चाबियों के गुच्छे में दबी पायल

 उस पुराने और रईस बंगले 'शांति-कुंज' में शांति तो बहुत थी, लेकिन वो शांति सुकून वाली नहीं, बल्कि एक भारी सन्नाटे जैसी थी। इस घर की मालकिन, सुनंदा देवी, अपने उसूलों की उतनी ही पक्की थीं जितनी कि इस घर की दीवारें मजबूत थीं। सुबह पांच बजे उठना, नहा-धोकर पूजा करना, और फिर कमर में चाबियों का भारी गुच्छा लटकाकर पूरे घर का मुआयना करना—यह उनकी दिनचर्या थी जो पिछले पैंतीस सालों से नहीं बदली थी।

रिया जब ब्याह कर इस घर में आई, तो उसे लगा जैसे वह किसी घर में नहीं, बल्कि सेना की छावनी में आ गई है। उसके पति, समीर, अपनी माँ के सामने नज़रें उठाकर बात नहीं करते थे। घर में हँसना मना नहीं था, लेकिन ठहाके लगाना बेअदबी माना जाता था। डाइनिंग टेबल पर सिर्फ चम्मचों की आवाज़ आती थी। सुनंदा देवी का व्यक्तित्व ही ऐसा था—चेहरे पर एक सख्त गंभीरता, माथे पर बड़ी सी बिंदी और आँखों में ऐसा अनुशासन कि सामने वाला अपनी बात भूल जाए।

रिया एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर थी, चंचल और खुले विचारों की। उसे यह माहौल घोटने लगा था। उसे लगता था कि सासू माँ उसे पसंद नहीं करतीं। सुनंदा जी अक्सर रिया के कपड़ों, उसके उठने के समय या उसके खाने के तरीके पर बारीक टिप्पणियां करती थीं। "रिया, साड़ी का पल्लू ठीक से रखो," या "हमारे घर में बहुएं इतनी ज़ोर से नहीं बोलतीं।"

रिया अक्सर समीर से शिकायत करती, "समीर, माँ जी के अंदर दिल है भी या नहीं? वो तो बस नियम-कानून की मशीन लगती हैं। कभी मुस्कुराती नहीं, कभी प्यार से सिर पर हाथ नहीं फेरतीं। मुझे लगता है मैं यहाँ कभी फिट नहीं हो पाऊँगी।"

समीर समझाता, "रिया, माँ ने पिता जी के जाने के बाद अकेले ही सब संभाला है। उन्होंने खुद को सख्त बना लिया ताकि दुनिया उन्हें तोड़ न सके। उन्हें समय दो।"

लेकिन समय बीतता गया और दूरियां जस की तस रहीं। सुनंदा देवी अपनी सत्ता और चाबियों के गुच्छे के साथ घर चलाती रहीं, और रिया एक आज्ञाकारी बहू की तरह अपनी आज़ादी और मुस्कान को कहीं दबाकर जीती रही।

एक रविवार की दोपहर, घर में सफेदी का काम चल रहा था। पुराने स्टोर रूम से सामान बाहर निकाला जा रहा था। रिया निगरानी कर रही थी ताकि मज़दूर कुछ तोड़ न दें। तभी एक पुरानी, धूल से सनी लकड़ी की संदूकची पर उसकी नज़र पड़ी। उस पर पीतल की नक्काशी थी। मज़दूर उसे बाहर फेंकने ही वाला था कि रिया ने रोक दिया।

"इसे रहने दो, मैं देखूँगी," रिया ने कहा।

जब रिया ने उस संदूकची को कपड़े से साफ़ किया और खोला, तो वह हैरान रह गई। उसके अंदर पुराने ज़माने की रेशमी साड़ियाँ, कुछ पुरस्कार और सबसे नीचे मखमली कपड़े में लिपटी हुई एक जोड़ी 'घुंघरू' थे। घुंघरू पुराने ज़रूर थे, लेकिन उनकी चमक बता रही थी कि कभी उन्हें बहुत प्यार से सहेजा गया था। साथ में एक पुरानी ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीर थी—जिसमें एक युवती मंच पर कत्थक की मुद्रा में खड़ी थी। वह युवती कोई और नहीं, सुनंदा देवी थीं। चेहरे पर वही तेज़, लेकिन आँखों में कठोरता की जगह एक असीम चमक और होठों पर एक ऐसी मुस्कान जो रिया ने आज तक सासू माँ के चेहरे पर नहीं देखी थी।

रिया के हाथ कांपने लगे। वह 'हिटलर' सासू माँ, जो ज़ोर से बोलने पर भी टोक देती थीं, कभी नृत्यांगना थीं? उसने समीर को तस्वीर दिखाई। समीर भी हैरान था, "मुझे तो याद भी नहीं। माँ ने कभी ज़िक्र नहीं किया। मैंने तो उन्हें हमेशा हिसाब-किताब करते ही देखा है।"

उस शाम, रिया ने एक ख़ामोश प्रयोग किया। वह अपने कमरे में लैपटॉप पर काम कर रही थी, लेकिन उसने जानबूझकर स्पीकर पर पंडित बिरजू महाराज की ठुमरी धीमी आवाज़ में लगा दी।

सुनंदा देवी, जो रोज़ की तरह राउंड पर थीं, रिया के कमरे के बाहर से गुज़रीं। संगीत की आवाज़ सुनकर उनके कदम ठिठक गए। रिया कनखियों से देख रही थी। सुनंदा जी दरवाज़े पर खड़ी रहीं। उनका हाथ, जो हमेशा चाबियों के गुच्छे पर रहता था, अनजाने में ही अपनी साड़ी की प्लीट्स पर थिरकने लगा। उनकी उंगलियाँ हवा में ताल देने लगीं। कुछ पल के लिए, उनके चेहरे की सख्ती पिघल गई। एक गहरी सांस लेकर, उन्होंने खुद को समेटा और वहां से तेज़ी से चली गईं, जैसे कोई चोरी करते पकड़ा गया हो।

रिया समझ गई कि राख के नीचे चिंगारी अभी बुझी नहीं है।

अगले दिन, रिया ने हिम्मत जुटाई। शाम की चाय के वक़्त, जब सुनंदा जी बालकनी में बैठी थीं, रिया उनके पास गई और चुपचाप वह पुरानी तस्वीर उनके सामने रख दी।

सुनंदा जी ने तस्वीर देखी और एकदम से सन्न रह गईं। उन्होंने झपटकर तस्वीर उठाई, जैसे रिया ने उनका कोई नग्न सच देख लिया हो।

"यह तुम्हें कहाँ मिली? किसने कहा था स्टोर रूम कुरेदने को?" उनकी आवाज़ में गुस्सा था, पर आँखों में घबराहट।

"माँ जी," रिया ने डरते हुए पर दृढ़ता से कहा, "गुस्सा मत कीजिये। बस यह बता दीजिये... यह मुस्कान कहाँ खो गई? यह घुंघरू खामोश क्यों हो गए?"

सुनंदा जी ने चेहरा फेर लिया। "वह कल था, रिया। शादी के बाद घर-गृहस्थी, समीर के पिता की बीमारी, फिर उनकी मौत... ज़िम्मेदारियां इतनी थीं कि पैरों की थिरकन के लिए जगह ही नहीं बची। इस घर की इज़्ज़त और रूतबा संभालने के लिए मुझे पत्थर बनना पड़ा। नाचने वाली बहू को उस ज़माने में कौन इज़्ज़त देता? जाओ, ले जाओ इसे और फेंक दो। अब इन पुरानी यादों का कोई काम नहीं।"

"काम क्यों नहीं है माँ जी?" रिया ने पूछा। "क्या घर संभालने का मतलब खुद को मार देना होता है? आप आज भी वही हैं। मैंने देखा था कल आपको संगीत सुनते हुए।"

"बहस मत करो रिया!" सुनंदा जी उठ खड़ी हुईं, चाबियों का गुच्छा ज़ोर से खनखनाया। "मैं अब 'शांति-कुंज' की मालकिन हूँ, कोई नचनिया नहीं। मेरे पैर अब चलने में भी दुखते हैं, नाचना तो दूर की बात है।"

रिया उस दिन चुप हो गई, लेकिन उसने हार नहीं मानी। उसे पता चल गया था कि सुनंदा जी का गुस्सा रिया पर नहीं, बल्कि अपने उन अधूरे सपनों पर है जिनकी उन्होंने कुर्बानी दी थी।

रिया ने एक योजना बनाई। अगले महीने समीर की कंपनी की तरफ से एक बड़ा फैमिली फंक्शन था। उसमें टैलेंट राउंड भी होना था। रिया ने अपना नाम लिखवाया, लेकिन तैयारी कुछ और ही थी।

उसने घर में एक तबला वादक की रिकॉर्डिंग चलानी शुरू की। वह सुबह-शाम अपने कमरे में रियाज़ करने का नाटक करती। वह जानबूझकर ताल में गलती करती। "धिन-ना, धिन-ना..." और फिर "धिन-धिन..." वह गलत बीट पकड़ती।

सुनंदा जी अपने कमरे में बैठीं यह सुनती रहतीं। एक दिन, दो दिन... तीसरे दिन उनसे रहा नहीं गया। जब रिया फिर से गलत ताल बजा रही थी, सुनंदा जी तेज़ी से उसके कमरे में आईं।

"अरे! क्या कर रही हो? तीन दिन से देख रही हूँ, एक साधारण सी 'तीन ताल' तुमसे नहीं पकड़ी जा रही। कान हैं या नहीं तुम्हारे पास?"

रिया ने मासूमियत से कहा, "माँ जी, बहुत कोशिश कर रही हूँ, पर यह 'सम' पर आना मुझे समझ ही नहीं आ रहा। ऑफिस के काम के साथ डांस सीखना बहुत मुश्किल है। सोचती हूँ नाम वापस ले लूँ। मेरी वजह से समीर की नाक कट जाएगी पार्टी में।"

सुनंदा जी के माथे पर लकीरें खिंच गईं। "नाक नहीं कटने दूंगी। हमारे घर की बहू स्टेज पर मज़ाक का पात्र बने, यह मुझे बर्दाश नहीं।" उन्होंने गहरी सांस ली, कमरे का दरवाज़ा बंद किया और बोलीं, "इधर हटो। ध्यान से देखो।"

साठ साल की सुनंदा देवी ने अपनी साड़ी का पल्लू कमर में खोंसा। उन्होंने रिया को तबला बजाने (रिकॉर्डिंग) को कहा। जैसे ही संगीत शुरू हुआ, रिया ने देखा कि वह बूढ़ा, थका हुआ शरीर अचानक बदल गया। उनके खड़े होने का अंदाज़, उनकी गर्दन का घुमाव... सब कुछ नपा-तुला था।

"धा धिन धिन धा..."

सुनंदा जी ने सिर्फ़ पैरों से थाप दी, और कमरे की फिज़ा बदल गई। उन्होंने रिया को बताया, "यहाँ रुकना है, यहाँ सांस लेनी है, और यहाँ आँखों से बात करनी है।"

वह शाम उस घर के इतिहास में दर्ज हो गई। रोज़ शाम को एक घंटा 'रियाज़' का समय बन गया। दरवाज़े बंद रहते, और अंदर सास-बहू के बीच एक नया रिश्ता बुन रहा था। अब सुनंदा जी सिर्फ़ गलतियां नहीं निकालती थीं, बल्कि करके दिखाती थीं। रिया ने देखा कि अभ्यास के बाद सुनंदा जी के चेहरे पर जो पसीना होता था, वह उन्हें थकान नहीं, बल्कि सुकून देता था।

पार्टी का दिन आ गया। रिया ने एक खूबसूरत अनारकली सूट पहना था। स्टेज पर उसका नाम पुकारा गया। रिया माइक पर गई।

"आज मैं परफॉर्म नहीं करूँगी," रिया ने कहा। हॉल में सन्नाटा छा गया। समीर भी हैरान था।

"आज मेरे गुरु परफॉर्म करेंगे, जिन्होंने मुझे सिखाया है कि कला उम्र की मोहताज नहीं होती, और ज़िम्मेदारियां सपनों का अंत नहीं होतीं।"

स्टेज की लाइट्स डिम हुईं और स्पॉटलाइट एक कोने में खड़ी सुनंदा देवी पर पड़ीं। उन्होंने वही पुरानी साड़ी पहनी थी जो संदूकची से निकली थी। पैरों में वही पुराने घुंघरू बंधे थे। पहले तो वह हिचकिचाईं। उनकी नज़रें सामने बैठे समीर और समाज के लोगों पर थीं। उन्हें लगा कि लोग क्या कहेंगे—बुढ़िया सठिया गई है?

तभी रिया ने विंग्स से धीरे से कहा, "माँ जी, आज चाबियों का शोर नहीं, घुंघरुओं की आवाज़ चाहिए। अपने लिए... बस अपने लिए।"

संगीत शुरू हुआ। शुरुआत धीमी थी, लेकिन जैसे-जैसे 'तराना' बढ़ा, सुनंदा देवी भूल गईं कि वो कहाँ हैं। वे भूल गईं कि वे सास हैं, विधवा हैं, या घर की मालकिन हैं। वो बस 'सुनंदा' थीं। उनके पैरों की थिरकन में पैंतीस साल का दबा हुआ तूफ़ान था। उनकी मुद्राओं में वो दर्द था जो उन्होंने कभी किसी से नहीं कहा।

जब परफॉर्मेंस खत्म हुई, तो हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। लोग खड़े होकर तालियां बजा रहे थे। समीर की आँखों से आंसू बह रहे थे। वह दौड़कर स्टेज पर गया और माँ के पैरों में गिर पड़ा। "माँ, आप इतनी अद्भुत हैं, मुझे पता ही नहीं था।"

सुनंदा जी की सांस फूल रही थी, लेकिन उनका चेहरा दमक रहा था। उन्होंने समीर को उठाया और गले लगा लिया।

अगली सुबह, 'शांति-कुंज' का नज़ारा बदला हुआ था।

रिया रसोई में चाय बना रही थी। तभी सुनंदा जी वहां आईं। आज उनके कमर में वह भारी चाबियों का गुच्छा नहीं था।

"माँ जी, चाय?" रिया ने पूछा।

"हाँ, और सुनो," सुनंदा जी ने मेज़ पर चाबियों का गुच्छा रख दिया। "यह तुम रखो।"

रिया घबरा गई। "क्यों माँ जी? मुझसे कोई गलती हो गई क्या?"

सुनंदा जी ने पहली बार रिया के गाल को प्यार से थपथपाया और मुस्कुराईं—वही तस्वीर वाली मुस्कान।

"नहीं पगली। गलती तो मैं कर रही थी। मैंने इन चाबियों के बोझ तले अपनी रूह को कैद कर लिया था। अब मुझे अपने हाथ खाली चाहिए। मैंने पास की डांस एकैडमी में बात की है... वो चाहते हैं कि मैं बच्चों को कत्थक सिखाऊं। हफ्ते में तीन दिन।"

रिया की आँखों में पानी भर आया। "सच माँ जी?"

"हाँ," सुनंदा जी ने हँसते हुए कहा, "अब इस घर का 'अनुशासन' तुम संभालो। मुझे अपनी 'आज़ादी' वापस मिल गई है। और हाँ, आज खाने में खिचड़ी बना लेना, मुझे क्लास के लिए देर हो रही है।"

सुनंदा जी गुनगुनाते हुए बगीचे की तरफ निकल गईं। रिया ने उन चाबियों को उठाया। वे अब भारी नहीं लग रही थीं, क्योंकि उसने देख लिया था कि ज़िम्मेदारी और सपनों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाता है। घर वही था, दीवारें वही थीं, लेकिन अब वहां सन्नाटा नहीं, संगीत गूंजता था। एक बहू ने अपनी सास को उनकी जवानी लौटा दी थी, और बदले में सास ने उसे एक बेटी का दर्जा दे दिया था।


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