आज का दिन सिया के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं था। यह उसकी शादी का छठा महीना था, और अब तक उसने रसोई में पानी की बोतल भरने के अलावा शायद ही कोई काम किया हो। और इसमें उसकी गलती भी नहीं थी। मायके में नौकरों की फौज थी और यहाँ ससुराल में भी रसोइया, महाराज और हेल्पर्स की कमी नहीं थी। उसकी सास, गायत्री देवी, शहर की नामचीन समाजसेवी थीं, जिनका रुतबा और अनुशासन किसी सेना के जनरल से कम नहीं था। वे घर की रसोइया भी अपनी देखरेख में ही रखवाती थीं।
लेकिन आज स्थिति कुछ और थी। आज घर के मुखिया, यानी सिया के ससुर जी की बरसी थी। घर में ब्राह्मण भोज का आयोजन था। गायत्री देवी के लिए यह दिन किसी उत्सव से कम नहीं होता था। वे मानती थीं कि इस दिन ब्राह्मणों को खिलाया गया भोजन सीधे उनके दिवंगत पति की आत्मा तक पहुँचता है। इसलिए, हर व्यंजन में शुद्धता और स्वाद का होना अनिवार्य था।
मुसीबत तब शुरू हुई जब सुबह सात बजे 'रघुनंदन महाराज' का फोन आया कि उनकी पत्नी को हार्ट अटैक आया है और वे आज नहीं आ पाएंगे। गायत्री देवी के पैरों तले जमीन खिसक गई। ग्यारह बजे ब्राह्मण आने वाले थे। मेनू तय था—कद्दू की सब्जी, उड़द दाल की कचौड़ी और सबसे महत्वपूर्ण—'शाही मालपुआ'।
गायत्री देवी सोफे पर सिर पकड़कर बैठ गई थीं। "अब क्या होगा? शहर के दूसरे रसोइye इतनी जल्दी मिलेंगे नहीं। और मैं... मेरे घुटनों का दर्द मुझे आधे घंटे भी खड़े होने की इजाजत नहीं देता। आज तो मेरी नाक कट जाएगी। पंडित जी खाली पेट जाएंगे, तो उनकी आत्मा को क्या शांति मिलेगी?" उनकी आँखों में आंसू थे।
सिया, जो सीढ़ियों से उतर रही थी, ने अपनी सास की यह हालत देखी। उसने अपने पति, आरव को ऑफिस के लिए विदा कर दिया था। घर में सिर्फ वो और गायत्री देवी थीं। हेल्पर्स सब्जी काट सकते थे, लेकिन 'शाही मालपुआ' और 'कचौड़ी' बनाना उनके बस की बात नहीं थी, और गायत्री देवी को उन पर भरोसा भी नहीं था।
सिया धीरे से अपनी सास के पास गई। "मम्मी जी..."
गायत्री देवी ने भीगी पलकों से उसे देखा। उस निगाह में उम्मीद नहीं, बल्कि एक लाचारी थी। "क्या है सिया? देख रही हो न, आज अनर्थ हो गया।"
सिया ने एक गहरी सांस ली। उसे पता था कि वह जो कहने जा रही है, वह जोखिम भरा है। उसे कुकिंग का 'क' भी नहीं आता था, सिवाय यूट्यूब देखकर कभी-कभार पास्ता बनाने के। लेकिन अपनी सास का यह मुरझाया चेहरा उससे देखा नहीं जा रहा था।
"मम्मी जी, आप चिंता मत कीजिये। मैं... मैं बना लूँगी," सिया ने कहा।
गायत्री देवी ने चौंककर उसे देखा। "तुम? सिया, मजाक का वक्त नहीं है। तुम्हें पता भी है कचौड़ी का आटा कैसे लगता है? मालपुए की चाशनी की एक तार की चाशनी क्या होती है, पता है? बेटा, यह पास्ता या सैंडविच नहीं है। तेल का काम है, आंच का काम है।"
"पता है मम्मी जी," सिया ने झूठ बोला, ताकि सास को तसल्ली मिले। "मैंने... मैंने माँ को बनाते हुए देखा है। और फिर, आपके निर्देश (instructions) होंगे और मेरे हाथ। आप बस रसोई में कुर्सी डालकर बैठ जाइयेगा और मुझे बताती रहिएगा। मैं कर लूँगी। प्लीज, भरोसा रखिये।"
गायत्री देवी के पास कोई और विकल्प नहीं था। डूबते को तिनके का सहारा काफी होता है। उन्होंने भारी मन से सहमति दे दी।
सिया रसोई में दाखिल हुई। उसने अपना एप्रन बांधा। उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। उसे तो यह भी नहीं पता था कि कढ़ाई कौन सी लेनी है। लेकिन उसने खुद को समझाया, "सिया, आज बात इज्जत की है। कर सकती है तू।"
गायत्री देवी रसोई के दरवाजे पर कुर्सी डालकर बैठ गईं। वे एक-एक निर्देश देने लगीं।
"सिया, पहले चाशनी चढ़ाओ। दो कटोरी चीनी, एक कटोरी पानी। उसमें केसर डालना मत भूलना।"
"जी मम्मी जी।"
सिया ने जैसे-तैसे चाशनी चढ़ाई। फिर कचौड़ी का आटा गूंथने लगी। गायत्री देवी की तीखी नजरें उस पर टिकी थीं। "अरे, मोयन (तेल) कम डाला है, और डालो। वरना कचौड़ी पत्थर जैसी बनेगी।"
सिया के हाथ सन गए थे। माथे का पसीना आँखों में जा रहा था, लेकिन वह रुकी नहीं। उसने यूट्यूब पर छुपकर रेसिपी देखने की कोशिश नहीं की क्योंकि सास सामने थीं। वह पूरी तरह सास के शब्दों पर निर्भर थी।
दस बज चुके थे। सब्जी तैयार थी। आटा लग चुका था। अब बारी थी सबसे मुश्किल काम की—मालपुए तलना और कचौड़ी निकालना।
गायत्री देवी ने कहा, "सिया, बड़ी वाली लोहे की कढ़ाई चढ़ाओ। उसमें देसी घी डालो। मालपुआ घी में ही बनेगा।"
सिया ने भारी कढ़ाई गैस पर रखी। घी डाला। गैस की आंच तेज कर दी। घी गर्म होने लगा। रसोई में घी की महक भरने लगी।
"अब बैटर (घोल) को कलछी से धीरे से डालो। ध्यान रखना, हाथ सीधा रहे," गायत्री देवी ने निर्देश दिया।
सिया ने कलछी उठाई। घोल को घी में डालने के लिए वह आगे बढ़ी। अनुभव की कमी साफ़ थी। उसे अंदाजा नहीं था कि घी कितना गर्म है और घोल डालते वक्त हाथ कितनी ऊंचाई पर रखना चाहिए।
जैसे ही उसने घोल कढ़ाई में डाला, उसके हाथ का संतुलन थोड़ा बिगड़ा। घोल घी में गिरा, और 'छनन्न' की आवाज के साथ खौलता हुआ घी छिटक कर सिया की कलाई और हथेली के पिछले हिस्से पर आ गिरा।
"आह्ह!" सिया के मुंह से एक दबी हुई चीख निकली। जलन इतनी तेज थी जैसे किसी ने अंगारा रख दिया हो।
"क्या हुआ सिया?" गायत्री देवी ने अपनी जगह से उठने की कोशिश की, लेकिन घुटनों के दर्द ने उन्हें रोक दिया।
सिया ने तुरंत अपने दूसरे हाथ से अपनी कलाई पकड़ ली। उसकी आँखों में आंसू आ गए थे। त्वचा लाल पड़ रही थी और छाले पड़ने की तैयारी थी। उसका मन हुआ कि सब छोड़-छाड़ कर ठंडे पानी के नीचे हाथ रख दे और रोए। उसे अपनी माँ की याद आ रही थी। मायके में तो जरा सी खरोंच लगने पर पूरा घर सिर पर उठा लिया जाता था।
लेकिन फिर उसकी नजर दीवार घड़ी पर गई। 10:45 हो रहे थे। पंद्रह मिनट में पंडित जी दरवाजे पर होंगे। अगर वह अभी रुक गई, तो मालपुए कौन बनाएगा? सास का चेहरा याद आया जो बाहर समाज के डर से पीला पड़ा था।
सिया ने दांतों से अपना होंठ दबाया। उसने अपनी साड़ी के पल्लू से जल्दी से हाथ पोंछा (जो कि गलत था, पर उसे सुध नहीं थी)। उसने अपनी सास की तरफ मुड़कर, दर्द को मुस्कान के पीछे छिपाते हुए कहा, "कुछ नहीं मम्मी जी, बस... बस थोड़ा सा घी गिर गया था स्लैब पर, वही पोंछ रही थी।"
"ध्यान से बेटा, गर्म है," गायत्री देवी ने कहा, उन्हें सिया का चेहरा नहीं दिख रहा था क्योंकि वह कढ़ाई की तरफ मुड़ गई थी।
सिया ने एक गहरी सांस ली। जलन असहनीय थी। हर बार जब वह कढ़ाई के ऊपर हाथ ले जाती, तो भाप से उसकी जली हुई त्वचा और भी जलती। लेकिन उसने रुकने का नाम नहीं लिया। एक-एक करके सुनहरे मालपुए कढ़ाई से निकलने लगे और चाशनी में डूबने लगे।
उसकी आँखों से पानी बह रहा था, जिसे वह पसीने के बहाने अपनी बाजू से पोंछ लेती। उसने कचौड़ियाँ तलीं। उसका हाथ कांप रहा था, पर उसने अपनी गति कम नहीं होने दी।
ठीक ग्यारह बजे, पंडित जी के आने की घंटी बजी।
"सिया, हो गया?" गायत्री देवी ने पूछा।
"जी मम्मी जी, बस आखिरी कचौड़ी है," सिया ने कहा।
जब तक गायत्री देवी ड्राइंग रूम में पंडित जी को बैठा रही थीं, सिया ने सारा खाना हॉट-केस में निकाला। उसने अपने जलते हुए हाथ को ठंडे पानी में डुबोने की बजाय, उस पर फटाफट एक बैंडेज लपेटा और उसके ऊपर अपनी पूरी आस्तीन का ब्लाउज खींच लिया ताकि बैंडेज दिखे नहीं। उसे डर था कि अगर सास ने देख लिया तो वे खुद को दोषी मानेंगी या फिर खाना परोसने नहीं देंगी।
सिया बाहर आई। उसने सिर पर पल्लू रखा और पंडितों को भोजन परोसना शुरू किया।
"बड़े सौभाग्यशाली हैं आप लोग, इतनी सुघड़ बहु मिली है," एक बुजुर्ग पंडित ने मालपुआ खाते हुए कहा। "ऐसा स्वाद तो रघुनंदन महाराज के हाथ में भी नहीं था। बिल्कुल वैसा ही, जैसा पहले माँ अन्नपूर्णा (गायत्री देवी) बनाती थीं।"
गायत्री देवी के चेहरे पर गर्व और आश्चर्य का मिश्रित भाव था। उन्होंने सिया को देखा। सिया मुस्कुरा रही थी, लेकिन उसकी मुस्कान में थकान थी।
भोजन समाप्त हुआ। पंडित जी चले गए। गायत्री देवी ने राहत की सांस ली।
"सिया, आओ बेटा। तुमने तो कमाल कर दिया। मुझे तो यकीन ही नहीं हो रहा कि यह सब तुमने बनाया है," गायत्री देवी ने डाइनिंग टेबल पर बैठते हुए कहा। "लाओ, मैं भी तो चखूं कि मेरी बहु ने क्या जादू किया है।"
सिया रसोई से एक प्लेट में मालपुआ लेकर आई। जैसे ही उसने प्लेट मेज पर रखी, उसका पल्लू थोड़ा सरक गया और ब्लाउज की आस्तीन थोड़ी ऊपर खिंच गई।
गायत्री देवी की नजर, जो अब तक मालपुए पर थी, अचानक सिया की कलाई पर अटक गई। वहां एक बड़ा सा लाल फफोला पड़ा हुआ था, जो बैंडेज के किनारे से झांक रहा था। त्वचा बुरी तरह झुलस गई थी।
"ये... ये क्या है?" गायत्री देवी ने सिया का हाथ पकड़ लिया।
सिया ने हाथ खींचने की कोशिश की। "कुछ नहीं मम्मी जी, बस मामूली सा..."
"मामूली?" गायत्री देवी की आवाज कांप गई। उन्होंने जबरदस्ती सिया की आस्तीन ऊपर की। कलाई से लेकर हथेली तक का हिस्सा बुरी तरह जला हुआ था। "इतना जल गया था... और तुम... तुम खाना बनाती रहीं? तुमने बताया क्यों नहीं? तुम पागल हो गई हो क्या लड़की?"
सिया की आँखों से अब रुका हुआ दर्द बह निकला। "मम्मी जी, अगर बता देती तो आप काम रोक देतीं। और... और आज पापा जी का दिन था। आपकी नाक कट जाती। मुझे दर्द हो रहा था, पर आपके आंसुओं से ज्यादा नहीं।"
गायत्री देवी सन्न रह गईं। जिस लड़की को वे 'मॉडर्न', 'कामचोरी' और 'नाज़ुक' समझती थीं, उसने आज उनके सम्मान के लिए अपनी त्वचा जला ली थी। वे अक्सर सोचती थीं कि सिया कभी उनकी बेटी जैसी नहीं बन पाएगी, लेकिन आज सिया ने साबित कर दिया था कि वह बेटी से भी बढ़कर है।
गायत्री देवी उठीं। उन्होंने सिया को वहीं कुर्सी पर बिठाया।
"बैठो यहाँ," उनका स्वर आदेशात्मक था, लेकिन उसमें एक मां की ममता थी।
वे दौड़कर (हाँ, अपने घुटनों का दर्द भूलकर) फ्रिज से बर्फ और फर्स्ट एड बॉक्स लेकर आईं। उन्होंने बहुत ही कोमलता से सिया के हाथ पर मलहम लगाना शुरू किया। सिया ने देखा कि उसकी सास की आँखों से आंसू टपक कर उसके हाथ पर गिर रहे थे। वे आंसू किसी भी मलहम से ज्यादा ठंडक दे रहे थे।
"मुझे माफ़ कर दे गुड़िया," गायत्री देवी ने सिसकते हुए कहा। "मैं अपनी जििद और अपने रीति-रिवाजों में इतनी अंधी हो गई थी कि मैंने एक मासूम बच्ची को आग में झोंक दिया। तुझे कुकिंग नहीं आती थी, फिर भी मैंने तुझे रोका नहीं। मैं कैसी सास हूँ?"
"मम्मी जी, प्लीज ऐसा मत कहिये," सिया ने अपने दूसरे हाथ से उनके आंसू पोंछे। "आज मुझे लगा कि मैं सच में इस घर का हिस्सा हूँ। अब तक मैं मेहमान की तरह रहती थी। आज जब हाथ जला, तब लगा कि मैंने इस घर के लिए कुछ किया है।"
गायत्री देवी ने सिया के माथे को चूम लिया। "तूने सिर्फ खाना नहीं बनाया सिया, तूने आज मेरा दिल जीत लिया। आज से इस घर की रसोई में तू तभी कदम रखेगी जब तेरी मर्जी होगी। और हाँ, कल से मैं तुझे कुकिंग सिखाऊँगी, इसलिए नहीं कि तुझे काम करना है, बल्कि इसलिए ताकि अगली बार तू अपना हाथ न जलाए।"
शाम को जब आरव घर लौटा, तो उसने देखा कि घर का माहौल बदला हुआ था। हमेशा अपनी-अपनी दुनिया में रहने वाली सास-बहु, सोफे पर साथ बैठी थीं। गायत्री देवी अपने हाथों से सिया को खाना खिला रही थीं, क्योंकि सिया के एक हाथ में पट्टी बंधी थी।
"अरे, क्या हुआ?" आरव ने घबराकर पूछा।
गायत्री देवी ने मुस्कुराते हुए कहा, "कुछ नहीं बेटा, तेरी पत्नी आज एक जंग जीत कर आई है। यह जो पट्टी है, यह चोट की नहीं, इसके 'गोल्ड मेडल' की निशानी है।"
सिया ने आरव की तरफ देखकर आँख मारी। उस रात 'सिंघानिया विला' में सिर्फ मालपुए की मिठास नहीं थी, बल्कि रिश्तों में घुली एक नई चाशनी थी। सिया समझ गई थी कि परफैक्ट खाना बनाने के लिए अनुभव की नहीं, नीयत की जरूरत होती है। और गायत्री देवी समझ गई थीं कि आधुनकिता का मतलब संवेदनहीनता नहीं होता।
जलने का निशान तो शायद कुछ दिनों में चला जाएगा, लेकिन उस दिन उस रसोई की गर्मी ने दो दिलों को हमेशा के लिए जोड़ दिया था। अब वह घर सिर्फ ईंट-पत्थरों का मकान नहीं, बल्कि एक सच्चा 'आशियाना' बन गया था।
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