शहर के सबसे पॉश इलाके में बनी उस आलीशान कोठी 'मृगतृष्णा' की चमक-धमक दूर से ही देखने लायक थी। घर के भीतर की हर चीज़ विदेशी और महंगी थी। रिमोट से खुलने वाले पर्दे, सेंसर वाले दरवाजे और हर कमरे में एसी की वो बनावटी ठंडक। यह घर था शहर के मशहूर बिल्डर, सतीश खन्ना का। सतीश ने अपनी मेहनत और दिन-रात की भागदौड़ से वह सब कुछ हासिल कर लिया था, जिसका सपना एक आम आदमी देखता है। उनकी पत्नी, रागिनी, शहर की बड़ी किटी पार्टीज़ और सोशल सर्कल्स का हिस्सा थीं। उनके दो बच्चे, आरव और जिया, शहर के सबसे महंगे बोर्डिंग स्कूल में पढ़ते थे और छुट्टियों में जब घर आते, तो उनके पास मनोरंजन के लिए दुनिया के सबसे महंगे गैजेट्स होते थे।
बाहर से देखने पर यह एक 'परफेक्ट' और सुखी परिवार लगता था, जिसे देखकर लोग अपनी किस्मत को कोसते थे। लेकिन कोठी की उन संगमरमरी दीवारों के पीछे एक ऐसी 'दुविधा' और 'सुविधा' का खेल चल रहा था, जिसने इस परिवार की रूह को सुखा दिया था।
सतीश खन्ना ने अपने बच्चों को हर वह 'सुविधा' दी थी जो वे मांगते थे, बल्कि मांगने से पहले ही उनके सामने हाजिर कर दी जाती थी। आरव को जब गाड़ी चलाने का शौक हुआ, तो सतीश ने उसे उसके अठारहवें जन्मदिन पर एक महंगी स्पोर्ट्स कार तोहफे में दी। जिया के पास उसके अपने क्रेडिट कार्ड्स थे जिनकी कोई सीमा नहीं थी। सतीश का मानना था कि उन्होंने बचपन तंगहाली में बिताया है, इसलिए उनके बच्चों को किसी चीज़ की कमी नहीं होनी चाहिए। लेकिन यही 'जरूरत से ज्यादा सुविधा' अब जहर बनने लगी थी। आरव और जिया को पैसों की कद्र नहीं थी। उनके लिए रिश्ते भी 'यूज एंड थ्रो' (इस्तेमाल करो और फेंको) जैसी चीज़ बन गए थे। वे अपने माता-पिता से केवल तब बात करते जब उन्हें किसी नई सुविधा की जरूरत होती।
दूसरी ओर, रागिनी एक गहरी 'दुविधा' में जी रही थीं। उनके पास सुख-सुविधाओं का अंबार था, लेकिन उनके पास वो 'सुकून' नहीं था जो उनके मायके के उस छोटे से घर में होता था, जहाँ उनकी माँ मिट्टी के चूल्हे पर रोटियां सेकती थीं और पूरा परिवार एक साथ बैठकर हंसता-बोलता था। यहाँ सतीश के पास अपनी पत्नी के लिए दस मिनट का समय नहीं था। वे घर आते, तो भी उनके कान फोन से लगे रहते। रागिनी को समझ नहीं आता था कि वे सतीश को टोकें या खामोश रहें। उन्हें डर था कि कहीं उनकी टोक-टाक सतीश को उनसे दूर न कर दे, लेकिन उनकी खामोशी उन्हें खुद से दूर कर रही थी।
एक शाम, कोठी में एक बड़ी पार्टी का आयोजन था। सतीश ने अपने खास बिजनेस पार्टनर्स को बुलाया था। आरव अपने दोस्तों के साथ शराब के नशे में धुत होकर घर लौटा और उसने गेट पर खड़े बुजुर्ग गार्ड के साथ बदतमीजी कर दी। बात इतनी बढ़ गई कि पुलिस घर तक आ पहुंची। सतीश को अपने रसूख का इस्तेमाल करके मामला रफा-दफा करना पड़ा, लेकिन उस रात सतीश के भीतर कुछ टूट गया। उन्होंने देखा कि उनका बेटा, जिसे उन्होंने हर सुविधा दी, उसमें इंसानियत का नामोनिशान नहीं बचा था।
उसी रात, जब मेहमान चले गए, सतीश अकेले गार्डन में बैठे थे। रागिनी उनके पास आईं। सतीश ने उनकी तरफ देखा और रुंधे गले से कहा, "रागिनी, हमने कहाँ गलती कर दी? मैंने सोचा था कि पैसा और सुविधाएं बच्चों को खुश रखेंगी, लेकिन इन्होंने तो उन्हें बिगाड़ दिया। आज मुझे उस गार्ड की आँखों में जो तिरस्कार दिखा, उसने मुझे झकझोर दिया है।"
रागिनी ने सतीश का हाथ थाम लिया और कहा, "सतीश, दुविधा और सुविधा जब जरूरत से ज्यादा हो जाती हैं, तो इंसान अपना रास्ता भटक जाता है। हमने बच्चों को सुविधाएं तो दीं, लेकिन उन्हें संस्कार और समय नहीं दिया। आरव को स्पोर्ट्स कार की जरूरत नहीं थी, उसे आपके साथ बैठकर बात करने की जरूरत थी। जिया को अनलिमिटेड क्रेडिट कार्ड की जरूरत नहीं थी, उसे अपनी माँ की ममता और सही-गलत की समझ की जरूरत थी। और मैं... मैं भी इस दुविधा में रही कि अगर मैं आपसे कुछ कहूंगी तो घर की शांति भंग हो जाएगी, लेकिन सच तो यह है कि यहाँ शांति नहीं, सिर्फ खामोशी है।"
उस रात सतीश और रागिनी ने एक बड़ा फैसला लिया। उन्होंने तय किया कि वे अब बच्चों को 'मशीन' नहीं बनने देंगे। सतीश ने अपने बिजनेस का काम थोड़ा कम किया और परिवार के साथ समय बिताना शुरू किया। उन्होंने आरव की गाड़ी की चाबियां ले लीं और उसे अपने ऑफिस में एक इंटर्न की तरह काम पर लगाया, जहाँ उसे पसीना बहाकर पैसे की कीमत समझ आए। जिया को सोशल वर्क और एनजीओ से जोड़ा गया, ताकि वह दुनिया के असली दर्द को देख सके।
शुरुआत में बच्चों ने बहुत विद्रोह किया। आरव चिल्लाया, "पापा, आप हमारे साथ ऐसा क्यों कर रहे हैं? हमारे पास इतना पैसा है, फिर हमें ये सब करने की क्या जरूरत?" सतीश ने शांत भाव से उत्तर दिया, "बेटा, सुविधा ने तुम्हें अंधा बना दिया है। मैं तुम्हें वो इंसान बनाना चाहता हूँ जो सड़क पर खड़े उस गार्ड की इज्जत करना सीखे, न कि उसे अपने पैसे की ताकत दिखाए।"
धीरे-धीरे कोठी 'मृगतृष्णा' का माहौल बदलने लगा। जो घर कभी सिर्फ एसी की आवाज से गूंजता था, अब वहां ठहाकों और चर्चाओं की आवाजें सुनाई देने लगीं। आरव को जब अपनी पहली महीने की कमाई (जो बहुत कम थी) मिली, तो उसकी आँखों में एक अलग ही चमक थी। उसने उस पैसे से घर के उसी बुजुर्ग गार्ड के लिए एक गरम कंबल खरीदा। यह देखकर सतीश की आँखों में आंसू आ गए।
यह कहानी हमें सिखाती है कि जीवन में संतुलन ही सबसे बड़ा सुख है। जरूरत से ज्यादा 'सुविधा' इंसान को आलसी और अहंकारी बना देती है, और जरूरत से ज्यादा 'दुविधा' इंसान के मानसिक सुकून को छीन लेती है। सतीश और रागिनी ने वक्त रहते इस सच्चाई को समझ लिया और अपने बिखरते परिवार को बचा लिया।
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