सुख की सुनहरी बेड़ियाँ

 शहर के सबसे आलीशान रिहायशी इलाके में बनी उस पाँच मंज़िला कोठी की चमक देखते ही बनती थी। घर के अंदर पैर रखते ही मखमली कालीन, केंद्रीय वातानुकूलन (सेंट्रलाइज्ड एसी) की ठंडक और दीवारों पर सजी बेशकीमती पेंटिंग्स किसी राजमहल का अहसास कराती थीं। यह घर था व्यवसायी समीर और उनकी पत्नी ईशा का। समीर ने पिछले दस वर्षों में दिन-रात एक करके वह मुकाम हासिल किया था कि आज उनके पास सुख-सुविधा का हर साधन मौजूद था। उनके घर में काम करने वालों की एक पूरी फौज थी। खाना बनाने के लिए रसोइया, घर की सफाई के लिए नौकर और बागवानी के लिए माली। 


समीर का मानना था कि उन्होंने अपने माता-पिता, विनायक जी और सुलोचना देवी को वह 'सुविधा' दी है, जिसका सपना हर बुजुर्ग देखता है। विनायक जी को अब एक गिलास पानी के लिए भी नहीं उठना पड़ता था। उनके कमरे में ही फ्रिज, टीवी और हर वो मशीन थी जो एक इशारे पर काम करती थी। लेकिन इस अत्यधिक 'सुविधा' ने धीरे-धीरे उस घर से 'संवाद' को खत्म कर दिया था। विनायक जी को याद आता था अपना पुराना छोटा सा घर, जहाँ गर्मी तो थी, लेकिन रसोई से आती सुलोचना की आवाज़ और पड़ोसियों की गपशप में एक जीवंतता थी। यहाँ, सुविधाओं के इस आलीशान पिंजरे में, उन्हें ऐसा लगता था जैसे वे किसी म्यूज़ियम की वस्तु बन गए हैं।


कहानी में नया मोड़ तब आया जब समीर ने अपने व्यवसाय को विदेशों में फैलाने का फैसला किया। इस फैसले ने विनायक जी और सुलोचना देवी के मन में एक गहरा 'दुविधा' का बीज बो दिया। समीर चाहता था कि वे दोनों भी उसके साथ लंदन चलें, लेकिन सुलोचना देवी अपनी जड़ों को छोड़ना नहीं चाहती थीं। उनके सामने दुविधा यह थी कि अगर वे नहीं जाते हैं, तो उनका बेटा अकेला पड़ जाएगा और अगर जाते हैं, तो अपनी यादों और वतन से दूर हो जाएंगे।


एक शाम, जब समीर ने लंदन जाने की तैयारी के लिए विनायक जी के सामने कागज़ात रखे, तो विनायक जी का हाथ कांपने लगा। समीर ने झुंझलाते हुए कहा, "पिताजी, अब इसमें दुविधा कैसी? वहाँ आपको यहाँ से भी ज्यादा सुविधा मिलेगी। वहाँ की हवा साफ है, चिकित्सा व्यवस्था बेहतर है और आपके लिए मैंने एक विशेष अटेंडेंट भी नियुक्त कर दिया है। आपको यहाँ इस पुरानी कोठी में अकेले रहने की ज़रूरत नहीं है।"


विनायक जी ने चश्मा उतारकर मेज़ पर रखा और समीर की आँखों में देखा। उन आँखों में वो चमक नहीं थी जो एक रईस बाप की आँखों में होनी चाहिए, बल्कि उनमें एक गहरा सूनापन था। विनायक जी बोले, "बेटा, दुविधा और सुविधा जरूरत से ज्यादा हो तो, दोनों ही खतरनाक हैं। तूने हमें इतनी सुविधा दे दी है कि अब हमारे शरीर को हिलने की भी ज़रूरत नहीं पड़ती, और इसी सुविधा ने हमें अपाहिज बना दिया है। और तेरी ये नई योजना हमारे मन में ऐसी दुविधा पैदा कर रही है कि हम न तो जी पा रहे हैं और न ही चैन से सो पा रहे हैं।"


समीर को लगा कि उसके पिता शायद पुराने ख्यालात के हैं और बदलाव से डर रहे हैं। लेकिन असली तूफान आना अभी बाकी था। समीर और ईशा अपनी तैयारियों में इतने मशगूल थे कि उन्होंने यह गौर ही नहीं किया कि उनकी सात साल की बेटी, मायरा, धीरे-धीरे अंतर्मुखी होती जा रही है। मायरा के पास दुनिया का हर महंगा खिलौना था, उसका अपना आईपैड था और उसे घुमाने के लिए ड्राइवर था। लेकिन उसके पास अपनी माँ के हाथ का बना खाना और दादाजी की गोद में बैठकर सुनी जाने वाली कहानियों का वक्त नहीं था।


एक दिन मायरा स्कूल से लौटी और चुपचाप अपने कमरे में चली गई। जब सुलोचना देवी उसके पास गईं, तो देखा कि मायरा रो रही थी। सुलोचना देवी ने उसे गले से लगाया और पूछा, "क्या हुआ मेरी गुड़िया? तुझे क्या चाहिए? तेरे पास तो सब कुछ है।"


मायरा ने सिसकते हुए कहा, "दादी, मम्मा-पापा कहते हैं कि लंदन में मुझे बहुत सारी नई 'सुविधाएं' मिलेंगी, नया स्कूल मिलेगा। लेकिन मुझे डर लग रहा है। क्या वहाँ भी मुझे अकेले ही खाना खाना होगा? क्या वहाँ भी मुझे कहानियाँ आईपैड पर ही देखनी होंगी? मैं इस दुविधा में हूँ कि मैं खुश होऊं या दुखी। मुझे ये सब खिलौने नहीं चाहिए दादी, मुझे बस आप सबके साथ बैठकर बातें करनी हैं।"


मायरा की इन बातों ने उस आलीशान कोठी की दीवारों को हिलाकर रख दिया। सुलोचना देवी ने मायरा को साथ लिया और सीधे समीर के स्टडी रूम में पहुँच गईं। समीर और ईशा उस वक्त फाइलें देख रहे थे। सुलोचना देवी ने शांति से कहा, "समीर, देखो अपनी बेटी को। जिस सुविधा का जाल तुमने इसके चारों ओर बुना है, उसने इसे कितना अकेला कर दिया है। और तुम्हारी ये लंदन जाने की दुविधा ने इसकी रातों की नींद छीन ली है। बेटा, ज़रूरत से ज्यादा सुख-सुविधा इंसान को आलसी और अकेला बनाती है, और ज़रूरत से ज्यादा दुविधा मन को अशांत कर देती है।"


समीर को पहली बार अपनी गलती का अहसास हुआ। उसे समझ आया कि उसने अपने परिवार को सुख देने के चक्कर में उनसे उनका 'समय' ही छीन लिया था। उसने देखा कि उसके माता-पिता सुविधाओं के बोझ तले दबे हुए थे और उनकी दुविधा उनकी खुशी को निगल रही थी। 


उस रात समीर ने एक बड़ा फैसला लिया। उसने अपना लंदन जाने का प्लान रद्द नहीं किया, लेकिन उसने अपनी प्राथमिकताएं बदल दीं। उसने तय किया कि वह घर के आधे नौकरों को कम करेगा ताकि घर के सदस्य एक-दूसरे की छोटी-छोटी ज़रूरतों के लिए एक-दूसरे पर निर्भर रहें। उसने मायरा के लिए एक निश्चित समय तय किया जिसमें कोई गैजेट नहीं होगा, सिर्फ बातचीत होगी।


विनायक जी के चेहरे पर महीनों बाद मुस्कान आई। उन्होंने अपनी 'दुविधा' को किनारे रखकर समीर को गले लगा लिया। उन्होंने सीखा कि ज़िंदगी 'सुविधाओं' के संग्रह में नहीं, बल्कि 'संतुष्टि' के अहसास में है। समीर ने भी जान लिया था कि आलीशान कोठी तभी घर बनती है जब उसमें रहने वाले लोग दुविधाओं से मुक्त हों और सुविधाओं के गुलाम न हों।


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