सुमन जी की आँखों से आँसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। कल ही तो उनकी लाडली बेटी, निहारिका की विदाई हुई थी। जिस घर में चौबीस घंटे निहारिका की पायल की छम-छम और उसकी खिलखिलाहट गूँजती थी, आज वह घर किसी सूने मंदिर सा लग रहा था। बेटी का कमरा, उसके छोड़े हुए कपड़े, सब कुछ सुमन जी को रुला रहा था। लेकिन तभी दरवाजे पर एक कार आकर रुकी। उनके इकलौते बेटे, मयंक और नई-नवेली बहू, काव्या ने घर के भीतर कदम रखा। काव्या और मयंक की शादी निहारिका की शादी से कुछ महीने पहले ही हुई थी और वे मयंक की नौकरी के कारण दूसरे शहर में रहते थे। अपनी ननद की शादी में शामिल होने के बाद वे कुछ दिन रुक कर वापस जाने वाले थे।
काव्या को देखते ही सुमन जी के भीतर का वह खालीपन जैसे अचानक सिमट गया। बेटी की विदाई का वह भारी गम उन्होंने अपने सीने में कहीं बहुत गहरे दबा लिया और अपने चेहरे पर एक चौड़ी मुस्कान सजा ली। काव्या एक बहुत ही शांत और समझदार लड़की थी। सुमन जी को उस पर अपनी निहारिका सा ही स्नेह उमड़ आता था। उन्होंने काव्या को गले से लगा लिया और उसकी नज़र उतारी। "आ गई मेरी बच्ची," सुमन जी ने माथे को चूमते हुए कहा। काव्या को अपनी सास का यह व्यवहार बहुत सुखद लगा। उसने हमेशा समाज में सास-बहू के कड़वे रिश्तों की कहानियाँ ही सुनी थीं, लेकिन यहाँ तो सब कुछ उलट था।
घर के पुरुष, यानी मयंक और उसके पिता रमेश जी, हमेशा की तरह सुमन जी की इस भावुकता पर हंसने लगे। डाइनिंग टेबल पर खाना परोसते समय रमेश जी ने मज़ाक में कहा, "काव्या बेटा, तुम्हारी सास को तो दुनिया में सब अच्छे ही लगते हैं। ये तो रास्ते चलते अजनबी में भी रिश्ते ढूंढ लेती हैं। तुम तो फिर भी इस घर की इकलौती बहू हो, इनका प्यार तो तुम पर सावन की झड़ी की तरह बरसेगा।" मयंक ने भी हँसते हुए हामी भरी, "बिल्कुल सही कहा पापा! मम्मी तो बस प्यार लुटाना जानती हैं, चाहे सामने वाले को कद्र हो या ना हो।"
सुमन जी ने बनावटी गुस्सा दिखाते हुए कहा, "तुम बाप-बेटे अपना खाना खाओ। मेरी बेटी आई है, मैं तो प्यार लुटाऊँगी।" काव्या यह सब देखकर मुस्कुरा रही थी। सच में, उन सात दिनों में समय कैसे पंख लगाकर उड़ गया, किसी को पता ही नहीं चला। सुमन जी ने काव्या को रसोई के किसी भी काम में हाथ नहीं लगाने दिया। वह सुबह काव्या की पसंद का नाश्ता बनातीं, दोपहर में उसके साथ बैठकर पुरानी एल्बम देखतीं और रात को उसे अपने पास सुलाकर ढेरों बातें करतीं। काव्या को लगने लगा था कि उसे मायके की कमी कभी महसूस ही नहीं होगी।
लेकिन रिश्ते की असली परख तो तब होती है जब कोई मुश्किल वक्त आता है। सातवें दिन घर में कुछ खास रिश्तेदारों को खाने पर बुलाया गया था। सुमन जी ने काव्या को घर की चाबियों का गुच्छा थमाते हुए कहा था कि आज शाम के मेहमानों के लिए मिठाई और कुछ खास बर्तन निकालने की ज़िम्मेदारी उसकी है। काव्या बहुत खुश थी कि उसे इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी मिली है। वह रसोई में तैयारी कर ही रही थी कि अचानक उसके हाथ से फिसल कर शीशे का एक बहुत पुराना और कीमती जार ज़मीन पर गिरकर चकनाचूर हो गया। यह जार रमेश जी की दादी की निशानी था और सुमन जी उसे जान से ज्यादा संभाल कर रखती थीं।
कांच के टूटने की आवाज़ सुनकर बाहर बैठे रिश्तेदार और रमेश जी तुरंत रसोई में आ गए। कीमती जार को टुकड़ों में बिखरा देखकर रमेश जी का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया। रिश्तेदारों ने भी दबी ज़बान में ताने मारने शुरू कर दिए। "नई लड़कियाँ हैं, कहाँ पुराने बर्तनों की कद्र जानती हैं," एक बुआ जी ने व्यंग्य किया। काव्या डर के मारे काँप रही थी। उसकी आँखों से आँसू गिरने लगे। उसे लगा कि आज तो सुमन जी उसे घर से निकाल ही देंगी या खूब खरी-खोटी सुनाएँगी।
तभी सुमन जी भीड़ को चीरते हुए रसोई में आईं। उन्होंने कांच के टुकड़ों को देखा और फिर सहमी हुई काव्या को। पल भर के लिए उनकी आँखों में दुख की एक लकीर उभरी, लेकिन अगले ही पल उन्होंने जो किया, उसने सबको हैरान कर दिया। सुमन जी ने आगे बढ़कर काव्या को गले से लगा लिया।
"कोई बात नहीं बेटा, कांच ही तो था, टूट गया," उन्होंने बहुत ही शांत और प्यार भरे स्वर में कहा। फिर उन्होंने बुआ जी की तरफ मुड़कर कहा, "दीदी, बर्तन टूट गया तो क्या हुआ, मेरी बच्ची को चोट तो नहीं आई ना? ये निशानी तो बस एक निर्जीव चीज़ थी, मेरी असली निशानी और इस घर की जान तो मेरी बहू है। और वैसे भी, घर के बच्चों से ही तो नुकसान होता है। मेरी निहारिका से भी तो न जाने कितने बर्तन टूटे हैं, तब तो किसी ने उसे कुछ नहीं कहा।"
रसोई में एकदम सन्नाटा छा गया। रमेश जी का गुस्सा भी शांत हो गया। काव्या फफक कर रो पड़ी। आज तक उसने सिर्फ सुना था कि सास माँ समान होती है, लेकिन आज सुमन जी ने इसे साबित कर दिया था। उन्होंने भरी महफिल में अपनी बहू को वह सम्मान और सुरक्षा दी थी, जो अक्सर एक सगी माँ ही देती है।
रात को जब सब मेहमान चले गए, तो काव्या चुपचाप सुमन जी के कमरे में आई। वह उनके पैरों के पास बैठ गई और उनका हाथ चूमते हुए बोली, "माँ... आज आपने मुझे जो दिया है, वो मैं ज़िंदगी भर नहीं भूल सकती। मुझे हमेशा डर लगता था कि शायद मैं कभी आपकी बेटी निहारिका की जगह नहीं ले पाऊँगी, लेकिन आज आपने मुझे सच में अपनी बेटी बना लिया।"
सुमन जी ने काव्या के आँसू पोंछे और उसे अपने सीने से लगा लिया। "पगली, जगह तो उसकी ली जाती है जो दिल से निकल जाए। निहारिका मेरे दिल के एक हिस्से में है, और तू दूसरे में। जब बेटियां विदा होती हैं, तो घर की दीवारें रोती हैं, लेकिन जब बहू आती है, तो वह उसी घर को फिर से एक नया जीवन दे देती है। तूने तो मेरे उस दर्द को बाँट लिया जो मैं किसी से कह नहीं पा रही थी।"
दरवाजे के पास खड़े रमेश जी और मयंक यह सब सुन रहे थे। आज उन्हें समझ आ गया था कि सुमन जी का वो 'अंधा प्यार' कोई मज़ाक नहीं था, बल्कि वो एक ऐसी जादुई छड़ी थी जो किसी भी पराये को अपना बना सकती थी। काव्या के मन में अब कोई डर नहीं था। वह जानती थी कि उसे एक ऐसा घर मिल गया है जहाँ उसकी गलतियों को भी प्यार से सुधारा जाएगा और उसे हमेशा एक बेटी का दर्जा मिलेगा।
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