बिना बुलावे का प्यार

 "सुमित्रा, तुम्हारी इस भावुकता और हर बात में हद से ज्यादा सोचने की आदत से मुझे सच में बहुत चिढ़ होती है। अभी तो मुश्किल से दो महीने ही बीते हैं। उसे अभी पूरे सात महीने इस अवस्था से गुजरना है। तुम अभी से अपना बोरिया-बिस्तर बांध कर वहां जाने की जिद क्यों कर रही हो? वे दोनों बच्चे नहीं हैं, अपने-अपने करियर में सफल हैं, अपना और अपने घर का ख्याल रखना बहुत अच्छी तरह जानते हैं। तुम जिसे 'सहयोग' समझ रही हो, वो आज की पीढ़ी को 'दखलंदाजी' लग सकता है। जब उन्हें हमारी जरूरत महसूस होगी, वे खुद हमें फोन करके बुला लेंगे। और तभी तुम्हारा वहां जाना सार्थक और सम्मानजनक लगेगा।"

दीनानाथ जी ने अपना अखबार एक तरफ रखते हुए अपनी पत्नी सुमित्रा को बड़ी ही व्यावहारिकता से समझाया। सुमित्रा के होठों तक एक जवाब आया था, लेकिन वह उसे पी गई। वह कहना चाहती थी कि अपनों के काम आने में, अपने ही बच्चों के दुख-सुख में भागीदार बनने में भला कैसा सम्मान और कैसी सार्थकता खोजना? क्या एक माँ अपने बच्चे के पास तभी जाएगी जब उसे बकायदा कोई न्योता भेजा जाएगा? लेकिन वह जानती थी कि दीनानाथ जी से बहस करने का मतलब है अपनी 'व्यावहारिक नासमझी' का एक और प्रमाण देना। इसलिए सुमित्रा ने चुप्पी साध लेना ही बेहतर समझा।

सुमित्रा और दीनानाथ जी का इकलौता बेटा, अंशुल, अपनी पत्नी काव्या के साथ पुणे में रहता था। अंशुल एक आईटी कंपनी में मैनेजर था और काव्या भी एक मल्टीनेशनल कंपनी में एचआर के पद पर काम कर रही थी। दोनों की शादी को तीन साल हो चुके थे और अब जाकर घर में किलकारियां गूंजने की खबर आई थी। जब से सुमित्रा ने काव्या के मां बनने की खबर सुनी थी, उसके पैर जमीन पर नहीं पड़ रहे थे। लेकिन दीनानाथ जी के उस कड़े अनुशासन और आज के 'प्राइवेसी' वाले तर्कों ने सुमित्रा के कदमों पर बेड़ियां डाल दी थीं।

सुमित्रा ने बाहर से भले ही दीनानाथ जी की बात मान ली थी और पुणे जाने की जिद छोड़ दी थी, लेकिन एक माँ का दिल भला कहां शांत बैठता है। उसने घर पर ही अपनी गुपचुप तैयारियां शुरू कर दी थीं। काव्या के लिए बाजार से चुन-चुन कर सबसे अच्छी क्वालिटी के सूखे मेवे, शुद्ध केसर और गोंद खरीद लाई थी। उसने घर में ही पंजीरी और पौष्टिक लड्डू बनाने शुरू कर दिए थे। वह सोचती थी कि जब भी अंशुल का कोई दोस्त या रिश्तेदार पुणे जाएगा, तो वह यह सारा सामान उसके हाथ भिजवा देगी।

सामान तैयार करने के साथ-साथ सुमित्रा के फोन पर हिदायतों का दौर भी लगातार जारी था। वह दिन में कम से कम दो बार काव्या को फोन जरूर करती। "काव्या बेटा, सुबह उठकर खाली पेट चाय मत पीना, थोड़ा सा नींबू पानी ले लेना। सीढ़ियां संभल कर उतरना। बाहर का जंक फूड बिल्कुल बंद कर दो।" काव्या भी बहुत ही शालीनता से हर बात का जवाब 'जी मम्मी जी, मैं ध्यान रखूंगी' कह कर दे देती थी।

लेकिन फोन पर सुनी जाने वाली आवाजें अक्सर असली तस्वीर नहीं दिखा पातीं। काव्या की गर्भावस्था का शुरुआती दौर बहुत ही मुश्किल साबित हो रहा था। उसे दिन भर भयानक कमजोरी और उल्टी की शिकायत रहती थी। अंशुल ऑफिस के काम में इतना व्यस्त रहता था कि चाहकर भी काव्या की पूरी देखभाल नहीं कर पा रहा था। काव्या भी अपने सास-ससुर को परेशान नहीं करना चाहती थी और अपनी मां को भी नहीं बुला सकती थी क्योंकि वे खुद बीमार रहती थीं। काव्या और अंशुल दोनों बाहर से खाना ऑर्डर कर लेते या किसी तरह काम चला रहे थे।

एक शाम सुमित्रा ने जब काव्या को फोन किया, तो दूसरी तरफ से काव्या की आवाज बहुत ही धीमी और कांपती हुई आई। सुमित्रा की अनुभवी ममता ने तुरंत भांप लिया कि कुछ गड़बड़ है।

"काव्या, तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं लग रही है। सच-सच बताओ क्या बात है?" सुमित्रा ने चिंता से पूछा।

काव्या, जो पिछले कई दिनों से शारीरिक और मानसिक रूप से टूट रही थी, अपनी सास की उस ममता भरी और फिक्रमंद आवाज को सुनकर खुद को रोक नहीं पाई। वह फोन पर ही सुबक पड़ी। "मम्मी जी... मुझसे कुछ खाया नहीं जा रहा है। शरीर में इतनी कमजोरी है कि रसोई में खड़ा भी नहीं हुआ जाता। अंशुल ऑफिस गए हैं और मुझे बहुत घबराहट हो रही है।"

बस, वह एक पल था जिसने सुमित्रा के अंदर के सारे संकोच और दीनानाथ जी के सारे व्यावहारिक तर्कों को एक झटके में ध्वस्त कर दिया। सुमित्रा ने तुरंत कहा, "तू रो मत मेरी बच्ची, मैं आ रही हूं।"

सुमित्रा ने फोन रखा और सीधे अलमारी से अपना सूटकेस निकाल लिया। दीनानाथ जी कमरे में आए तो हैरान रह गए। "यह क्या कर रही हो? मैंने तुम्हें समझाया था ना..."

"आपकी समझदारी और औपचारिकताएं अपनी जगह हैं जी, लेकिन मेरी बहू वहां अकेली तकलीफ में है। उसे इस वक्त एक मां की जरूरत है। और एक मां को अपने बच्चों के पास जाने के लिए किसी निमंत्रण या सार्थकता की जरूरत नहीं होती," सुमित्रा ने इतनी दृढ़ता से कहा कि दीनानाथ जी के पास कोई जवाब नहीं था।

अगली सुबह सुमित्रा पुणे पहुंच गई। जब उसने फ्लैट की बेल बजाई और अंशुल ने दरवाजा खोला, तो अपनी मां को सामने देखकर उसकी आंखों में भी एक अजीब सी राहत और नमी आ गई। सुमित्रा सीधे काव्या के कमरे में गई। काव्या बिस्तर पर पीली और थकी हुई लेटी थी। सुमित्रा को देखते ही काव्या उठ कर बैठ गई और अपनी सास के गले लगकर फूट-फूट कर रोने लगी।

"मम्मी जी, मुझे आपकी बहुत जरूरत थी," काव्या ने रोते हुए कहा।

सुमित्रा ने काव्या के सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा, "मैं आ गई हूं ना बेटा, अब सब ठीक हो जाएगा।"

उस दिन सुमित्रा ने अपने हाथों से काव्या के लिए हल्का और पौष्टिक खाना बनाया। सुमित्रा के हाथ के बने खाने और उसके स्नेह भरे स्पर्श ने काव्या के अंदर एक नई जान फूंक दी। अंशुल ने भी उस शाम चैन की सांस ली। रात को जब दीनानाथ जी का फोन आया, तो अंशुल ने उनसे कहा, "पापा, अच्छा हुआ जो मम्मी यहां आ गईं। हमें सच में उनकी बहुत जरूरत थी, बस हम संकोच में कह नहीं पा रहे थे।" दीनानाथ जी को भी अब अपनी गलती और सुमित्रा की ममता की गहराई का अहसास हो गया था। रिश्तों में औपचारिकताएं नहीं, बल्कि भावनाएं मायने रखती हैं।

क्या आपको भी लगता है कि आज के दौर में 'स्पेस' और 'प्राइवेसी' के नाम पर हम अपनों से दूर होते जा रहे हैं? क्या अपनों के दुख-तकलीफ में बिना बुलाए पहुंच जाना दखलंदाजी है या सच्चा प्यार? अपनी राय हमें जरूर बताएं।

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