मन के रिश्ते

  सुमित्रा जी ने वह पोटली सुशीला के हाथों में रख दी और मुस्कराते हुए बोलीं, "सुशीला, काव्या का दाखिला नहीं रुकेगा। कल ही जाकर इसके गहने गिरवी रख दो या बेच दो, और ये फिक्स्ड डिपाजिट भी मैं कल ही तुड़वा लूंगी। मेरी बच्ची डॉक्टर बनेगी।


शहर के उस पुराने लेकिन शानदार घर के दालान में बैठी साठ वर्षीय सुमित्रा जी अक्सर अपने अतीत के पन्नों को पलटती रहती थीं। उनके चेहरे पर समय की गहरी लकीरें थीं, और आँखों में एक अजीब सा सूनापन। उन्होंने अपना पूरा जीवन अपने इकलौते बेटे रोहित और पति की सेवा में लगा दिया था। पति के जाने के बाद रोहित ही उनका इकलौता सहारा था। लेकिन जैसे-जैसे रोहित बड़ा हुआ, उसके सपने भी बड़े हो गए। शादी के बाद रोहित अपनी पत्नी शिखा के साथ अमेरिका जाकर बस गया। 


शुरुआत में फोन रोज़ आते थे, फिर हफ़्ते में एक बार, और अब तो महीनों बीत जाते थे उनकी आवाज़ सुने। जब भी फोन आता, तो बातों का केंद्र सुमित्रा जी की सेहत नहीं, बल्कि इस पुश्तैनी घर को बेचकर पैसे भेजने की ज़िद होती थी। शिखा को हमेशा यही लगता था कि सुमित्रा जी उनके ऐशो-आराम के बीच एक बोझ हैं। बेटे-बहू की इस बेरुखी ने सुमित्रा जी को भीतर तक तोड़ दिया था, लेकिन उन्होंने कभी किसी से कोई शिकायत नहीं की।


उसी घर के पीछे बने एक छोटे से हिस्से (आउटहाउस) में सुमित्रा जी की पुरानी किरायेदार और दूर के रिश्ते में बहन लगने वाली सुशीला अपनी इकलौती बेटी काव्या के साथ रहती थी। सुशीला के पति का कई साल पहले देहांत हो चुका था, जिसके बाद सुमित्रा जी ने ही उन्हें अपने पास आसरा दिया था। सुशीला दूसरों के कपड़े सिलकर अपना और अपनी बेटी का गुज़ारा करती थी। 


काव्या, जो अब उन्नीस साल की हो चुकी थी, सुमित्रा जी के सूने जीवन में एक ठंडी हवा के झोंके की तरह थी। वह सुमित्रा जी को 'बड़ी माँ' बुलाती थी। रोहित भले ही हज़ारों मील दूर था, लेकिन काव्या ने कभी सुमित्रा जी को अकेलेपन का एहसास नहीं होने दिया। सुमित्रा जी की सुबह काव्या की मीठी आवाज़ से होती और शाम उसके कॉलेज के किस्से सुनते हुए ढलती। काव्या ही उनका चश्मा ढूँढ कर देती, उनके घुटनों पर तेल मालिश करती, और उनके साथ बैठकर उनके पुराने दिनों की बातें सुनती। सुमित्रा जी काव्या के बिना अब एक दिन भी नहीं रह पाती थीं।


दिन बीतते गए और काव्या ने अपनी मेहनत से मेडिकल प्रवेश परीक्षा (NEET) पास कर ली। यह सुशीला के लिए बहुत बड़ी ख़ुशी की बात थी, लेकिन इस ख़ुशी के साथ एक बहुत बड़ा पहाड़ भी टूट पड़ा था। मेडिकल कॉलेज की फीस और हॉस्टल का खर्च इतना ज्यादा था कि सुशीला की जीवन भर की जमा-पूंजी भी उसके आगे कम पड़ रही थी। सुशीला ने कई रिश्तेदारों के आगे हाथ फैलाए, लेकिन सबने कोई न कोई बहाना बनाकर पल्ला झाड़ लिया। 


एक शाम सुमित्रा जी ने देखा कि सुशीला अपने कमरे में बैठी फूट-फूट कर रो रही है और काव्या गुमसुम सी दीवार को ताक रही है। सुमित्रा जी से रहा नहीं गया। उन्होंने अंदर जाकर सुशीला के कंधे पर हाथ रखा। सुशीला ने रोते हुए कहा, "दीदी, मेरी बच्ची का सपना टूट जाएगा। मैं एक अभागी माँ हूँ जो अपनी होनहार बेटी की फीस तक नहीं भर सकती। लोग कहते हैं कि रिश्तेदारों से मदद मांग लूं, पर जब अपने ही साथ नहीं देते, तो दूसरों से क्या उम्मीद करूँ?"


सुमित्रा जी ने एक पल भी नहीं सोचा। वह चुपचाप अपने कमरे में गईं और अपनी अलमारी से एक पुरानी सी पोटली निकाल लाईं। यह वही पोटली थी जिसमें उनके भारी सोने के कंगन और जीवन भर की बचत के फिक्स्ड डिपाजिट के कागज़ात रखे थे। रोहित कई बार इन कागज़ातों पर हस्ताक्षर करवाने की कोशिश कर चुका था ताकि वह अमेरिका में एक बड़ा घर खरीद सके, लेकिन सुमित्रा जी ने अपने बुढ़ापे के सहारे के रूप में इन्हें बचा कर रखा था।


सुमित्रा जी ने वह पोटली सुशीला के हाथों में रख दी और मुस्कराते हुए बोलीं, "सुशीला, काव्या का दाखिला नहीं रुकेगा। कल ही जाकर इसके गहने गिरवी रख दो या बेच दो, और ये फिक्स्ड डिपाजिट भी मैं कल ही तुड़वा लूंगी। मेरी बच्ची डॉक्टर बनेगी।"


सुशीला अवाक रह गई। उसके हाथ काँप रहे थे। उसने सुमित्रा जी के पैर पकड़ लिए और रोते हुए बोली, "दीदी, यह दुनिया बहुत स्वार्थी है। आपके अपने बेटे और बहू कोई अपवाद नहीं हैं, वे आपका हाल तक नहीं पूछते। लेकिन आप... आप तो अपवाद हैं दीदी! अपनों की तो हर कोई सोचता है, लेकिन आप तो परायों के लिए अपना सब कुछ लुटा रही हैं। रोहित को पता चला तो वह बहुत हंगामा करेगा दीदी।"


सुमित्रा जी ने सुशीला को उठाकर अपने गले से लगा लिया। उनकी आँखों में एक असीम शांति थी। उन्होंने बेहद धीमे लेकिन दृढ़ स्वर में कहा, "सुशीला, इस दुनिया में अपना-पराया कुछ नहीं होता। रोहित मेरी कोख से जन्मा है, लेकिन काव्या मेरे मन से जन्मी है। रिश्ते तो मन के होते हैं बहन। जिस से मन जुड़ जाए, वही अपना लगने लगता है। काव्या को मैंने हमेशा अपनी सगी बेटी की तरह चाहा है। अगर मेरे बेटे-बहू को मेरी परवाह नहीं, तो मैं क्यों उन पर अपना प्यार व्यर्थ करूँ? काव्या के लिए कुछ भी करने से मुझे कभी रोकना मत, क्योंकि यही अब मेरे जीवन का असली सुकून है।"


दरवाज़े के पास खड़ी काव्या यह सब सुन रही थी। वह दौड़कर आई और सुमित्रा जी के गले लगकर फूट-फूट कर रोने लगी। "बड़ी माँ, मैं आपको वादा करती हूँ, आपका यह कर्ज़ मैं जीवन भर आपकी सेवा करके चुकाऊंगी।" 


सुमित्रा जी ने काव्या का माथा चूम लिया। आज उस पुराने घर में कोई सूनापन नहीं था। सुमित्रा जी को समझ आ गया था कि कोख से जन्म देने वाला ही सिर्फ माँ नहीं होता, बल्कि जो रूह से रूह को जोड़ ले, वही सच्चा परिवार होता है। उन्होंने समाज की 'अपने' और 'पराये' की परिभाषा को हमेशा के लिए बदल दिया था।


अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद


***


एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ