रागिनी को हमेशा से यही लगता था कि उसके पति निखिल बहुत कठोर स्वभाव के इंसान हैं। न ज्यादा हंसना, न खुलकर बात करना, न अपने मन की बातें बताना। घर में सबकी जरूरतों का ध्यान रखना, समय पर ऑफिस जाना, बच्चों की फीस भरना, माँ की दवाइयाँ लाना, बिजली-पानी के बिल जमा करना, राशन भरवाना—बस यही उसका जीवन था। रागिनी कई बार सोचती, क्या इस आदमी के भीतर कोई भावना है भी या नहीं? शादी को बारह साल हो चुके थे, पर निखिल ने कभी उससे बैठकर दो मीठी बातें नहीं की थीं। न जन्मदिन पर कोई खास उत्साह, न सालगिरह पर कोई सरप्राइज। वह बस चुपचाप सब करता रहता।
घर में उनकी बूढ़ी माँ शारदा देवी, बेटा आरव और बेटी मीरा भी थे। बच्चे अपने पिता से थोड़ा डरते थे, क्योंकि निखिल कम बोलते थे और अनुशासन को बहुत महत्व देते थे। मगर यह भी सच था कि बच्चों की हर छोटी-बड़ी जरूरत उन्हें बिना कहे पूरी मिल जाती थी। आरव को क्रिकेट का बैट चाहिए होता, तो अगले दिन उसके कमरे में रखा मिलता। मीरा की ड्राइंग कॉपी खत्म हो जाती, तो नई कॉपी और रंग उसके बैग में रखे मिलते। शारदा देवी की दवा एक दिन भी नहीं छूटती थी। रागिनी की साड़ी का फटा किनारा तक निखिल चुपचाप दर्जी से ठीक करवा लाते थे। लेकिन फिर भी न जाने क्यों, उनके इस ख्याल में अपनापन कम और जिम्मेदारी ज्यादा दिखाई देती थी।
रागिनी का मन कई बार भर आता। वह अपनी सहेली पूनम से कहती, “पता नहीं, मैं इनके साथ रहती तो हूँ, पर कभी-कभी लगता है जैसे मैं इनके दिल में रहती ही नहीं। सबका ख्याल रखते हैं, पर ऐसा लगता है जैसे बस फर्ज निभा रहे हैं।” पूनम उसे समझाती, “हर इंसान प्यार जताने का तरीका अलग होता है।” मगर रागिनी के मन को तसल्ली नहीं मिलती।
एक दिन मीरा स्कूल से उदास लौटी। उसकी क्लास की बाकी बच्चियों के पापा मदर्स डे और फैमिली डे पर स्कूल आए थे, पर निखिल किसी काम से नहीं जा पाए। मीरा ने मासूमियत से कहा, “मम्मी, पापा हमसे प्यार नहीं करते क्या?” यह सुनकर रागिनी का दिल कसक गया। उसने मीरा को सीने से लगाया, लेकिन भीतर कहीं वह खुद भी यही सवाल वर्षों से ढो रही थी।
उसी रात रागिनी ने निखिल से नाराज़ होकर कह दिया, “आप इस घर के लिए सब कुछ करते हैं, पर कभी ये महसूस नहीं होने देते कि आप हमसे प्यार भी करते हैं। बच्चों को आपकी जरूरत है, सिर्फ पैसे की नहीं। मुझे पति चाहिए, कोई मशीन नहीं।” निखिल कुछ क्षण चुप रहे। उनकी आँखों में एक पल को जैसे कुछ काँपा, मगर अगले ही पल उन्होंने बस इतना कहा, “सुबह जल्दी उठना है, सो जाओ।” यही जवाब था। रागिनी और भी आहत हो गई। उसने करवट बदल ली।
दिन बीतते गए। एक सुबह निखिल ऑफिस गए तो शाम तक लौटे नहीं। फोन भी नहीं उठा। घर में चिंता फैल गई। रात को करीब नौ बजे दरवाजे की घंटी बजी। सामने निखिल के सहकर्मी वरुण खड़े थे। उनके साथ निखिल भी थे, मगर बहुत थके, टूटे और पीले पड़े हुए। पता चला ऑफिस में काम करते हुए उन्हें चक्कर आ गया था। जांच के लिए अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टर ने आराम करने की सलाह दी थी।
घर लाकर जब रागिनी ने उनका बैग खोला ताकि दवाइयाँ निकाल सके, तो उसमें एक पुरानी डायरी, कुछ रिपोर्ट्स और एक लिफाफा मिला। वह पहले तो ठिठकी, फिर रिपोर्ट देखकर उसके हाथ काँप गए। निखिल पिछले आठ महीनों से दिल की गंभीर बीमारी का इलाज करा रहे थे। डॉक्टर ने सर्जरी की सलाह दी थी, मगर उन्होंने तारीख आगे बढ़ा दी थी। कारण लिखा था—“बेटी की स्कूल फीस, माँ की दवाइयाँ, होम लोन की किश्त, पत्नी की सिलाई मशीन खरीदनी है।” रागिनी की आँखों से आँसू बह निकले। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह यह सब पढ़ रही है या कोई बुरा सपना देख रही है।
उसने कांपते हाथों से डायरी खोली। पहले पन्ने पर लिखा था—
“कुछ दर्द ऐसे होते हैं जिन्हें कहना आसान नहीं होता। अगर मैं बोलूँगा तो घर डर जाएगा। अगर चुप रहूँगा तो शायद सब मुस्कुरा लेंगे।”
आगे लिखा था—
“रागिनी नाराज़ रहती है कि मैं उससे बातें नहीं करता। सच तो यह है कि जब भी उसके सामने बैठता हूँ, दिल चाहता है कह दूँ कि मैं उससे बहुत प्यार करता हूँ। मगर फिर सोचता हूँ, अगर मेरी बीमारी की बात जानकर उसकी आँखों की चमक चली गई तो? वह पहले ही बहुत कुछ संभाल रही है।”
एक और पन्ने पर लिखा था—
“मीरा आज कह रही थी कि उसके दोस्त के पापा उसे मेले ले गए। मुझे बहुत बुरा लगा। मैंने तय किया, इस महीने ओवरटाइम करूंगा और अगले रविवार बच्चों को बाहर लेकर जाऊँगा। शायद मैं अच्छा पिता नहीं दिखता, पर कोशिश हर दिन करता हूँ।”
एक पन्ने पर रागिनी के बारे में लिखा था—
“उसे नई सिलाई मशीन दिलानी है। कई बार उसे पुरानी मशीन के साथ संघर्ष करते देखा है। वह अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती है। शायद मैं शब्दों में उसका साथ नहीं दे पाता, मगर चाहता हूँ कि उसके सपने कभी अधूरे न रहें।”
रागिनी फूट-फूटकर रो पड़ी। उसकी सारी शिकायतें उस पल उसके सामने बिखर गईं। जिस आदमी को वह पत्थर समझती रही, उसके भीतर तो पूरा समंदर दबा था। वह आदमी जो कभी अपनी तकलीफ नहीं कहता था, वही सबसे ज्यादा सबका ख्याल रखता था। वह अपने दर्द से नहीं, परिवार के डर से चुप था।
अगली सुबह जब निखिल की आँख खुली, रागिनी उनके पास बैठी थी। उसकी आँखें सूजी हुई थीं। निखिल ने धीमे स्वर में पूछा, “तुम सोई नहीं?” रागिनी ने उनके हाथ अपने हाथों में लेकर कहा, “इतना सब अकेले क्यों सहा? हम क्या सिर्फ खुशियों में आपके अपने हैं? दर्द में नहीं?” निखिल ने नजरें झुका लीं। बहुत देर बाद बोले, “मैं तुम्हें टूटता नहीं देख सकता था। माँ की उम्र हो गई है, बच्चे छोटे हैं। अगर मैं डर जाता तो घर कैसे संभलता?”
रागिनी ने रोते हुए कहा, “घर तब नहीं संभलता जब एक इंसान सब कुछ अकेले उठाता है। घर तब संभलता है जब सब मिलकर एक-दूसरे का दर्द भी उठाएँ।” निखिल की आँखें भर आईं। शायद पहली बार उन्होंने खुलकर रोना स्वीकार किया था। उनकी चुप्पी दरक रही थी।
उस दिन के बाद घर का माहौल बदलने लगा। रागिनी ने सिलाई का छोटा काम शुरू किया। शारदा देवी ने अपने गहनों में से एक पुरानी चूड़ी बेचने की जिद की। आरव ने कोचिंग के बजाय घर पर पढ़ने की बात कही। मीरा ने अपने गुल्लक के पैसे लाकर पापा की हथेली पर रख दिए और बोली, “पापा, आप जल्दी ठीक हो जाइए, मुझे मेले नहीं जाना, बस आपके साथ बैठना है।” यह सुनकर निखिल ने उसे सीने से लगा लिया।
कुछ ही दिनों में निखिल की सर्जरी की तारीख तय हो गई। अस्पताल जाते समय उनके चेहरे पर डर साफ था, मगर इस बार वह अकेले नहीं थे। पूरा परिवार उनके साथ था। ऑपरेशन कई घंटों तक चला। बाहर बैठी रागिनी ने पहली बार मन-ही-मन स्वीकार किया कि प्रेम हमेशा शब्दों में नहीं मिलता, कभी-कभी वह जिम्मेदारियों की चुप तहों में छुपा होता है। कोई इंसान हर समय “मैं तुमसे प्यार करता हूँ” कहे, यह जरूरी नहीं; कभी वह बिना बोले भी पूरी उम्र प्रेम निभा देता है।
सर्जरी सफल रही। कुछ महीनों बाद निखिल धीरे-धीरे सामान्य जीवन में लौटने लगे। फर्क बस इतना आया कि अब वह कभी-कभी शाम को छत पर बैठकर रागिनी से बातें कर लेते। मीरा की ड्राइंग देखते हुए मुस्कुरा देते। आरव के मैच के बारे में पूछ लेते। और रागिनी ने भी शिकायतों की जगह समझ को जगह दे दी। उसने सीखा कि हर चुप्पी बेरुखी नहीं होती; कुछ चुप्पियाँ बहुत गहरे प्रेम की रखवाली करती हैं।
एक रात रागिनी ने निखिल से पूछा, “अगर मैं वह डायरी न पढ़ती, तो?”
निखिल हल्का-सा मुस्कुराए, “तो शायद मैं पूरी उम्र तुम्हारे सामने वही सख्त आदमी बना रहता।”
रागिनी ने कहा, “और मैं पूरी उम्र यह समझ ही नहीं पाती कि सबसे ज्यादा ख्याल वही लोग रखते हैं, जो अपने जज़्बात छुपा लेते हैं।”
उस रात दोनों बहुत देर तक चुप बैठे रहे। मगर वह चुप्पी पहले जैसी नहीं थी। उसमें दूरी नहीं थी, उसमें अपनापन था, समझ थी, और वह प्रेम था जिसे शब्दों की जरूरत नहीं रह गई थी।
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