मस्त गगन में…”
झूले ने जैसे पलटकर मुस्कुराया हो — “अभी बाकी है उड़ान, माँ जी!”
मैंने झूले को छोड़कर पार्क की पगडंडी पर टहलना शुरू किया।
रास्ते में फूल खिले थे — लाल, पीले, सफेद।
पास में कुछ बच्चे खेल रहे थे, और एक छोटी-सी लड़की अपनी माँ से बोली —
“मम्मी, ज़रा ज़ोर से झुलाओ न!”
उसकी हँसी की आवाज़ मेरे कानों में गूँज गई, जैसे जीवन का संगीत फिर से लौट आया हो।
तभी एक बुजुर्ग महिला पास आईं — उनके सफेद बाल हवा में लहरा रहे थे।
“बहन जी, रोज़ आती हैं क्या यहाँ?” उन्होंने पूछा।
“नहीं, आज बहुत दिनों बाद आई हूँ,” मैंने मुस्कुराकर जवाब दिया।
वो बोलीं —
“आया कीजिए, यहाँ सब अपने जैसे लोग हैं। कोई अपने बीते वक्त से बातें करता है, कोई यादों से।”
उनकी बात सुनकर मन हल्का हो गया।
सच ही तो था, जीवन का हर मोड़ हमें किसी नए अनुभव से मिलाता है।
हम दोनों ने साथ बैठकर चाय पी।
उन्होंने कहा —
“देखिए बहन, अब तो बच्चों का संसार अलग हो गया है। हमें भी अपने छोटे-छोटे सुख ढूँढने होंगे — जैसे यह धूप, यह हवा, यह पार्क। यही हमारी दुनिया है अब।”
मैंने सहमति में सिर हिलाया।
वो सही कह रही थीं — जीवन की उम्र भले बीत जाए, पर जीने की उम्र कभी खत्म नहीं होती।
घर लौटते वक्त मेरे कदम पहले से हल्के थे।
रास्ते में फूलों से भरी एक टोकरी खरीदी — सोचा, घर सजाऊँगी, जैसे कभी बच्चों के आने पर सजाती थी।
शाम को जब घर पहुँची, तो दरवाज़े पर लगी तस्वीर को देखा — मेरे पति की मुस्कुराती हुई तस्वीर।
मैंने मुस्कुराते हुए धीरे से कहा —
“आज झूला टूटा था, पर दिल नहीं टूटा। अब से हर दिन अपना होगा, अपने लिए।”
फिर वही गीत धीरे से होंठों पर आ गया —
“पंछी बनूँ उड़ती फिरूँ मस्त गगन में…”
और उस पल मुझे लगा,
धूप सच में सुनहरी नहीं थी —
वो तो मेरे भीतर की रौशनी थी,
जो बरसों बाद फिर से जगमगा उठी थी।
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