सच कहूं तो निहारिका से मुझे बेइंतहा प्यार हो गया था। हमारी अरेंज मैरिज थी, लेकिन शादी के कुछ ही महीनों में वो मेरी आदत, मेरी जरूरत और मेरी सबसे बड़ी कमजोरी बन गई थी। मुझे हर वक्त बस उसी की चिंता लगी रहती थी। दुबली-पतली, नाजुक, छुईमुई सी मेरी निहारिका, जिसे देखकर लगता था कि तेज़ हवा का झोंका भी उसे उड़ा ले जाएगा, वो कैसे ऑफिस और घर दोनों की भारी-भरकम जिम्मेदारियां इतनी आसानी से संभालती होगी, यह सोचकर ही मेरा दिल कई बार बैठ सा जाता था।
सुबह के साढ़े पांच बजते ही जब मेरी नींद बहुत गहरी होती, निहारिका चुपचाप बिस्तर से उठ जाती। मैं अधखुली आंखों से देखता कि वह कैसे बिना कोई आवाज किए अपने बाल बांधती और रसोई की तरफ भागती। सुबह की चाय से लेकर मेरे माता-पिता का नाश्ता, मेरा टिफिन और फिर खुद के लिए भी कुछ रूखा-सूखा पैक करके वह आठ बजे तक तैयार हो जाती। उसके चेहरे पर एक अजीब सी भागदौड़ होती, लेकिन फिर भी जब वह मुझे ऑफिस के लिए अलविदा कहती, तो उसकी वो मीठी सी मुस्कान मेरी सारी दिन भर की थकान हरने के लिए काफी होती।
मैं अक्सर ऑफिस में बैठे-बैठे सोचता कि वो जो लोकल ट्रेन के धक्कों में पिसते हुए अपने दफ्तर पहुंचती होगी, वहां अपने बॉस की चिकचिक सुनती होगी, तो उसका वो नाजुक सा शरीर कितना टूट जाता होगा। और फिर शाम को थक-हार कर जब वह घर लौटती, तो उसे आराम करने का मौका कहां मिलता था? घर में कदम रखते ही फिर से वही रसोई, वही रात के खाने की तैयारी और सास-ससुर की जरूरतें। मेरी मां थोड़ी पुरानी सोच की हैं। उनका मानना है कि बहू चाहे कितना भी कमा ले, घर की रसोई तो उसे ही संभालनी पड़ेगी। मैं बीच-बीच में मां को टोकने की कोशिश करता, लेकिन निहारिका हमेशा बात को संभाल लेती और कहती, "कोई बात नहीं विवेक, मुझे काम करने की आदत है, मैं कर लूंगी।"
लेकिन एक दिन, मेरे सब्र और निहारिका की उस 'सुपरवुमन' बनने की कोशिश का बांध टूट गया। उस दिन गुरुवार था। निहारिका का ऑफिस में मंथ-एंड क्लोजिंग का काम था। वह बहुत देर से घर लौटी। बाहर तेज बारिश हो रही थी और वह आधी भीग चुकी थी। उसके चेहरे का रंग पीला पड़ गया था और उसकी आंखें बता रही थीं कि वह कितनी भयंकर थकान और शायद हल्के बुखार से तप रही है।
मैं दौड़कर उसके पास गया और उसके हाथ से बैग लिया। मैंने कहा, "निहारिका, तुम सीधा जाकर कपड़े बदलो और लेट जाओ। आज रात का खाना बाहर से मंगवा लेंगे।"
लेकिन मेरी मां ने पीछे से आवाज दी, "अरे विवेक, बाहर का खाना तुम्हारे पापा को सूट नहीं करता, उनका पेट खराब हो जाएगा। निहारिका, बस दाल-चावल चढ़ा दे, ज्यादा कुछ मत बनाना।"
निहारिका ने अपनी थकी हुई आंखों से मेरी तरफ देखा, एक बहुत ही फीकी सी मुस्कान दी और गीले कपड़ों में ही रसोई की तरफ बढ़ने लगी। उस एक पल में, मेरे अंदर का वो प्यार जो अब तक सिर्फ 'फिक्र' बनकर मेरे दिमाग में घूमता था, उसने एक बगावत का रूप ले लिया। मैंने आगे बढ़कर निहारिका का हाथ पकड़ लिया।
"नहीं मां," मेरी आवाज में एक ऐसा दृढ़ निश्चय था जो शायद मां ने पहले कभी नहीं सुना था। "पापा का पेट बाहर के खाने से खराब होता है, लेकिन निहारिका की तबीयत इस घर की अंधी परंपराओं से खराब हो रही है। आज यह रसोई में कदम नहीं रखेगी।"
निहारिका घबरा गई। उसने धीरे से कहा, "विवेक, क्या कर रहे हो? बात का बतंगड़ मत बनाओ, मुझे सच में ठीक लग रहा है। बस दस मिनट का काम है।"
मैंने उसे कंधों से पकड़ा और हॉल के सोफे पर बैठा दिया। "निहारिका, आज तुम कुछ नहीं करोगी। तुमने शादी मुझसे की है, इस घर की कोई मशीन बनने के लिए नहीं। मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूं, और मेरा प्यार सिर्फ इस बात की चिंता करने के लिए नहीं है कि तुम कैसे सब संभालती हो। मेरा प्यार इसलिए है कि मैं तुम्हारे उस बोझ को आधा कर सकूं।"
मैंने तौलिया लाकर उसके बाल पोंछे और उसे अपने कमरे में ले जाकर आराम करने को कहा। फिर मैंने स्लीव्स ऊपर मोड़ीं और रसोई में चला गया। मुझे खाना बनाना खास नहीं आता था, लेकिन मैंने इंटरनेट खोलकर सादी सी खिचड़ी और आलू का चोखा बनाना शुरू किया। मां रसोई के दरवाजे पर खड़ी हैरानी से मुझे देख रही थीं।
"विवेक, तू ये क्या कर रहा है? मर्द होकर रसोई के काम करेगा अब?" मां की आवाज में नाराजगी थी।
मैंने बहुत शांति से जवाब दिया, "मां, जब एक औरत होकर निहारिका ऑफिस जाकर पैसे कमा सकती है और मेरे कंधे से कंधा मिलाकर घर की ईएमआई भर सकती है, तो मैं मर्द होकर इस घर की रसोई क्यों नहीं संभाल सकता? क्या हम उसे सिर्फ इसलिए पीसते रहें क्योंकि वह चुपचाप सब सह लेती है?"
उस रात मेरी बनाई हुई खिचड़ी शायद दुनिया की सबसे स्वादिष्ट खिचड़ी नहीं थी, लेकिन जब मैंने निहारिका को अपने हाथों से वह खिलाई, तो उसकी आंखों से बहते हुए आंसुओं ने मुझे बता दिया कि वह कितनी भूखी थी— सिर्फ खाने की नहीं, बल्कि इस सहारे की, इस इज्जत की।
उस दिन के बाद से मैंने निहारिका को वो छुईमुई सी लड़की मानना छोड़ दिया जिसकी मुझे सिर्फ चिंता करनी थी। मैंने उसका असल साथी बनना सीख लिया। अब हमारी सुबहें साथ रसोई में कटती हैं। मैं सब्जियां काटता हूं और वह खाना बनाती है। मां भी अब इस बदलाव को धीरे-धीरे स्वीकार करने लगी हैं। प्यार का असली मतलब सिर्फ फिक्र में घुलना नहीं, बल्कि उस फिक्र को अपने हाथों की मेहनत से मिटा देना है।
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क्या पति-पत्नी के रिश्ते में जिम्मेदारियों का बंटवारा इस तरह होना चाहिए? क्या आज के समाज में कामकाजी महिलाओं से घर की पूरी जिम्मेदारी की उम्मीद रखना सही है? विवेक का अपनी पत्नी के लिए खड़ा होना और रसोई संभालना आपको कैसा लगा? अपने विचार हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।
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