**अधूरी परछाई और इंसानियत का असली चेहरा**

 सर्दियों की एक सर्द और धुंधली शाम थी। दिल्ली की सड़कों पर कोहरा छाने लगा था और रात का अंधेरा गहरा रहा था। कविता अपने पिता के लिए एक बहुत ही महंगी और जीवनरक्षक दवा लेकर अस्पताल से निकली थी। उसके पिता पिछले कई दिनों से अस्पताल में भर्ती थे और यह इंजेक्शन उनके लिए बहुत ज़रूरी था। बस स्टॉप पर अकेली खड़ी कविता के मन में पहले से ही पिता की बीमारी को लेकर एक अजीब सी घबराहट और उलझन चल रही थी। दिन भर की भागदौड़ ने उसे शारीरिक और मानसिक दोनों तरह से थका दिया था।


तभी एक लड़का, जिसकी उम्र लगभग पच्चीस साल रही होगी, पास ही रुके एक ऑटो से उतरा और आकर कविता से कुछ कदम की दूरी पर खड़ा हो गया। उसके कपड़े कुछ मैले थे, बाल बिखरे हुए थे और चेहरे पर एक अजीब सी हड़बड़ाहट थी। कविता का दिल ज़ोर से धड़कने लगा। उसे लगा कि यह लड़का ज़रूर उसका पीछा कर रहा है। वह और घबरा गई कि कहीं यह लड़का इस सुनसान बस स्टॉप और रात के अंधेरे में उसकी मजबूरी का फायदा न उठाए। 


डर के मारे कविता उस लड़के से थोड़ा और खिसक कर दूर खड़ी हो गई। उसका मन किसी अनहोनी की आशंका से कांप रहा था। उस स्टॉप पर कई बसें आईं और गईं, लेकिन कविता के घर तक जाने वाली बस नहीं आई। हैरानी की बात यह थी कि वह लड़का भी किसी बस में नहीं चढ़ा। वह बार-बार अपनी जेब में हाथ डालता, कुछ टटोलता और फिर कविता की तरफ देखता। कविता को अब पक्का यकीन हो गया था कि इस लड़के के इरादे बिल्कुल ठीक नहीं हैं और वह किसी गलत नीयत से ही बस स्टॉप पर खड़ा है।


अचानक, बहुत देर इंतज़ार करने के बाद कविता की बस आ गई। वह बिना कोई पल गंवाए भागकर बस में चढ़ गई और राहत की सांस ली। लेकिन उसका कलेजा तब मुँह को आ गया जब उसने मुड़कर देखा कि वह लड़का भी उसी बस में पीछे-पीछे चढ़ गया है।


बस में भीड़ ज्यादा नहीं थी। कविता जानबूझकर कंडक्टर के बिल्कुल पास जाकर खड़ी हो गई। उसे उस लड़के से अब भी बहुत डर लग रहा था। उसके दिमाग में अनगिनत डरावने ख्याल आ रहे थे कि हो न हो वह बस में ज़रूर छेड़छाड़ या बदतमीजी करने की कोशिश करेगा। कविता ने अपना बैग अपनी छाती से लगा लिया और मन ही मन ठान लिया कि 'खैर, बस में और भी लोग हैं, अगर उसने कुछ भी अजीब हरकत की तो मैं ज़ोर से शोर मचा दूंगी और ज़रूरत पड़ने पर हाथ उठाने या थप्पड़ मारने से भी नहीं चूकूंगी।'


बस अपनी रफ्तार से चल रही थी। कविता की नज़रें तिरछी होकर उसी लड़के पर टिकी थीं। लड़का धीरे-धीरे बस के पिछले हिस्से से आगे की तरफ, कविता की दिशा में बढ़ने लगा। कविता ने अपने बैग को और कसकर पकड़ लिया। उसकी मुट्ठियाँ भिंच गईं और कड़कड़ाती ठंड में भी उसका माथा पसीने से भीग गया। लड़का बिल्कुल कविता के पास आकर खड़ा हो गया।


कविता ने गुस्से और खौफ से उसकी तरफ देखा और इससे पहले कि वह कुछ चिल्लाती या शोर मचाती, उस लड़के ने अपनी जेब से एक छोटा सा सफेद रंग का पैकेट निकाला और बहुत ही संकोच के साथ कविता की तरफ बढ़ा दिया।


"दीदी," लड़के की आवाज़ में एक अजीब सी नरमी और कांपन था, "आप जब अस्पताल के बाहर मेडिकल स्टोर पर अपने बैग में कुछ रख रही थीं, तब यह पैकेट आपके बैग से नीचे गिर गया था। मैंने आपको आवाज़ दी, लेकिन शायद आपने सुनी नहीं और जल्दी में आगे बढ़ गईं। मैं तब से आपके पीछे इसी पैकेट को लौटाने के लिए आ रहा हूँ।"


कविता ने अवाक होकर उस पैकेट को देखा। वह उसके पिता का वही जीवनरक्षक इंजेक्शन था, जो कई हज़ारों का था। कविता ने झट से अपना बैग चेक किया; बैग की साइड वाली चेन खुली हुई थी और वह कीमती दवा वहाँ नहीं थी। 


कविता के हाथ कांपने लगे। जिस लड़के को वह एक गुंडा या लुटेरा समझ रही थी, वह दरअसल उसका रक्षक बनकर आया था। लड़के ने अपनी नम आँखों को पोंछते हुए आगे कहा, "दीदी, मुझे पता है यह इंजेक्शन कितना ज़रूरी और महंगा है। पिछले साल मेरी माँ को भी यही बीमारी थी। मैं मज़दूरी करके बड़ी मुश्किल से पैसे जोड़कर यह दवा लाया था, लेकिन जल्दबाजी में मुझसे भी यह बस में कहीं गिर गई थी। मैं अपनी माँ को बचा नहीं सका। जब मैंने यह दवा आपके पास गिरते हुए देखी, तो मुझे लगा कि किसी और के पिता या माँ को मेरी तरह इस दवा के बिना जान न गंवानी पड़े। इसीलिए मैं आपकी बस का इंतज़ार कर रहा था।"


यह सुनते ही कविता की आँखों से आँसू छलक पड़े। उसका सारा डर, उसका गुस्सा, उसका शक एक गहरे अपराधबोध और सम्मान में बदल गया। उसने रोते हुए उस लड़के के हाथ से दवा ली और अपने दोनों हाथ जोड़ लिए। 


"मुझे माफ कर दो भाई," कविता रुंधे गले से बोली, "मैंने तुम्हें ना जाने क्या-क्या समझ लिया था। तुमने आज सिर्फ एक दवा नहीं लौटाई है, तुमने मेरे पिता की जान बचाई है और मुझे इंसानियत का सबसे बड़ा सबक दिया है।"


लड़के ने बस एक फीकी सी मुस्कान के साथ हाथ जोड़े और अगले स्टॉप पर बस से उतर कर अंधेरे में ओझल हो गया। वह रात जो एक गहरे खौफ और शक से शुरू हुई थी, कविता के लिए एक ऐसी सुबह में बदल गई जिसने उसे रिश्तों, पारिवारिक दर्द और इंसानियत की एक नई और मार्मिक परिभाषा सिखा दी।


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