कोख से परे की ममता

 रात के लगभग बारह बज चुके थे, लेकिन सुजाता की आँखों में नींद का कोई नामोनिशान नहीं था। घर के बाहर लगे शामियाने से गेंदे के फूलों और मोगरे की मिली-जुली भीनी-भीनी महक अंदर तक आ रही थी। सुजाता अपने कमरे में पलंग के किनारे बैठी अपने दोनों हाथों को निहार रही थी। उसके हाथों में बहुत ही खूबसूरत और गहरी मेहंदी रची हुई थी, जिसका गहरा लाल रंग उसकी खुशी की गवाही दे रहा था। उसके चेहरे पर एक अजीब सा सुकून और होंठों पर एक प्यारी सी मुस्कान थी।


तभी कमरे का दरवाज़ा खुला और उसके पति, विकास अंदर आए। वे दिन भर की भागदौड़ से काफी थके हुए लग रहे थे। विकास ने अपना कुर्ता उतारते हुए सुजाता को मेहंदी निहारते देखा तो उनके चेहरे पर एक हल्की सी व्यंग्यात्मक मुस्कान आ गई। उन्होंने सुजाता को टोकते हुए कहा, "सुजाता, माना कि माथुर साहब हमारे बहुत पुराने पड़ोसी हैं, लेकिन तुम पिछले एक हफ्ते से जिस तरह से पागलों की तरह काम कर रही हो, अपनी सेहत की भी परवाह नहीं कर रही, वो कुछ ज़्यादा ही है। आखिर को है तो वो पड़ोसियों की बेटी। तुम्हारे इस उत्साह को देखकर तो बस एक ही कहावत याद आती है— 'बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना'।"


विकास का यह कटाक्ष सुजाता के कानों में पड़ा ज़रूर, लेकिन आज उसके दिल की खुशी के आगे यह व्यंग्य बहुत ही बौना और बेमानी था। सुजाता ने मुस्कुराते हुए विकास की तरफ देखा और बहुत ही शांत स्वर में कहा, "सच कहूँ विकास, आज शायद माथुर साहब और उनकी पत्नी से भी ज़्यादा मैं खुश हूँ। मेरे लिए ये कोई 'बेगानी' शादी नहीं है।" 


सुजाता की आँखों के सामने वो दिन किसी फिल्म की रील की तरह घूमने लगा, जब माथुर परिवार उनके पड़ोस में रहने आया था। उनकी बेटी शिखा उस वक्त बमुश्किल पाँच साल की थी। शिखा की माँ, विनीता, अक्सर बीमार रहती थीं। ऐसे में शिखा का ज़्यादातर समय सुजाता के घर पर ही बीतता था। सुजाता, जिसके घर में सिर्फ दो बेटे थे, उसे शिखा के रूप में जैसे एक बेटी मिल गई थी। विनीता के निधन के बाद तो जैसे शिखा ने सुजाता के घर को ही अपना घर मान लिया था। शिखा के स्कूल का टिफिन बनाने से लेकर, उसकी दो चोटियां गूंथने, उसकी फ्रॉक में मैचिंग रिबन लगाने और उसे रात को कहानियाँ सुनाकर सुलाने तक—सुजाता ने शिखा को अपनी सगी बेटी से भी बढ़कर प्यार दिया था। 


विकास को शायद वो सारे पल याद नहीं थे, लेकिन सुजाता जानती थी कि जब शिखा ने पहली बार साइकिल चलाना सीखा था, तो उसके घुटने छिलने पर माथुर साहब से पहले सुजाता की आँखें रोई थीं। शिखा की हर छोटी-बड़ी ज़िद, उसके कॉलेज के पहले दिन की घबराहट और उसकी हर कामयाबी सुजाता के ही आँगन में तो परवान चढ़ी थी। आज जब वही शिखा दुल्हन बनने जा रही थी, तो सुजाता के लिए वो कोई 'पड़ोसन' या 'बेगानी' कैसे हो सकती थी?


सुजाता ने विकास की बातों को अनसुना कर दिया और अपने आप को शादी की बाकी रस्मों के लिए तैयार कर लिया। अगले दिन सुबह से ही हल्दी की रस्म शुरू हो गई। सुजाता ने शिखा के लिए अपने हाथों से उबटन पीसा था। जब शिखा को हल्दी लगाई जा रही थी, तो शिखा की नज़रें भीड़ में सिर्फ 'बड़ी माँ' (सुजाता) को ही ढूँढ रही थीं। सुजाता ने आगे बढ़कर जैसे ही शिखा के गालों पर हल्दी लगाई, शिखा ने उसे कसकर गले लगा लिया। दोनों की आँखें नम थीं, लेकिन ये खुशी के आंसू थे। संगीत की रात में सुजाता ने अपने घुटनों के दर्द को भुलाकर औरतों के साथ जमकर डांस किया। आस-पड़ोस की औरतें भी कानाफूसी कर रही थीं कि सुजाता तो सगी माँ से भी ज़्यादा इतरा रही है। लेकिन सुजाता को दुनिया की किसी भी बात की कोई परवाह नहीं थी। आज उसकी बेटी दुल्हन बन रही थी, और यह हक उससे कोई नहीं छीन सकता था।


विवाह की रात आ गई। शिखा लाल जोड़े में किसी अप्सरा जैसी लग रही थी। जब शिखा मंडप में बैठी, तो सुजाता मंडप के बिल्कुल पास एक खंभे का सहारा लेकर खड़ी रही। उसकी नज़रें शिखा से हट ही नहीं रही थीं। कन्यादान के समय जब माथुर साहब की आँखें भर आईं, तो सुजाता ने ही आगे बढ़कर उनका ढांढस बंधाया। फेरों के समय सुजाता के होंठ लगातार शिखा की खुशहाल ज़िंदगी के लिए दुआएं मांग रहे थे। 


लेकिन हर शादी का सबसे मुश्किल पल होता है—विदाई। सुबह की पहली किरण के साथ जब विदाई की वेला आई, तो पूरे घर में एक खामोश उदासी छा गई। शिखा ने अपने पिता को गले लगाकर बहुत रोई। उसके बाद जब वह आगे बढ़ी, तो उसकी नज़रें सुजाता पर आकर टिक गईं। सुजाता, जो अब तक अपने आंसुओं को बहुत मजबूती से रोके हुए थी, शिखा को अपनी तरफ आता देख पूरी तरह से टूट गई। 


शिखा दौड़कर सुजाता के सीने से लग गई और दहाड़ें मारकर रोने लगी। "बड़ी माँ... मैं आपको छोड़कर कैसे जाऊंगी? वहाँ मुझे सुबह उठकर चाय कौन देगा? मेरी बातों पर मुझे कौन डांटेगा?" शिखा के ये शब्द सुजाता के दिल को चीर रहे थे।


सुजाता ने शिखा का माथा चूमा, उसके आंसुओं को अपने हाथों से पोंछा और रुंधे हुए गले से कहा, "पगली, बेटियां तो चिड़ियों की तरह होती हैं, आज नहीं तो कल उन्हें अपना घोंसला बनाना ही पड़ता है। तू तो मेरी बहादुर बेटी है ना? जा, अपने नए घर को भी इसी तरह अपनी हंसी से महकाना।"


विकास दूर खड़े यह सब देख रहे थे। आज उन्हें एहसास हो गया था कि सुजाता के लिए शिखा कोई बेगानी नहीं थी। कोख से जन्म न देने के बावजूद सुजाता ने शिखा के लिए जो ममता महसूस की थी, वह दुनिया के किसी भी खून के रिश्ते से बड़ी थी। सुजाता ने शिखा की डोली को भारी मन से विदा किया। गाड़ी के धूल उड़ाते हुए दूर जाने तक सुजाता वहीं खड़ी रही। आज उसका घर ही नहीं, बल्कि उसका दिल भी पूरी तरह से सूना हो गया था। सुजाता ने भले ही शिखा को जन्म नहीं दिया था, लेकिन आज एक माँ अपनी बेटी की विदाई का पूरा दर्द और पूरा सुकून एक साथ महसूस कर रही थी।


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क्या आपके जीवन में भी कोई ऐसा रिश्ता है जो खून का न होकर भी सगे रिश्तों से कहीं बढ़कर है? या क्या आपने भी कभी किसी की खुशी में खुद को इस कदर शामिल किया है कि दुनिया की परवाह न रही हो? अपने विचार और अनुभव नीचे कमेंट करके ज़रूर बताएं। 


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