राख से उभरती ज़िंदगी

 शाम का वक्त था। सूरज की ढलती हुई सुनहरी किरणें बाज़ार की भीड़ पर एक अजीब सी छटा बिखेर रही थीं। मैं कपड़े की एक दुकान से बाहर निकल रही थी कि तभी मेरी नज़र साड़ियों की एक दुकान के बाहर खड़ी एक लड़की पर पड़ी। मैं उसे देखकर ठिठक गई। वह कोई और नहीं, मेरी पुरानी पड़ोसन और मेरी मुँहबोली भतीजी, राधिका थी। उसे देखते ही मेरा चेहरा एकदम खिल उठा। राधिका हमेशा से चुलबुली, चहकती हुई और रंगों से भरी रहने वाली लड़की थी। लेकिन जैसे ही मैंने भीड़ को चीरते हुए उसके करीब जाकर उसे गौर से देखा, तो मेरा जी धक से रह गया। 


उसके माथे की वह चमकती हुई लाल बिंदी गायब थी। मांग सूनी थी, कलाइयां कांच की चूड़ियों से पूरी तरह खाली थीं और उसका चेहरा एकदम भावनाशून्य और पीला पड़ चुका था। उसकी आँखों के नीचे गहरे काले घेरे थे, जैसे सदियों से वह सोई न हो। उस सुनहरी धूप में भी उसका वजूद किसी बेजान परछाईं जैसा लग रहा था। यह वही राधिका थी जिसकी शादी दो साल पहले ही बहुत धूमधाम से हुई थी। उस भयानक दृश्य को देखकर मुझे चक्कर सा आने लगा। मैंने पास ही बने एक खंभे को कसकर पकड़ लिया और खुद को गिरने से संभाला।


मैंने कांपते हुए कदमों से उसके पास जाकर उसके कंधे पर हाथ रखा। ''राधिका... बेटा, कब आईं तुम? और यह... यह सब क्या है?''


मेरी आवाज़ सुनते ही राधिका के सूखे हुए होंठ कांपने लगे। उसने मेरी तरफ देखा और उसकी सूनी आँखों से आंसुओं का सैलाब फूट पड़ा। वह वहीं बाज़ार के किनारे मुझसे लिपट गई और फफक-फफक कर रोने लगी। मैं उसे वहाँ से निकालकर पास ही एक शांत पार्क में ले गई और बेंच पर बिठाया। बहुत देर तक फूट-फूट कर रोने के बाद, जब उसका मन थोड़ा हल्का हुआ, तो उसने अपनी रुंधे हुए गले से जो दास्तान सुनाई, उसने मेरे रोंगटे खड़े कर दिए।


''सब खत्म हो गया आंटी,'' राधिका ने अपने आंसुओं को पोंछते हुए कहा, ''एक कार दुर्घटना में मेरे पति, विकास, मुझे हमेशा के लिए छोड़कर चले गए। उनके जाने का दुख मैं अभी सह भी नहीं पाई थी कि ससुराल वालों ने मुझ पर ताने कसने शुरू कर दिए। मुझे 'अशुभ' और 'कुलक्षिणी' कहकर मेरे पति की मौत का ज़िम्मेदार ठहराया गया। उनका दुर्व्यवहार इतना बढ़ गया कि मेरे लिए उस घर में सांस लेना भी दूभर हो गया। अंततः मुझे धक्के मारकर उस घर से निकाल दिया गया।''


राधिका ने एक गहरी और सर्द सांस ली और आगे बोली, ''मैं टूट चुकी थी। मुझे लगा कि कम से कम मेरा मायका तो मुझे पनाह देगा। मैं यहाँ अपने भैया-भाभी के पास आ गई। शुरुआत के दो-चार दिन तो सबने मुझे हाथों-हाथ लिया। मेरी किस्मत पर खूब आंसू बहाए गए। लेकिन जैसे ही शोक का माहौल खत्म हुआ, घर के रंग बदलने लगे। मेरी भाभी, मीनल, और मेरे सगे भैया, सुमित, मेरी अवहेलना करने लगे। बात-बात पर मुझे ताने दिए जाते कि मैं उनके सिर पर आ पड़ी हूँ। मैं उस घर में सुबह से रात तक एक नौकरानी की तरह काम करती हूँ, फिर भी मैं उनके लिए एक बोझ ही हूँ। मेरी बूढ़ी माँ सब कुछ देखती और समझती हैं, लेकिन भैया-भाभी के सामने उनकी एक नहीं चलती। वो बस कोने में छुपकर रोती रहती हैं।''


राधिका की आँखों में अब आंसुओं की जगह एक भयानक निराशा थी। ''आंटी, मुझे अपना जीवन एक बोझ लगने लगा है। हर सुबह उठकर दूसरों की नफरत भरी निगाहें सहने से अच्छा है कि मैं अपनी जान दे दूँ। मेरा अब इस दुनिया में कोई नहीं है। मरने का मन करता है।''


उसकी यह बात सुनकर मेरे अंदर का ममतामयी गुस्सा जाग उठा। मैंने उसके दोनों कंधे कसकर पकड़े और उसकी आँखों में आँखें डालकर कहा, ''पागल हो गई हो तुम? मरने की बात करती हो? क्या तुम्हारा जीवन इतना सस्ता है कि चंद स्वार्थी लोगों के तानों के आगे तुम उसे खत्म कर लोगी? विकास के जाने से तुम्हारा सुहाग उजड़ा है राधिका, तुम्हारी साँसें और तुम्हारी काबलियत नहीं!''


मैंने उसे याद दिलाया कि शादी से पहले उसने बी.एड. की पढ़ाई कितनी लगन से पूरी की थी। ''तुम पढ़ी-लिखी हो। तुम किसी पर बोझ क्यों बन रही हो? जब इंसान का कोई अपना सहारा नहीं होता, तो उसे खुद अपना सहारा बनना पड़ता है। रोना बंद करो और अपने उन आंसुओं को अपनी ताकत बनाओ। उन लोगों के लिए क्यों मरना, जो तुम्हारे जीने की कद्र नहीं करते?''


मेरी बातों ने राधिका के अंदर की बुझती हुई चिंगारी को जैसे हवा दे दी। उस दिन के बाद राधिका ने मायूस होना छोड़ दिया। उसने अपनी भाभी के तानों का जवाब अपने आंसुओं से देना बंद कर दिया। मैंने शहर के एक अच्छे प्राइवेट स्कूल में बात की, जहाँ उन्हें एक योग्य शिक्षिका की तलाश थी। राधिका ने इंटरव्यू दिया और अपनी काबलियत के दम पर उसे नौकरी मिल गई। 


शुरुआत के दिन बहुत कठिन थे। वह सुबह जल्दी उठकर घर का सारा काम निपटाती और फिर शान से सिर उठाकर स्कूल पढ़ाने जाती। जब पहली तनख्वाह उसके हाथ में आई, तो उसने वह लिफाफा अपनी माँ के हाथों में रखा और उसी दिन उसने एक 'वर्किंग विमेंस हॉस्टल' में अपना कमरा ले लिया। जिस घर में उसके आत्मसम्मान की कोई कीमत नहीं थी, उस घर की चौखट को उसने हमेशा के लिए छोड़ दिया। 


आज राधिका उसी स्कूल में वाइस-प्रिंसिपल है। उसका एक अपना छोटा सा सुंदर फ्लैट है। उसके चेहरे पर अब कोई शून्यता नहीं, बल्कि एक गरिमामयी आत्मविश्वास है। जो भैया-भाभी कल तक उसे बोझ समझते थे, आज समाज में उसकी तरक्की और रुतबा देखकर उसके आगे-पीछे घूमते हैं, लेकिन राधिका ने एक बेहद शालीन और सम्मानजनक दूरी बना रखी है। अपनी बूढ़ी माँ का सारा खर्च और उनकी देखभाल अब राधिका ही करती है। उसने साबित कर दिया कि एक औरत का वजूद किसी के सहारे का मोहताज नहीं होता, वह खुद अपने जीवन की निर्माता होती है।


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