दिसंबर की एक सर्द और कोहरे भरी सुबह थी। रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर खड़ी ट्रेन का इंजन धुआं छोड़ते हुए सीटी बजा रहा था। भारी मन और नम आंखों के साथ नीता ने अपना सूटकेस ट्रेन के डिब्बे में रखा और नीचे खड़े अपने पति, रमेश की तरफ देखा। रमेश के चेहरे पर एक गहरी उदासी छाई हुई थी, जिसे वह जबरदस्ती की मुस्कान के पीछे छिपाने की कोशिश कर रहा था। नीता ने खिड़की से हाथ बाहर निकालकर रमेश का हाथ थाम लिया।
"बस कुछ ही महीनों की बात है रमेश। जैसे ही कोई लंबा वीकेंड आएगा या कोई त्योहार की छुट्टियां मिलेंगी, मैं तुरंत वापस आ जाऊंगी," नीता ने अपने कांपते होठों से कहा।
रमेश ने एक ठंडी आह भरी और नीता की आँखों में देखते हुए कहा, "यही कहते-कहते हमारी आधी उम्र बीत गई नीता। तुम दिल्ली में और मैं यहाँ लखनऊ में। छुट्टियों का इंतज़ार करते-करते कैलेंडर के पन्ने तो बदल जाते हैं, लेकिन हमारी ये दूरियां कभी खत्म नहीं होतीं। मुझे अब ये खाली घर काटने को दौड़ता है।"
नीता की आँखों से एक आंसू छलक कर रमेश के हाथ पर आ गिरा। उसने अपनी आवाज़ को स्थिर करते हुए कहा, "क्या मुझे इस तरह अकेले उस अजनबी शहर में रहना अच्छा लगता है? लेकिन अपने परिवार और अपने बच्चे के लिए इतना त्याग तो हमें करना ही पड़ेगा ना। तुम जानते हो कि हमारे बेटे, आर्यन का पुणे के मेडिकल कॉलेज में एडमिशन होना है। वहाँ की फीस और डोनेशन का खर्च लाखों में है। तुम्हारी सरकारी क्लर्क की पगार से तो घर का खर्च ही मुश्किल से चलता है। अगर मैं अपनी यह प्राइवेट नौकरी छोड़ दूँगी, तो आर्यन डॉक्टर कैसे बन पाएगा?"
रमेश ने बेबसी से सिर हिलाते हुए कहा, "तो क्या हम कोई लोन नहीं ले सकते? मैं अपनी पीएफ की रकम निकाल लेता हूँ। कुछ भी कर लेंगे, पर अब तुम वो नौकरी छोड़ दो। मैं अब और अकेले नहीं रह सकता। उम्र ढल रही है हमारी, अब ये भागदौड़ मुझसे नहीं देखी जाती।"
"कैसी बातें करते हो रमेश? कर्ज का बोझ लेकर हम अपनी बची-खुची जिंदगी भी तनाव में गुजार देंगे। और फिर आर्यन की पढ़ाई का खर्च लगातार बढ़ता ही जाएगा। मैं तुमसे वादा करती हूँ, सच कह रही हूँ, बस आर्यन की पढ़ाई पूरी हो जाए और वो किसी अस्पताल में अपनी प्रैक्टिस शुरू कर दे, उसके तुरंत बाद मैं अपना इस्तीफा दे दूंगी और हमेशा-हमेशा के लिए तुम्हारे पास आ जाऊंगी। फिर हम कभी अलग नहीं होंगे।"
इससे पहले कि रमेश कुछ और कह पाता, ट्रेन ने एक ज़ोरदार झटका खाया और धीरे-धीरे प्लेटफार्म छोड़ने लगी। रमेश तब तक उस ट्रेन को देखता रहा जब तक वह कोहरे में पूरी तरह से ओझल नहीं हो गई।
नीता और रमेश की यह कहानी सिर्फ एक दिन की नहीं थी। पिछले सात सालों से उनका यही रूटीन था। जब आर्यन दसवीं में था, तभी नीता का तबादला दिल्ली हो गया था। पैसे अच्छे मिल रहे थे, इसलिए उसने नौकरी नहीं छोड़ी। एक माँ अपने बच्चे के भविष्य के लिए अपने वर्तमान की हर खुशी कुर्बान कर सकती है। नीता दिल्ली के एक छोटे से पेइंग गेस्ट (पीजी) में रहती थी। वह खुद पर एक रुपया भी फालतू खर्च नहीं करती थी। त्योहारों पर जब दूसरी महिलाएं नए कपड़े खरीदती थीं, तब नीता ओवरटाइम कर रही होती थी ताकि कुछ और पैसे जोड़ सके।
उधर लखनऊ में रमेश का जीवन भी किसी तपस्या से कम नहीं था। सुबह उठकर खुद के लिए सूखी रोटियां बनाना, दिन भर ऑफिस में खटना और रात को एक खाली, सुनसान घर में लौटकर आना उसकी नियति बन गई थी। दोनों पति-पत्नी वीडियो कॉल पर एक-दूसरे को देखकर मुस्कुराते जरूर थे, लेकिन उस मुस्कान के पीछे का खालीपन दोनों महसूस कर सकते थे। उन्होंने अपनी जवानी के वो खूबसूरत साल, जो उन्हें एक साथ टहलते हुए, चाय पीते हुए और हंसते-बोलते हुए गुजारने चाहिए थे, वे साल आर्यन की मेडिकल की किताबों और फीस की रसीदों में दफन कर दिए थे।
समय बीतता गया। इस इंतजार में नीता के बालों में सफेदी झांकने लगी थी और रमेश के कंधों ने भी झुकना शुरू कर दिया था। जोड़ों के दर्द और अकेलेपन की उदासी ने दोनों को समय से पहले बूढ़ा कर दिया था। लेकिन उनके इस अथाह त्याग का फल आखिरकार मीठा ही निकला। एक दिन नीता के फोन की घंटी बजी। दूसरी तरफ आर्यन था। उसकी आवाज़ में खुशी और गर्व साफ झलक रहा था।
"माँ! मेरा सिलेक्शन हो गया है। पुणे के सबसे बड़े मल्टी-स्पेशियलिटी अस्पताल में मुझे सीनियर रेजिडेंट की नौकरी मिल गई है। और पैकेज इतना है कि अब आपको और पापा को पूरी जिंदगी कुछ भी करने की जरूरत नहीं है," आर्यन खुशी से चिल्ला रहा था।
नीता के हाथ से फोन छूटते-छूटते बचा। वह वहीं फर्श पर बैठ गई और फूट-फूट कर रोने लगी। यह आंसू पिछले सात सालों की घुटन, अकेलेपन और थकान के आंसू थे जो आज खुशी में बदल गए थे। उसने उसी वक्त अपना लैपटॉप खोला और अपना इस्तीफा टाइप करके एचआर को भेज दिया। उसने जो वादा रमेश से किया था, उसे निभाने का वक्त आ गया था।
दो दिन बाद, लखनऊ स्टेशन पर रमेश खड़ा था। उसके हाथ में एक लाल गुलाब था, जो उसने सात साल पहले नीता को तब दिया था जब वे आखिरी बार साथ छुट्टियां मनाने गए थे। जैसे ही नीता ट्रेन से उतरी, रमेश की आँखें भर आईं। नीता का चेहरा थकान से भरा था, आँखों के नीचे डार्क सर्कल थे और शरीर कमजोर हो गया था। रमेश भी अब पहले जैसा फुर्तीला नहीं रहा था।
नीता ने आगे बढ़कर रमेश के हाथ से वह गुलाब लिया और उसके सीने से लग गई। "मैं आ गई रमेश, अब मैं तुम्हें छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगी," नीता ने सिसकते हुए कहा।
रमेश ने उसके माथे को चूमते हुए कहा, "तुम्हारे बिना ये घर, ये जिंदगी सब वीरान था। हमने आर्यन के भविष्य के लिए अपने आज की बड़ी कीमत चुकाई है नीता। लेकिन आज जब तुम्हें अपने सामने देख रहा हूँ, तो लग रहा है जैसे मेरी रुकी हुई सांसें वापस आ गई हों।"
उस शाम, सालों बाद उस पुराने घर के बरामदे में दो कुर्सियां एक साथ लगी थीं। चाय के दो प्याले रखे थे और उनमें से उठती भाप में उनके मिलन का सुकून साफ नजर आ रहा था। उन्होंने अपने हिस्से का त्याग कर दिया था, और अब जीवन की ढलती शाम में उनके पास सिर्फ एक-दूसरे का साथ था, जिसे अब कोई दूर नहीं कर सकता था।
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