घर में शहनाई की मधुर धुन और गेंदे के ताजे फूलों की महक ने पूरे मोहल्ले को बता दिया था कि आज माधव के आंगन की चिड़िया उड़ने वाली है। बेटी रिया की शादी थी, और पूरे घर में मेहमानों की गहमागहमी और भागदौड़ मची हुई थी। कोई टेंट वाले को झालर ठीक करने का निर्देश दे रहा था, तो कोई हलवाई के पास बैठकर गुलाब जामुन और रसमलाई की गिनती कर रहा था। एक पिता होने के नाते मेरे मन में घबराहट और उत्साह का एक अजीब सा मिश्रण था। मैं हर छोटी-बड़ी चीज पर नजर रख रहा था कि कहीं कोई कमी न रह जाए।
इसी आपाधापी के बीच, मेरी पत्नी नीता ने मेरे माथे का पसीना अपने पल्लू से पोंछते हुए कहा, "सुनिए जी! जरा किसी समझदार आदमी को गाड़ी लेकर रेलवे स्टेशन भेज दीजिए। अपनी जबलपुर वाली बुआ जी यानी सुभद्रा दीदी की ट्रेन का समय हो गया है। अगर स्टेशन पर उन्हें कोई लेने नहीं पहुंचा, तो घर के दरवाजे पर कदम रखते ही उनका भाषण शुरू हो जाएगा कि 'अरे माधव! इतने बड़े शहर में आकर अपनी बड़ी बहन को बिल्कुल ही भूल गया क्या? अपनी इकलौती जीजी के लिए एक गाड़ी तक नहीं भेज पाया!'"
नीता ने बिल्कुल दीदी के ही अंदाज और उसी लहजे में उनकी नकल उतारी, जिसे सुनकर मेरी सारी थकान के बीच भी एक जोर की हंसी छूट गई। मैंने मुस्कुराते हुए तुरंत अपने भतीजे को ड्राइवर के साथ गाड़ी लेकर स्टेशन की तरफ रवाना कर दिया। नीता जानती थी कि सुभद्रा दीदी स्वभाव से थोड़ी सख्त और शिकायत करने वाली हैं, लेकिन नीता के दिल में उनके लिए बहुत सम्मान था।
"अच्छा सुनो, वो जो मेहमानों और खास रिश्तेदारों को रिटर्न गिफ्ट देने हैं, उनकी पैकिंग पूरी हो गई ना? वो चांदी के सिक्कों वाले डिब्बे और साड़ियां सही से गिनकर रखवा दिए हैं न तुमने?" मैंने नीता से पूछा, क्योंकि शादी वाले घर में हर पल कोई न कोई काम छूटने का डर लगा ही रहता है। नीता ने बड़ी ही तसल्ली से मुस्कुराते हुए अपना एक हाथ मेरे कंधे पर रखा और दूसरे हाथ से अदरक और इलायची वाली कड़क चाय का एक प्याला मेरी ओर बढ़ा दिया।
"आप बिल्कुल फिक्र मत कीजिए, मैंने सब कुछ गिनकर अंदर वाले कमरे में सुरक्षित रखवा दिया है। आप बस यह चाय पीजिए, थोड़ी देर कुर्सी पर बैठिए और लंबी सांस लीजिए। सब बहुत अच्छे से हो जाएगा," नीता की इन बातों और उस एक कप चाय ने मेरी सारी चिंता हर ली।
चाय पीते हुए मैं सुभद्रा दीदी के बारे में सोचने लगा। बचपन में ही हमारे सिर से मां का साया उठ गया था। दीदी मुझसे दस साल बड़ी थीं। उन्होंने ही एक मां की तरह मुझे पाल-पोसकर बड़ा किया था। वे हमेशा मुझ पर रौब झाड़ती थीं, हर बात में नुक्स निकालती थीं, लेकिन मेरे लिए दुनिया से लड़ भी जाती थीं। शादी के बाद वे जबलपुर चली गईं, लेकिन उनका वह डांटने वाला स्वभाव कभी नहीं बदला।
करीब एक घंटे बाद घर के बाहर एक गाड़ी आकर रुकी। मोहल्ले के बच्चे चिल्लाए, "जबलपुर वाली बुआ आ गई!" घर के सारे काम जैसे एक पल के लिए थम गए। गाड़ी का दरवाजा खुला और सुभद्रा दीदी बाहर उतरीं। उन्होंने उतरते ही अपना चश्मा नाक पर टिकाया, घर की सजावट को ऊपर से नीचे तक घूरा और शुरू हो गईं।
"अरे माधव! ये कैसा फीका सा टेंट लगवाया है? शादी है कि कोई साधारण सी पूजा? और ये कैसा ड्राइवर भेजा था, पूरे शहर का चक्कर लगवाकर लाया है। मैं तो ट्रेन में ही सोच रही थी कि मेरे भाई को अब मेरी कहां परवाह है। बिटिया की शादी है, तो जीजी की याद तो सबसे अंत में ही आएगी ना!"
नीता ने मेरी तरफ देखकर आंख मारी और तुरंत आगे बढ़कर दीदी के पैर छुए। "अरे नहीं दीदी, आपके बिना तो इस घर का कोई काम शुरू ही नहीं होता। आप बस आ गई हैं, अब सब शुभ होगा। आप अंदर आइए।"
दीदी बड़बड़ाते हुए अंदर आईं। मैं उनके सामने जाकर हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। दीदी की नजरें मुझ पर पड़ीं और अचानक उनकी सारी शिकायतें, सारे ताने न जाने कहां गायब हो गए। उनका कठोर चेहरा एकदम से नरम पड़ गया और उन्होंने मुझे कसकर गले से लगा लिया। उनकी आंखें भर आई थीं। "मेरा छोटा सा माधव आज इतना बड़ा हो गया कि अपनी बिटिया के हाथ पीले कर रहा है। देख तो, तेरे बालों में कितनी सफेदी आ गई है।" उनकी रुंधे गले की आवाज ने मेरी भी आंखें नम कर दीं। वह जो बाहर से एक सख्त बहन दिख रही थीं, अंदर से पूरी तरह एक भावुक मां थीं।
कमरे में जाने के बाद दीदी ने अपना पुराना पीतल का संदूक खोला। उसमें से कपूर की एक मीठी सी महक आई। उन्होंने संदूक के सबसे निचले हिस्से से एक लाल रंग की पुरानी, लेकिन बेहद खूबसूरत और सहेज कर रखी हुई बनारसी चुनरी निकाली, जिस पर सच्चे गोटे का काम था।
"माधव, तुझे याद है ये क्या है?" दीदी ने कांपते हाथों से वह चुनरी मेरी ओर बढ़ाई। "ये अम्मा की आखिरी निशानी है। जब मेरी शादी हुई थी, तो अम्मा ने मुझे ये चुनरी ओढ़ाई थी। उन्होंने जाते समय मुझसे कहा था कि जब माधव की बेटी की शादी होगी, तो ये चुनरी उसे पहनाना। मैं इतने सालों से इसी एक दिन का इंतजार कर रही थी।"
मैं अवाक रह गया। जिस बहन को मैं हमेशा शिकायत करने वाली समझता था, वह अपने दिल में हमारी मां का प्यार और एक ऐसा अनमोल तोहफा न जाने कितने सालों से संजोकर बैठी थी। नीता भी यह देखकर भावुक हो गई और उसने अपने आंसू पोंछे। दीदी ने दुल्हन बनी रिया को कमरे में बुलाया और अपने हाथों से वह लाल चुनरी उसके सिर पर ओढ़ा दी। रिया ने झुककर बुआ के पैर छुए। उस पल, घर का वह कोना सिर्फ एक कमरा नहीं, बल्कि एक पवित्र मंदिर बन गया था, जहां एक मां का आशीर्वाद एक बहन के जरिए हम तक पहुंचा था।
अक्सर हम अपने जीवन की भागदौड़ में रिश्तों की गहराई को भूल जाते हैं। हमें लगता है कि जो लोग हमसे शिकायत करते हैं, वे शायद हमसे नाराज हैं या हमारे काम में नुक्स निकाल रहे हैं। लेकिन हकीकत यह होती है कि वे सिर्फ हम पर अपना हक जताते हैं। सुभद्रा दीदी की वो डांट, वो ताने, दरअसल उनका वो तरीका था जिससे वो मुझे ये एहसास दिलाना चाहती थीं कि चाहे मैं कितना भी बड़ा क्यों न हो जाऊं, उनके लिए मैं हमेशा उनका वो छोटा सा भाई ही रहूंगा जिसे उनकी सबसे ज्यादा जरूरत है।
शादी की बाकी सारी रस्में दीदी की देखरेख में ही पूरी हुईं। उन्होंने हलवाई से लेकर फेरों तक की सारी व्यवस्था अपने हाथों में ले ली। नीता और मैं बस एक सुकून भरे कोने में खड़े होकर उस बड़ी बहन को देख रहे थे, जिसने हमारे घर की सारी जिम्मेदारियों का बोझ पल भर में अपने कंधों पर उठा लिया था। विदाई के समय जब रिया रो रही थी, तो दीदी ही थीं जिसने उसे सबसे ज्यादा हौसला दिया, हालांकि उनकी अपनी आंखें भी आंसुओं से छलछला रही थीं।
क्या आपके घर में भी कोई ऐसा बड़ा-बुजुर्ग या भाई-बहन है जो ऊपर से सख्त दिखता है, शिकायतें करता है, लेकिन अंदर से सिर्फ आपके लिए प्यार और फिक्र समेटे हुए है? उनके बारे में अपनी यादें हमें कमेंट में जरूर बताएं।
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