**बेटियाँ मेहमान नहीं होतीं**

 पिछले चार-पांच दिनों से मेरे पड़ोस वाले फ्लैट में कुछ ज्यादा ही चहल-पहल थी। बच्चों के दौड़ने-भागने की आवाजें, कभी जोर से हंसने की तो कभी टीवी की तेज आवाज। आमतौर पर वहाँ शांति ही रहती थी क्योंकि मेरी पड़ोसन, कविता, और उसके पति दोनों बहुत ही शांत स्वभाव के थे। एक दिन सुबह जब मेरी कामवाली बाई, शांति ताई, घर में झाड़ू लगा रही थी, तो मैंने यूं ही पूछ लिया, "ताई, आजकल कविता के घर में बड़ी रौनक है, कोई मेहमान आए हैं क्या?"


शांति ताई ने अपने पल्लू से मुँह पोंछते हुए अपने चिर-परिचित अंदाज़ में कहा, "अरे भाभी जी, कविता मैडम की ननद आई हुई हैं अपने दो बच्चों के साथ। सुना है कि उनके पति काम के सिलसिले में कोई लंबे टूर पर बाहर गए हैं, तो वो यहीं आकर रुक गई हैं। अब बेचारी कविता मैडम को दिन भर किचन में खटना पड़ रहा है। ननदें तो मायके में आकर बस हुक्म चलाती हैं और काम बढ़ाती हैं।"


मैंने ताई की बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया क्योंकि दूसरों की जिंदगी में तांक-झांक करना मेरी आदत नहीं थी। दो दिन बाद शाम के समय मैं अपनी सात साल की बेटी को लेकर सोसाइटी के प्ले एरिया में गई। सर्दियों की हल्की-हल्की गुलाबी ठंड शुरू हो चुकी थी और पार्क में बच्चों का शोर गूंज रहा था। मैंने देखा कि कविता भी एक बेंच पर बैठी बच्चों को खेलते हुए देख रही थी। मैं जाकर उसके पास बैठ गई।


"कैसी हो कविता? आजकल तो बड़ी व्यस्त लग रही हो," मैंने मुस्कुराते हुए बात शुरू की।


कविता ने एक थकी हुई लेकिन बहुत ही सुकून भरी मुस्कान के साथ जवाब दिया, "हाँ दीदी, बस दीदी (ननद) आई हुई हैं ना बच्चों के साथ, तो घर में रौनक लगी रहती है।"


हम लोग बच्चों की पढ़ाई और सोसाइटी की बातें करने लगे। बातों-बातों में मैंने भी यूं ही पूछ लिया, "तुम्हारी ननद के पति टूर पर गए हैं ना? बेचारी का यहाँ मन लग जाता है? आखिर अपने घर की और पति की याद तो आती ही होगी।"


मेरा इतना पूछना था कि कविता की वो सुकून भरी मुस्कान अचानक कहीं गायब हो गई। उसकी आँखों में एक अजीब सी नमी और दर्द तैर गया। उसने चारों तरफ देखा कि कहीं कोई सुन तो नहीं रहा, फिर एक गहरी सांस लेते हुए बोली, "दीदी, जो बात मैंने सोसाइटी में सबको और यहाँ तक कि उन मासूम बच्चों को बता रखी है, वो सच नहीं है। उनके पति किसी टूर पर नहीं गए हैं।"


मैं थोड़ी हैरान रह गई, "मतलब? सब ठीक तो है ना?"


कविता ने अपनी नजरें नीचे झुका लीं और उसकी आवाज भारी हो गई, "कुछ भी ठीक नहीं है दीदी। मेरी ननद, सुमेधा दीदी, की शादी को दस साल हो गए हैं। बाहर से उनकी जिंदगी जितनी खुशहाल दिखती थी, अंदर से उतनी ही खोखली और खौफनाक थी। उनके पति... वो इंसान ही नहीं हैं। वो पिछले कई सालों से दीदी पर हाथ उठा रहे थे, उन्हें मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित कर रहे थे। दीदी सिर्फ इसलिए सब चुपचाप सहती रहीं क्योंकि उन्हें लगता था कि मायके में माता-पिता तो अब हैं नहीं, अगर भाई-भाभी के घर लौट कर गई, तो समाज क्या कहेगा? भाई पर बोझ बनूंगी, भाभी ताने देगी... यही सब सोचकर वो रोज घुट-घुट कर जी रही थीं।"


मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं। मुझे शांति ताई की वो बात याद आ गई जहाँ वो कह रही थी कि 'बेचारी कविता को खटना पड़ रहा है'। समाज कितनी जल्दी दूसरों के बारे में अपनी राय बना लेता है बिना उनका दर्द जाने।


कविता ने आगे कहा, "पिछली बार जब मेरे पति किसी काम से उनके शहर गए और उनसे मिलने अचानक उनके घर पहुँच गए, तो उन्होंने सुमेधा दीदी के चेहरे पर चोट के ताजे निशान देख लिए। जब मेरे पति ने सख्ती से पूछा, तो दीदी उनके गले लगकर फूट-फूट कर रो पड़ीं। मेरे पति उसी वक्त उन्हें और बच्चों को लेकर यहाँ आ गए। बच्चे अभी छोटे हैं, उन्हें इस गंदगी और ट्रॉमा से दूर रखने के लिए हमने ये 'लंबे टूर' वाली कहानी गढ़ी है ताकि बच्चों के मन में अपने पिता की छवि अचानक से भयानक न बन जाए। दीदी अंदर से पूरी तरह टूट चुकी हैं। उनका आत्मविश्वास जैसे खत्म सा हो गया है।"


"तो अब तुम लोग क्या करोगे?" मैंने कांपती आवाज में पूछा।


कविता ने मेरी आँखों में देखते हुए जो कहा, उसने मेरे रोंगटे खड़े कर दिए और मेरे मन में उसके लिए सम्मान को आसमान पर पहुंचा दिया। "करेंगे क्या दीदी? ये घर जितना मेरे पति का है, उतना ही सुमेधा दीदी का भी है। मायका सिर्फ माँ-बाप के जिंदा रहने तक ही थोड़ी होता है। मैंने अपने पति से साफ कह दिया है कि अब दीदी कभी उस नर्क में वापस नहीं जाएंगी। हम बहुत जल्द तलाक की अर्जी डाल रहे हैं। लोग कहते हैं कि भाभी और ननद में कभी नहीं बनती, पर मैं पूछती हूँ कि जब एक औरत ही दूसरी औरत का दर्द नहीं समझेगी, तो ये समाज कैसे बदलेगा? वो इस घर की बेटी हैं, और बेटियाँ कभी मेहमान या बोझ नहीं होतीं। जब तक वो खुद अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो जातीं, वो यहीं रहेंगी, अपने घर में, अपने हक़ और पूरे सम्मान के साथ। मैंने उनसे कहा है कि जब तक मैं हूँ, उन्हें खुद को अनाथ समझने की कोई जरुरत नहीं है।"


कविता की बातें सुनकर मेरी आँखों से आँसू छलक पड़े। मैंने उसका हाथ अपने हाथों में कसकर पकड़ लिया। आज मुझे उस शांत और साधारण सी दिखने वाली लड़की के अंदर एक इतनी मजबूत ढाल नजर आ रही थी, जिसने अपनी ननद को दुनिया की हर बुरी नजर और हर ताने से बचा कर अपने आंचल में छुपा लिया था। 


तभी सुमेधा पार्क में आती हुई दिखाई दीं। उनके चेहरे पर हल्की सी उदासी जरूर थी, लेकिन एक सुरक्षा का भाव भी था। उनके हाथों में बच्चों के लिए जूस के दो डिब्बे थे। कविता तुरंत उठी और दौड़कर उनके पास गई, "अरे दीदी, आप क्यों ले आईं? बच्चों को प्यास लगी थी तो मुझे फोन कर देतीं ना, मैं ले आती।" सुमेधा ने मुस्कुराकर प्यार से कविता के गाल पर हाथ रखा। उन दोनों के बीच जो प्यार और अपनापन था, वो किसी सगी बहनों से भी गहरा लग रहा था। 


मैं बस वहीं बैठी उन दोनों को देखती रही। आज मुझे गहराई से समझ आ गया था कि खून के रिश्ते तो जन्म से मिलते हैं, लेकिन जो रिश्ते एहसास, सम्मान और एक-दूसरे के दर्द को बांटने से बनते हैं, वो दुनिया में सबसे पवित्र होते हैं।


क्या आपने भी कभी अपने आस-पास किसी ननद-भाभी के रिश्ते में ऐसा बेमिसाल प्यार और एक-दूसरे के लिए ऐसा मजबूत सहारा देखा है? क्या सच में मायका सिर्फ माता-पिता के होने तक ही होता है, या भाई-भाभी का प्यार उसे हमेशा जिंदा रख सकता है? अपने विचार और अनुभव कमेंट बॉक्स में हमारे साथ जरूर साझा करें।


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