“क्या बात है मीनाक्षी, आज-कल तो तुम्हारी कोई ख़बर ही नहीं होती? तुम्हारी बड़ी दीदी पिछले कुछ दिनों से अस्वस्थ चल रही हैं और दिन-रात बस तुम्हें ही याद करती रहती हैं। अगर अपने उस बड़े शहर और ऑफिस से थोड़ा वक़्त निकाल सको, तो एक बार आकर उससे मिल जाओ। उसे बहुत तसल्ली मिलेगी।”
फोन के दूसरी तरफ से आ रही आवाज़ मेरे जीजाजी, यानी मेरी बड़ी बहन राधिका के पति सुरेश जी की थी। उनकी आवाज़ में कोई शिकायत नहीं थी, लेकिन एक अजीब सा ठहराव और विनती ज़रूर थी, जो मेरे दिल के किसी कोने में सीधे जाकर चुभ गई थी।
“दीदी को क्या हुआ जीजाजी? कोई घबराने वाली बात तो नहीं है ना?” मेरी आवाज़ में एक साथ चिंता, डर और अपराधबोध सब कुछ छलक आया था। मेरे हाथों से लैपटॉप का माउस छूट गया था और माथे पर पसीने की कुछ बूँदें उभर आई थीं।
“नहीं-नहीं, घबराने की कोई बात नहीं है। बस उम्र और कमज़ोरी का असर है। लेकिन तुम तो जानती हो, वह अंदर से कितनी भावुक है। बस तुम्हें देखने की रट लगाए बैठी है। आ सको तो उसे बहुत ख़ुशी मिलेगी,” कहकर सुरेश जी ने फोन रख दिया।
फोन कटने के बाद मैं काफी देर तक हाथ में मोबाइल थामे शून्य में घूरती रही। कितनी अजीब बात है ना! हम एक ही राज्य में रहते हैं, दिल्ली से जयपुर की दूरी महज़ कुछ घंटों की है, लेकिन मुझे याद ही नहीं आ रहा था कि मैं आख़िरी बार राधिका दीदी से कब मिली थी। शायद पिछले साल दीवाली पर? या उससे भी पहले किसी रिश्तेदार की शादी में? मेरे पास हमेशा कोई न कोई बहाना तैयार रहता था—"दीदी, इस वीकेंड तो बहुत काम है", "दीदी, बच्चों के एग्ज़ाम चल रहे हैं", "दीदी, एक ज़रूरी प्रोजेक्ट आ गया है।" और मेरी वो भोली दीदी हर बार बस यही कहती थी, "कोई बात नहीं छुटकी, अपना और बच्चों का ध्यान रखना। काम ज़रूरी है।"
राधिका दीदी मेरे लिए सिर्फ एक बड़ी बहन नहीं थीं, बल्कि मेरी माँ की परछाईं थीं। बचपन में जब हम दोनों ने अपने माता-पिता को एक सड़क दुर्घटना में खो दिया था, तब राधिका दीदी ने ही अपनी पढ़ाई छोड़कर मुझे संभाला था। उन्होंने मेरी हर ज़िद पूरी की, मुझे इस काबिल बनाया कि आज मैं दिल्ली की एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में ऊंचे पद पर काम कर रही हूँ। लेकिन मैंने बदले में उन्हें क्या दिया? अपनी कामयाबी की दौड़ में मैं इतनी अंधी हो गई कि उस इंसान को ही भूल गई जिसने मुझे दौड़ना सिखाया था।
अगले ही दिन मैंने ऑफिस से छुट्टी ली और जयपुर के लिए निकल पड़ी। ट्रेन की खिड़की से पीछे छूटते हुए पेड़ों को देखते हुए मेरा मन बार-बार अतीत की उन पगडंडियों पर लौट रहा था, जहाँ दीदी मुझे स्कूल छोड़ने जाया करती थीं। सफर कट गया और मैं दीदी के घर के दरवाज़े पर पहुँच गई।
दरवाज़े की बेल बजाते ही मेरे हाथ हल्के से काँप रहे थे। सुरेश जी ने दरवाज़ा खोला। मुझे देखते ही उनके चेहरे पर एक राहत भरी मुस्कान आ गई। “आ गई तुम मीनाक्षी? जाओ, अंदर कमरे में है वो। आज सुबह से ही दर्वाज़े की तरफ आँखें लगाए बैठी है।”
मैं धीरे से कमरे में दाखिल हुई। कमरे में दवाइयों की हल्की सी गंध आ रही थी। सामने बिस्तर पर दीदी लेटी हुई थीं। मेरा दिल धक्क से रह गया। जो राधिका दीदी कभी पूरे घर में चहकती फिरती थीं, आज वो कितनी कमज़ोर और पीली पड़ गई थीं। उनकी आँखों के नीचे गहरे गड्ढे पड़ गए थे।
पैरों की आहट सुनकर दीदी ने आँखें खोलीं। मुझे देखते ही उनकी सूखी और कमज़ोर आँखों में जैसे एक पल में सारी दुनिया की चमक लौट आई। वह कांपते हाथों से बिस्तर से उठने की कोशिश करने लगीं।
“अरे दीदी, उठ क्यों रही हो, लेटी रहो ना,” मैं दौड़कर उनके पास गई और उन्हें अपने गले से लगा लिया। मेरे गले से लगकर दीदी ने मेरे बालों पर हाथ फेरा। उनके उस स्पर्श में आज भी वही बचपन वाली गर्माहट थी, जो मेरे सारे दुखों को सोख लेती थी।
“कैसी है मेरी छुटकी? कितनी दुबली हो गई है तू। दिल्ली में ठीक से खाना नहीं खाती क्या?” दीदी ने मेरी गालों को चूमते हुए कहा।
खुद इतनी कमज़ोर होने के बावजूद उन्हें मेरी फिक्र थी। मेरे सब्र का बाँध टूट गया और मैं उनके गले लगकर फूट-फूट कर रोने लगी। “मुझे माफ़ कर दो दीदी। मैं कितनी स्वार्थी हो गई थी। अपने काम, अपनी दुनिया में इतनी उलझ गई कि यह ही भूल गई कि मेरी एक दुनिया यहाँ भी बसती है। मैं तुम्हें देखने तक नहीं आ पाई।”
दीदी ने मेरे आँसू पोंछे और मुस्कुराते हुए बोलीं, “पागल है क्या! इसमें माफ़ी कैसी? मैं तो तेरी तरक्की देखकर ही खुश हो लेती हूँ। बेटियां जब अपने पैरों पर खड़ी होती हैं, तो सबसे ज़्यादा ख़ुशी उस इंसान को होती है जिसने उन्हें उंगली पकड़कर चलना सिखाया हो। मुझे तुझसे कोई शिकायत नहीं है मेरी बच्ची।”
उनका यह बड़प्पन मुझे और भी ज़्यादा रुला रहा था। उस पूरे दिन मैंने दीदी के पास बैठकर ढेरों बातें की। उनके बालों में तेल लगाया, उन्हें अपने हाथों से खाना खिलाया। सुरेश जी यह सब देखकर बस मुस्कुरा रहे थे। शाम को जब दीदी सो गईं, तो सुरेश जी ने मुझे बताया कि डॉक्टर ने कहा है कि दीदी को कोई बड़ी बीमारी नहीं है, बस अंदर से वह बहुत अकेलापन महसूस करने लगी थीं।
मुझे एहसास हुआ कि बुढ़ापे या ढलती उम्र में इंसान को पैसों की या दवाइयों की उतनी ज़रूरत नहीं होती, जितनी अपनेपन और प्यार की होती है। मेरे थोड़े से समय ने दीदी के चेहरे पर जो रौनक ला दी थी, वह किसी भी महंगी दवा से नहीं आ सकती थी। मैंने उसी पल फैसला कर लिया कि अब मैं अपनी ज़िंदगी की भागदौड़ को कभी भी अपने रिश्तों के बीच दीवार नहीं बनने दूंगी। जो इंसान हमारे लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर देता है, उसके लिए हमारे पास अगर थोड़ा सा 'वक़्त' भी न हो, तो हमारी सारी सफलता मिट्टी के समान है।
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