सुमन के लैपटॉप की स्क्रीन पर कर्सर लगातार ब्लिंक कर रहा था, ठीक उसकी धड़कनों की तरह। घड़ी की सुई रात के दो बजा रही थी, लेकिन उसकी आँखों में नींद का नामो-निशान नहीं था। कल 'स्काईलाइन प्रोजेक्ट' की फाइनल प्रेजेंटेशन थी। यह प्रोजेक्ट सुमन के करियर का सबसे बड़ा पड़ाव था। अगर यह डील पक्की हो गई, तो उसकी आर्किटेक्चर फर्म को शहर का सबसे प्रतिष्ठित कॉन्ट्रैक्ट मिल जाएगा।
उसने एक गहरी साँस ली और पानी पीने के लिए बोतल उठाई ही थी कि बगल के कमरे से सासू माँ, सावित्री देवी की खाँसने की आवाज़ आई। सुमन ने तुरंत लैपटॉप बंद किया, पानी का गिलास उठाया और दबे पाँव उनके कमरे की ओर बढ़ी।
सावित्री देवी जाग रही थीं। सुमन ने उन्हें पानी दिया और धीरे से पूछा, "माँजी, तबीयत ठीक नहीं लग रही? मैं बाम लगा दूँ?"
सावित्री देवी ने पानी पीकर गिलास थमाया और एक अजीब सी नाराज़गी के साथ बोलीं, "तबीयत तो ठीक है, पर मन भारी है। कल घर में 'कीर्तन' है और तू अभी तक लैपटॉप में सिर खपाए बैठी है। प्रसाद कौन बनाएगा? घर की साफ़-सफाई कौन देखेगा? रिश्तेदार आएंगे तो क्या कहेंगे कि बहू कमरे में बंद होकर कंप्यूटर चला रही है?"
सुमन का दिल बैठ गया। उसने बहुत ही विनम्रता से कहा, "माँजी, मैंने कामवाली बाई को सब समझा दिया है। प्रसाद के लिए हलवाई सुबह आ जाएगा। और मैं कल दोपहर तक वापस आ जाऊंगी। कल मेरी बहुत ज़रूरी मीटिंग है।"
सावित्री देवी ने चादर ओढ़ते हुए मुँह फेर लिया। "हाँ, हाँ... तुम्हारी तो हर मीटिंग ज़रूरी होती है। घर-गृहस्थी तो बस एक खेल है। जब मन किया खेल लिया, नहीं तो लैपटॉप खोल लिया।"
सुमन चुपचाप कमरे से बाहर आ गई। यह ताना नया नहीं था। पिछले पाँच सालों से, जब से वह ब्याह कर इस घर में आई थी, उसकी नौकरी को हमेशा 'शौक' या 'टाइम पास' का नाम दिया गया था। भले ही सुमन अपनी कमाई से घर की ईएमआई भरने में मदद करती थी, घर का राशन और बिजली का बिल भरती थी, लेकिन उसकी सास के लिए वह सिर्फ एक 'मदद' थी, कोई 'करियर' नहीं। रोहन, सुमन का पति, एक बैंक में मैनेजर था। उसकी नौकरी 'नौकरी' थी, और सुमन का आर्किटेक्चर का काम 'मन बहलाव'।
अगली सुबह घर में कोहराम मचा हुआ था। कीर्तन की तैयारियां चल रही थीं। सुमन ने अपनी सबसे सोबर साड़ी पहनी, बाल बांधे और अपना प्रेजेंटेशन फोल्डर उठाया। जैसे ही वह नाश्ते की टेबल पर पहुंची, माहौल तनावपूर्ण था।
सावित्री देवी सोफे पर बैठी थीं, चेहरा तमतमाया हुआ। रोहन चुपचाप चाय पी रहा था।
"सुमन," सावित्री देवी ने कड़क आवाज़ में कहा, "आज तुम ऑफिस नहीं जाओगी।"
सुमन के कदम ठिठक गए। "माँजी, मैंने बताया था न, आज बहुत बड़ा दिन है मेरे लिए।"
"कीर्तन से बड़ा?" सावित्री देवी ने सवाल दागा। "मेरी बहनें आ रही हैं, समाज की औरतें आ रही हैं। अगर बहू घर पर नहीं होगी, तो मेरी नाक कट जाएगी। वे पूछेंगी कि बहू कहाँ है, तो क्या कहूँगी? कि वो नक्शे बनाने गई है? रोहन की कमाई कम पड़ती है क्या जो तुम्हें धक्के खाने पड़ते हैं?"
सुमन ने रोहन की तरफ देखा, उम्मीद थी कि वह कुछ बोलेगा। रोहन ने नज़रें झुका लीं और धीरे से कहा, "सुमन, माँ सही कह रही हैं। आज रुक जाओ। प्रेजेंटेशन तो टीम का कोई और मेंबर भी दे सकता है। घर का मामला है, समझो थोड़ा।"
सुमन को लगा जैसे किसी ने उसका गला घोंट दिया हो। हर बार 'समझने' की ज़िम्मेदारी उसी की क्यों? जब रोहन का ऑडिट होता था, तो घर के सारे फंक्शन कैंसिल हो जाते थे। तब सावित्री देवी खुद कहती थीं, "डिस्टर्ब मत करो, लल्ला काम कर रहा है।" लेकिन सुमन का काम? वह तो बस नक्शे बनाना था।
घड़ी की सुई नौ बजा रही थी। मीटिंग दस बजे थी।
सुमन ने एक गहरा सांस ली। उसने अपना फोल्डर कसकर पकड़ा और पहली बार, बेहद शांत लेकिन दृढ़ आवाज़ में कहा, "माँजी, यह सिर्फ नक्शे बनाने का काम नहीं है। यह मेरी पहचान है। और आज मैं रुक नहीं सकती।"
सावित्री देवी सन्न रह गईं। चम्मच उनके हाथ से गिर गया। "क्या कहा? ज़बान लड़ाती है? मैंने कहा न, तुम नहीं जाओगी। अगर आज तुम इस घर की दहलीज पार करके गईं, तो समझ लेना कि इस घर में तुम्हारी कोई इज़्ज़त नहीं है।"
कमरे में सन्नाटा छा गया। रोहन भी खड़ा हो गया। "सुमन, पागल हो गई हो? माँ से कैसे बात कर रही हो?"
सुमन की आँखों में आँसू थे, पर आवाज़ में कंपन नहीं था। "रोहन, इज़्ज़त तो वैसे भी नहीं है। अगर होती, तो मेरी मेहनत को 'शौक' नहीं कहा जाता। मैं इस घर की बहू हूँ, इसका मतलब यह नहीं कि मैं 'सुमन' नहीं रही। मैंने पाँच साल मेहनत की है इस प्रोजेक्ट के लिए। यह मेरे अस्तित्व की लड़ाई है। अगर आज मैं रुक गई, तो मैं अपनी नज़रों में गिर जाऊंगी।"
सावित्री देवी ने गुस्से में कहा, "ठीक है, जा। देखूँगी कौन सा मेडल जीत कर लाती है। पर याद रखना, शाम को जब रिश्तेदार पूछेंगे, तो मैं कह दूँगी कि मेरी बहू को घर से ज़्यादा पैसों से प्यार है।"
सुमन के पास बहस करने का वक्त नहीं था। वह निकली, अपनी गाड़ी स्टार्ट की और आँखों से बहते आंसुओं को पोंछते हुए ऑफिस की तरफ बढ़ गई। रास्ते भर उसके कानों में सास के ताने और पति की चुप्पी गूंजती रही। उसे लग रहा था कि शायद उसने गलती कर दी। शायद उसे रुक जाना चाहिए था। क्या एक प्रोजेक्ट रिश्तों से बड़ा हो सकता है?
लेकिन जैसे ही वह कॉन्फ्रेंस रूम में दाखिल हुई, उसने खुद को संभाला। सामने बड़े-बड़े इन्वेस्टर्स बैठे थे। सुमन ने प्रेजेंटेशन शुरू की। अगले एक घंटे तक वह सिर्फ एक आर्किटेक्ट थी—आत्मविश्वास से भरी, अपने काम में माहिर। जब प्रेजेंटेशन खत्म हुई, तो हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। प्रोजेक्ट उन्हें मिल गया था।
शाम को जब सुमन घर लौटी, तो उसके कदम भारी थे। उसे पता था कि अंदर एक और महाभारत उसका इंतज़ार कर रही है। कीर्तन खत्म हो चुका था। कुछ रिश्तेदार अभी भी बैठे चाय पी रहे थे।
सुमन ने जैसे ही ड्राइंग रूम में कदम रखा, सब चुप हो गए। सावित्री देवी की बड़ी बहन, जो स्वभाव से बहुत कड़वी मानी जाती थीं, उन्होंने व्यंग्य से कहा, "लो, आ गई महारानी। अरे सावित्री, तेरी बहू तो बड़े लोगों में उठने-बैठने लगी है, हम गरीबों के कीर्तन में उसे कहाँ फुर्सत?"
सावित्री देवी कुछ बोलने ही वाली थीं कि तभी रोहन तेज़ी से कमरे में आया। उसके हाथ में शाम का अख़बार था (जो एक इवनिंग एडिशन था) और उसका चेहरा एक अजीब से भाव से भरा था—गर्व और शर्मिंदगी का मिश्रण।
वह सीधा सावित्री देवी के पास गया और अख़बार उनके सामने खोलकर रख दिया।
"यह देखो माँ," रोहन ने कहा।
सावित्री देवी ने चश्मा ठीक करते हुए देखा। अख़बार के फ्रंट पेज पर एक फोटो थी—सुमन की, शहर के मेयर के साथ। हेडिंग थी: "शहर के सबसे बड़े इको-फ्रेंडली प्रोजेक्ट की ज़िम्मेदारी युवा आर्किटेक्ट सुमन शर्मा को मिली।"
सावित्री देवी ने पढ़ा, फिर फोटो देखी। फोटो में सुमन के चेहरे पर जो आत्मविश्वास था, वह उन्होंने इस घर में कभी नहीं देखा था।
रोहन ने धीमी आवाज़ में कहा, "माँ, जिस प्रोजेक्ट के लिए सुमन आज गई थी, वह 500 करोड़ का प्रोजेक्ट है। पूरा शहर इसकी चर्चा कर रहा है। आज ऑफिस में मेरे बॉस ने मुझे बधाई दी कि मेरी पत्नी इतनी काबिल है। और हम... हम उसे यहाँ हलवा पूरी तलने के लिए रोक रहे थे।"
कमरे में सन्नाटा छा गया। मौसी ने भी अपनी नाक सिकोड़नी बंद कर दी और फोटो को गौर से देखने लगीं।
सुमन दरवाजे पर खड़ी थी, डरी हुई कि अब क्या तमाशा होगा।
सावित्री देवी उठीं। वे धीरे-धीरे सुमन की ओर बढ़ीं। सुमन ने अपनी नज़रें झुका लीं, उसे लगा कि डांट पड़ेगी।
लेकिन सावित्री देवी ने सुमन का हाथ पकड़ा और उसे कमरे के बीच में ले आईं। उन्होंने अपनी बहन से कहा, "जीजी, तुम पूछ रही थी न कि बहू कीर्तन में क्यों नहीं थी? वो इसलिए नहीं थी क्योंकि वो शहर का नक्शा बदलने गई थी। मेरी बहू सिर्फ रोटियाँ नहीं बेलती, वो इमारतें खड़ी करती है।"
सुमन ने झटके से सिर ऊपर उठाया। उसे अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ।
सावित्री देवी की आँखों में नमी थी। उन्होंने सुमन के सिर पर हाथ रखा। "मुझे माफ कर दे बेटा। मैं अपनी पुरानी सोच की चारदीवारी में तुझे भी कैद करना चाह रही थी। मुझे लगा था कि औरत का मान सिर्फ घर संभालने में है। पर आज जब रोहन ने बताया कि बाहर दुनिया तुझे कितना सलाम करती है, तो मुझे अपनी गलती का अहसास हुआ। मैं तुझे 'गृहलक्ष्मी' बनाकर रखना चाहती थी, पर तू तो 'शक्ति' निकली।"
रोहन भी पास आया। उसने सुमन का हाथ थामते हुए कहा, "सॉरी सुमन। मैं भी माँ की हाँ में हाँ मिलाता रहा। मैं भूल गया था कि तुम्हारी कामयाबी मेरी नाकामी नहीं, बल्कि हमारा गर्व है।"
सुमन के सब्र का बांध टूट गया और वह रो पड़ी। यह आँसू दुख के नहीं, बल्कि उस सुकून के थे जो पहचान मिलने पर आता है।
उस रात के बाद घर का माहौल बदल गया। ऐसा नहीं था कि सुमन ने घर का काम छोड़ दिया, या सावित्री देवी ने पूजा-पाठ बंद कर दिया। लेकिन अब 'प्राथमिकताएं' बदल गई थीं। अब अगर सुमन कहती कि "मीटिंग है," तो सावित्री देवी खुद चाय बनाकर लातीं और कहतीं, "तू तैयारी कर, बाकी मैं देख लूँगी।"
यह कहानी सिर्फ सुमन की जीत की नहीं है। यह उस बदलाव की कहानी है जो तब आता है जब हम अपनी लकीर खुद खींचने की हिम्मत करते हैं। अक्सर औरतें 'शांति' बनाए रखने के लिए अपने सपनों की बलि दे देती हैं, यह सोचकर कि झुकना ही बड़प्पन है। लेकिन कभी-कभी, अपनों को यह समझाने के लिए कि आप कौन हैं, आपको अपनी आवाज़ उठानी पड़ती है।
क्योंकि सम्मान मांगा नहीं जाता, कमाया जाता है—चाहे वो ऑफिस का बोर्डरूम हो या घर का ड्राइंगरूम। और जिस दिन सास अपनी बहू की उड़ान में अपनी जीत देखने लगे, उस दिन घर सिर्फ ईंट-गारे का मकान नहीं, बल्कि एक मंदिर बन जाता है।
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