**आखिरी उम्मीद: एक लावारिस शाम**

 नई दिल्ली रेलवे स्टेशन का वो प्लैटफॉर्म हमेशा की तरह मुसाफिरों की जल्दबाज़ी और शोर-शराबे से खचाखच भरा हुआ था। सुबह का वक्त था और स्टेशन की भागदौड़ अपने चरम पर थी। चाय बेचने वाला बाईस साल का नौजवान, समीर, एक ग्राहक से चाय के पैसे लेने के लिए अपना मोबाइल फोन हाथ में पकड़े हुए था ताकि वह डिजिटल पेमेंट चेक कर सके। उसने अपनी पुरानी काले रंग की लेदर जैकेट की कॉलर को थोड़ा ऊपर किया क्योंकि सुबह की हवा में अभी भी हल्की सी सिहरन थी। जैसे ही उसने पेमेंट कन्फर्म होने पर अपनी नज़रें मोबाइल स्क्रीन से उठाईं, उसकी निगाहें अचानक भीड़ को चीरती हुई एक बुजुर्ग दंपति पर जाकर ठहर गईं। 


वह एक बेहद मार्मिक दृश्य था। सत्तर साल के आस-पास का एक कमज़ोर और बूढ़ा आदमी, अपनी पत्नी का हाथ बहुत ही मजबूती से थामे हुए था। वो बुजुर्ग अपनी हर एक सांस के साथ अपनी पत्नी को सहारा दे रहा था, जो शायद किसी बीमारी के कारण ठीक से चल भी नहीं पा रही थी। उनके कपड़े बहुत ही साधारण और जगह-जगह से घिसे हुए थे, जो उनकी गरीबी की गवाही दे रहे थे। बूढ़े आदमी के कंधे पर एक पुराना सा कपड़े का झोला टंगा था। वे दोनों भीड़ से बचते हुए धीरे-धीरे चले और प्लैटफॉर्म के एक शांत किनारे पर जाकर लोहे के एक ठंडे बेंच पर बैठ गए। 


समीर उन्हें कुछ और देर तक देखना चाहता था, उनके चेहरों पर एक अजीब सी बेबसी थी जिसने उसे अपनी ओर खींचा था। लेकिन तभी लाउडस्पीकर पर एक सुपरफास्ट एक्सप्रेस ट्रेन के आने की घोषणा गूंज उठी। ट्रेन के आते ही यात्रियों का हुजूम उमड़ पड़ा। "चाय, गरम चाय!" की आवाज़ लगाता हुआ समीर अपने काम की आपाधापी में खो गया और उन बुजुर्गों का ख्याल उसके दिमाग से निकल गया।


दिन भर नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर कई गाड़ियाँ आईं और गईं। हज़ारों मुसाफिर अपनी मंज़िलों की ओर निकल गए। धीरे-धीरे सूरज ढलने लगा और शाम की पीली रोशनी ने स्टेशन को अपनी आगोश में ले लिया। समीर की शिफ्ट अब खत्म होने वाली थी। वह अपनी चाय की केतली समेट रहा था। अपनी थकान मिटाने के लिए उसने खुद के लिए आधी कटिंग चाय निकाली और उसी प्लैटफॉर्म के किनारे की तरफ चल पड़ा जहाँ सुबह उसने उस दंपति को देखा था। 


जैसे ही वह उस कोने में पहुँचा, उसके कदम अचानक रुक गए। उसके हाथों में पकड़े चाय के कुल्हड़ से भाप उड़ रही थी। उसने देखा कि वो बुजुर्ग दंपति अभी भी उसी बेंच पर बैठे हुए थे। पूरे बारह घंटे बीत चुके थे। बूढ़ी औरत अपने पति के कंधे पर सिर रखे सो रही थी, और वो बूढ़ा आदमी अपनी पथराई हुई आँखों से स्टेशन के मुख्य द्वार की तरफ ऐसे घूर रहा था जैसे किसी के आने का बहुत बेसब्री से इंतज़ार कर रहा हो। उनके पास पानी की एक बोतल तक नहीं थी। 


समीर से रहा नहीं गया। वह उनके पास गया और बहुत ही आदर के साथ बोला, "बाबा, आप लोग सुबह से यहीं बैठे हैं? कोई ट्रेन का इंतज़ार है क्या? यह लीजिए, गरमा-गरम चाय पी लीजिए, थोड़ी राहत मिलेगी।"


बूढ़े आदमी ने चौंककर समीर की तरफ देखा। उसकी आँखों के किनारे आंसुओं से भीगे हुए थे। उसने कांपते हाथों से मना करते हुए कहा, "नहीं बेटा, हमारे पास तुम्हें देने के लिए पैसे नहीं हैं। हमारा बेटा अभी आता ही होगा, वो कुछ खाने को ले आएगा।"


समीर मुस्कुराया, "बाबा, चाय के पैसे नहीं चाहिए, यह मेरी तरफ से है। आप बस पी लीजिए। पर आपका बेटा कहाँ गया है? इतनी देर तो किसी काम में नहीं लगती।"


चाय का कुल्हड़ हाथों में लेते ही उस बुजुर्ग की हिम्मत जैसे जवाब दे गई। उसका दर्द आंसुओं के रूप में छलक पड़ा। उसने भर्राई हुई आवाज़ में अपना नाम रामनाथ बताया और कहा, "बेटा, हम एक छोटे से गाँव से आए हैं। मेरे बेटे ने कहा था कि शहर के बड़े अस्पताल में तुम्हारी माँ की आँखों का इलाज करवाएंगे। सुबह जब हम यहाँ स्टेशन पर उतरे, तो उसने कहा कि वो हम दोनों के लिए बाहर से नाश्ता और आगे की ट्रेन की टिकट लेकर आता है। उसने हमें इस बेंच पर बिठाया और कहा कि मैं कहीं नहीं जाऊंगा। सुबह से शाम हो गई बेटा... वो नहीं लौटा।"


समीर का दिल धक से रह गया। उसने तुरंत अपना मोबाइल फोन निकाला और कहा, "बाबा, मुझे उसका नंबर बताइए, मैं अभी फोन लगाता हूँ। हो सकता है वो कहीं भीड़ में खो गया हो या फोन की बैटरी खत्म हो गई हो।"


रामनाथ ने अपने कुरते की जेब से एक मुड़ा-तुड़ा सा कागज़ निकाला और समीर को दे दिया। समीर ने उस नंबर पर फोन लगाया। दूसरी तरफ से जो आवाज़ आई, उसने समीर के पैरों तले ज़मीन खिसका दी— "आपके द्वारा डायल किया गया नंबर अस्तित्व में नहीं है।"


समीर ने निराश होकर रामनाथ की तरफ देखा। रामनाथ ने एक गहरी और ठंडी सांस ली और अपने उसी कुरते की दूसरी जेब से एक और कागज़ का टुकड़ा निकाला। "मुझे पता है बेटा, वो नंबर बंद है। दोपहर में एक बाबूजी से मैंने फोन लगवाया था। दरअसल, जब मैं पानी पीने के लिए अपनी जेब में कुछ सिक्के टटोल रहा था, तो मुझे मेरी जेब में यह चिट्ठी मिली। मेरे बेटे ने ही चुपके से रख दी थी।"


समीर ने वो चिट्ठी पढ़ी। उसमें लिखा था— *"बाबूजी, मुझे माफ़ कर देना। मेरी आमदनी इतनी नहीं है कि मैं अपना घर भी चला सकूं और आप दोनों के इलाज और बुढ़ापे का खर्च भी उठा सकूं। मेरी पत्नी रोज़ इसी बात पर मुझसे लड़ती है। मैं आप दोनों को अपने साथ नहीं रख सकता। आप दोनों किसी आश्रम में चले जाना या गाँव वापस लौट जाना। मुझे मत ढूँढना।"*


चिट्ठी पढ़कर समीर के हाथ कांपने लगे। उस नौजवान की आँखों में गुस्सा और दर्द दोनों एक साथ उतर आए। जो काले रंग की लेदर जैकेट उसे सुबह ठंड से बचा रही थी, वह अब उसे इस समाज की असलियत के आगे बेमानी लग रही थी। 


तभी वो बूढ़ी औरत नींद से जागी। उसने रामनाथ की तरफ देखा और एक छोटे बच्चे जैसी मासूमियत से पूछा, "जी, अपना रमेश आ गया क्या? मुझे बहुत भूख लगी है। उसे कहो ना जल्दी से हमें घर ले चले।"


रामनाथ ने जल्दी से अपने आंसू पोंछे और अपनी पत्नी के गालों को सहलाते हुए एक झूठी लेकिन दुनिया की सबसे पवित्र मुस्कान के साथ कहा, "हाँ भाग्यवान, वो बस रास्ते में ही है। शहर का ट्रैफिक बहुत है ना, इसलिए थोड़ा वक्त लग रहा है। तू चिंता मत कर, हमारा रमेश हमें कभी छोड़कर नहीं जा सकता।"


समीर, जो खुद बचपन से एक अनाथ था और जिसने कभी अपने माता-पिता का चेहरा नहीं देखा था, उसके लिए यह बर्दाश्त से बाहर था। एक तरफ वो था जो अपनों के लिए तरसता था, और दूसरी तरफ रमेश था जो अपने भगवान रूपी माता-पिता को इस भीड़ भरे स्टेशन पर लावारिस छोड़ गया था। 


समीर ने अपना मोबाइल फोन वापस अपनी जैकेट की जेब में रखा। उसने आगे बढ़कर रामनाथ के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए और बोला, "बाबा, रमेश की ट्रेन तो छूट गई, लेकिन आपका दूसरा बेटा आ गया है। चलिए मेरे साथ, मेरा कमरा छोटा ज़रूर है, लेकिन वहाँ आप दोनों के लिए बहुत जगह है। माँ को भूखा नहीं रखूंगा मैं।"


रामनाथ ने अचरज और आंसुओं के साथ समीर को देखा। उस शाम नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के उस भीड़ भरे प्लैटफॉर्म पर इंसानियत का एक ऐसा फूल खिला था, जिसकी महक ने खून के रिश्तों की बदबू को हमेशा के लिए पीछे छोड़ दिया था। समीर उन दोनों का हाथ पकड़कर स्टेशन से बाहर निकल रहा था, और ऐसा लग रहा था मानो उसे आज अपने खोए हुए माता-पिता मिल गए हों।


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क्या आपको लगता है कि आधुनिकता और पैसे की अंधी दौड़ में इंसानियत और रिश्ते इतने खोखले हो गए हैं कि लोग अपने माता-पिता को भी बोझ समझने लगे हैं? अगर आप समीर की जगह होते तो क्या करते? अपने विचार नीचे कमेंट करके ज़रूर बताएं।


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