रेत की तरह फिसलता वक्त और टूटे धागे

 शहर की चकाचौंध से दूर, एक छोटे से कस्बे में देवकी देवी का पुराना लेकिन साफ-सुथरा घर आज बहुत सूना लग रहा था। देवकी देवी के दो बेटे थे—बड़ा बेटा आकाश और छोटा बेटा माधव। बचपन में दोनों भाइयों के बीच अथाह प्रेम था। पिता के जल्दी गुजर जाने के बाद देवकी ने सिलाई-कढ़ाई करके दोनों बच्चों को पाला था। आकाश पढ़ाई में तेज और महत्वकांक्षी था, जबकि माधव स्वभाव से बहुत सीधा, सरल और अपनी मां की परछाई बनकर रहने वाला था। आकाश का सपना हमेशा से बड़े शहर जाकर एक बहुत बड़ा बिजनेसमैन बनने का था। उसने अपनी मेहनत से इंजीनियरिंग की और फिर दिल्ली जाकर अपना खुद का व्यवसाय शुरू कर दिया। देखते ही देखते आकाश की किस्मत चमकी और वह करोड़ों की कंपनी का मालिक बन गया। दूसरी तरफ, माधव ने कस्बे में ही रहकर एक छोटी सी नौकरी कर ली ताकि वह अपनी बूढ़ी मां की देखभाल कर सके।


शुरुआत में आकाश हर त्योहार पर घर आता था। लेकिन जैसे-जैसे उसका व्यापार बढ़ा, उसकी व्यस्तता भी बढ़ती गई। पहले उसने त्योहारों पर आना कम किया, फिर फोन कॉल्स की संख्या घटने लगी। अब उसका सिर्फ हर महीने की पहली तारीख को एक मोटा चेक घर आ जाता था। देवकी देवी उस चेक को देखकर ठंडी आह भरतीं। उन्हें पैसों की नहीं, बल्कि अपने बड़े बेटे के उस स्पर्श की दरकार थी, जब वह उनके माथे को चूमकर कहता था, "मां, मैं आ गया।" माधव अपनी मां की इस उदासी को समझता था। वह अक्सर आकाश को फोन करके कहता, "भैया, कुछ दिनों के लिए ही सही, घर आ जाओ। मां आपकी राह देखते-देखते कमजोर होती जा रही हैं।" लेकिन आकाश का रटा-रटाया जवाब होता, "माधव, तू समझता क्यों नहीं? मेरे कंधों पर करोड़ों की जिम्मेदारी है। मां को कोई भी दिक्कत हो, मुझे बता। मैं दुनिया का सबसे अच्छा डॉक्टर बुला दूंगा। बस अभी मेरे पास वक्त नहीं है।"


वक्त किसी का इंतजार नहीं करता। देवकी देवी की तबीयत अचानक बहुत ज्यादा खराब हो गई। डॉक्टर ने जवाब दे दिया। माधव ने घबराकर आकाश को फोन किया और रोते हुए कहा, "भैया, मां की हालत बहुत नाजुक है। वो बस आपका नाम ले रही हैं। प्लीज, सब कुछ छोड़कर आ जाओ।" उस पार से आकाश की आवाज में एक उलझन थी, "माधव, आज मेरी एक विदेशी कंपनी के साथ सबसे बड़ी डील साइन होनी है। इस डील पर मेरा पूरा भविष्य टिका है। मैं अभी कैसे आ सकता हूं? तू चिंता मत कर, मैं शहर के सबसे बड़े अस्पताल से एंबुलेंस और एक विशेषज्ञ डॉक्टर भेज रहा हूं। पैसों की कोई फिक्र मत करना।" 


माधव चिल्लाया, "भैया, मां को आपके पैसों या किसी बड़े डॉक्टर की नहीं, अपने बड़े बेटे की जरूरत है!" लेकिन आकाश ने यह कहकर फोन काट दिया कि वह डील खत्म होते ही अगली सुबह की फ्लाइट से आ जाएगा। 


उस रात, देवकी देवी की आंखें दरवाजे पर ही टिकी रहीं। हर आहट पर उन्हें लगता कि उनका आकाश आ गया है। लेकिन आकाश नहीं आया। माधव ने अपनी मां का सिर अपनी गोद में रखा हुआ था। देवकी देवी ने माधव का हाथ पकड़ा, एक गहरी सांस ली और हमेशा के लिए अपनी आंखें मूंद लीं। उनका इंतजार उनकी आखिरी सांस के साथ ही खत्म हो गया। 


अगली दोपहर जब आकाश अपनी लग्जरी कार से घर पहुंचा, तो घर के आंगन में सफेद चादर ओढ़े उसकी मां हमेशा के लिए सो चुकी थी। आकाश को देखकर भी माधव अपनी जगह से नहीं उठा। आकाश दौड़कर अपनी मां के पास गया और फूट-फूट कर रोने लगा। उसने अपनी मां को पुकारा, लेकिन अब जवाब देने वाला कोई नहीं था। 


अंतिम संस्कार के बाद, जब सारे रिश्तेदार चले गए, तो घर में सिर्फ एक भयानक सन्नाटा और दोनों भाई रह गए। आकाश अपराधबोध से जल रहा था। उसे पहली बार एहसास हुआ कि उसकी करोड़ों की संपत्ति उसकी मां की एक सांस नहीं खरीद सकती थी। वह माधव के पास गया, जो आंगन में एक कोने में शून्य में ताक रहा था। 


आकाश ने माधव के कंधे पर हाथ रखा और रुंधे हुए गले से कहा, "मुझे माफ कर दे माधव। मैं बहुत अंधा हो गया था। मैंने दौलत कमाने के चक्कर में अपना सब कुछ खो दिया। पर अब मैं सब ठीक कर दूंगा। मैं अपनी कंपनी का आधा हिस्सा तेरे नाम कर रहा हूं। तू भी मेरे साथ दिल्ली चल। हम दोनों भाई मिलकर रहेंगे। मैं तुझे दुनिया की हर खुशी दूंगा। प्लीज मुझे माफ कर दे।"


माधव ने धीरे से आकाश का हाथ अपने कंधे से हटाया। उसकी आंखों में कोई गुस्सा नहीं था, बस एक ऐसा खालीपन था जो किसी भी दर्द से ज्यादा गहरा होता है। 


माधव बड़ी शांत आवाज में बोला, "भैया, आपने अपनी मेहनत से जो दौलत कमाई है, वह आपको मुबारक हो। मुझे आपकी संपत्ति का कोई हिस्सा नहीं चाहिए। आपने जो पैसे भेजे, उससे घर का खर्च आराम से चलता था। लेकिन भैया, जब मां रात-रात भर दर्द से तड़पती थीं और दरवाजे की तरफ देखकर रोती थीं, तब उस दर्द का इलाज आपकी कोई चेकबुक नहीं कर पाई। जब मुझे अपने बड़े भाई के सहारे की जरूरत थी, जब मैं रातों को डर के मारे रोता था कि मां को कुछ हो गया तो मैं क्या करूंगा, तब आप अपने बिजनेस की मीटिंग्स में व्यस्त थे।"


आकाश ने कांपते हुए कहा, "मैं जानता हूं माधव, मैंने बहुत बड़ी गलती की है। लेकिन मुझे एक मौका दे दे। मैं अपना रिश्ता पहले जैसा करना चाहता हूं।"


माधव ने एक हल्की, दर्द भरी मुस्कान के साथ कहा, "भैया, व्यापार में अगर घाटा हो जाए, तो आप और मेहनत करके उसे दोबारा कमा सकते हैं। एक बंगला बिक जाए, तो कल आप उससे भी बड़ा बंगला खरीद सकते हैं। जिंदगी में सब कुछ दुबारा मिल सकता है... लेकिन वक्त के साथ खोया हुआ रिश्ता और भरोसा दोबारा नहीं मिल सकता। जिस मां को आपकी जरूरत थी, वो जा चुकी है। और जिस भाई को आपका साथ चाहिए था, उसने अब अकेले जीना सीख लिया है। हमारे बीच खून का रिश्ता तो हमेशा रहेगा, लेकिन वो जो एक अहसास था, वो जो एक दूसरे पर अंधा भरोसा था... वो आपकी उस बड़ी सी डील के साथ ही कहीं बहुत पीछे छूट गया है।"


आकाश वहीं घुटनों के बल बैठ गया और जोर-जोर से रोने लगा। उसके पास दुनिया की हर सुख-सुविधा थी, बैंक में बेहिसाब दौलत थी, लेकिन अपने ही घर में वह आज सबसे बड़ा कंगाल बन चुका था। माधव उठकर अंदर चला गया, और आकाश उस खाली आंगन में अपने पश्चाताप की आग में जलता रह गया, यह जानते हुए कि वक्त की रेत मुट्ठी से पूरी तरह फिसल चुकी थी।


दोस्तों, क्या आपको लगता है कि माधव का अपनी जगह यह फैसला सही था? क्या कामयाबी के लिए परिवार को नजरअंदाज करना सही है? अपने विचार कमेंट करके जरूर बताएं।


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