सुशीला जी ने जैसे ही देखा कि काम्या के हाथ में नींद की गोलियों की शीशी है और वह उन्हें निगलने ही वाली है, उन्होंने झपट कर वह शीशी दूर फेंक दी। "दिमाग खराब हो गया है तुम्हारा? पागल हो गई हो क्या? ऐसा कायरों वाला खयाल तुम्हारे मन में आया भी कैसे? चलो, उठो और चुपचाप मेरे साथ मेरे घर चलो।" सुशीला जी ने उसे लगभग डांटते हुए सहारा दिया और खींचते हुए अपने घर ले आईं। काम्या का पूरा शरीर कांप रहा था और उसकी आँखों से आँसुओं की अविरल झड़ी लगी हुई थी। सुशीला जी ने उसे सोफे पर बिठाया, उसका मुंह धुलाया और अपने हाथों से बनाकर उसे गरमागरम चाय पिलाई।
चाय के कुछ घूंट गले से नीचे उतरने के बाद काम्या का सुन्न पड़ा दिमाग थोड़ा शांत हुआ। जब उसका मूड कुछ ठीक हो गया और सिसकियां थम गईं, तो सुशीला जी ने बहुत ही स्नेह से उसके कंधे पर हाथ रखते हुए बात आगे बढ़ाई। "काम्या, मेरी बच्ची, जिंदगी से हार मान लेना समस्याओं का हल नहीं है। तुम्हारे पति विकास को गए अभी कुछ ही महीने हुए हैं। मैं जानती हूँ कि तुम पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है, लेकिन तुम तो काफी पढ़ी-लिखी हो। एम.ए. किया है तुमने। विकास की सरकारी नौकरी थी, तो अनुकंपा के आधार पर पति की जगह तुम नौकरी पर क्यों नहीं लग जातीं? इससे तुम्हारा भविष्य सुरक्षित हो जाएगा और तुम्हें किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना पड़ेगा।"
काम्या की आँखों में फिर से आंसू छलक आए। उसने रुंधे हुए गले से कहा, "मैंने सोचा था आंटी। लेकिन मुझे कल ही पता चला कि उस जगह पर देवर जी, यानी सुमित, लगने का प्रयास कर रहे हैं। सास-ससुर ने मिलकर एक वकील से कोई 'नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट' (अनापत्ति प्रमाण पत्र) बनवाया है और वे मुझ पर दबाव डाल रहे हैं कि मैं उस पर हस्ताक्षर कर दूँ ताकि विकास की नौकरी सुमित को मिल जाए। जब मैंने मना किया, तो उन्होंने मुझे घर से निकाल देने और एक पैसा न देने की धमकी दी है। रोज-रोज के इन तानों और घुटन से मैं टूट चुकी हूँ। इसलिए मुझे लगा कि मेरी जिंदगी का अंत ही मेरी मुक्ति है।"
सुशीला जी की आंखों में गुस्सा तैर गया। उन्होंने दृढ़ स्वर में कहा, "लेकिन उस नौकरी पर पहला हक तुम्हारा है काम्या! तुम विकास की पत्नी हो। यदि तुम इस तरह घुट-घुट कर नहीं, बल्कि आत्मसम्मान की जिंदगी जीना चाहती हो, तो तुम्हें अपने हक के लिए लड़ना होगा। यूं मौत को गले लगाना तो विकास की यादों का भी अपमान है।"
"लेकिन आंटी, मुझे तो बाहर की दुनिया का कुछ भी नहीं मालूम… सरकारी दफ्तरों में कैसे क्या करना है, फॉर्म कैसे भरे जाते हैं, किसके पास जाना है? मेरे मायके में भी कोई ऐसा नहीं है जो मेरी मदद कर सके।" काम्या ने अपनी बेबसी जाहिर की।
सुशीला जी ने कुछ पल सोचा और बोलीं, "हूं… मेरे पास एक आइडिया है। मेरा बेटा प्रतीक उसी शहर में हेड ऑफिस के पास रहता है और उसका सरकारी महकमों में काफी उठना-बैठना है। मैं आज ही उससे कहती हूँ, वह तुम्हारी मदद जरूर करेगा।"
सुशीला जी ने तुरंत अपना फोन उठाया और प्रतीक को कॉल मिलाया। पूरी बात सुनने के बाद प्रतीक पहले तो एकदम बिदक गया। "क्या मां, आप भी हर किसी के फटे में टांग डालती रहती हो! यह उनके परिवार का निजी मामला है। कल को काम्या के ससुराल वाले मुझ पर कोई इल्जाम लगा देंगे या झगड़ा करने आ जाएंगे तो? मुझे इन सब पचड़ों में नहीं पड़ना है।"
सुशीला जी ने फोन पर ही उसे कड़ी फटकार लगाई, "प्रतीक! मैंने तुम्हें यही संस्कार दिए हैं? अगर आज तुम्हारी अपनी बहन इस स्थिति में होती और उसके ससुराल वाले उसका हक छीन रहे होते, तब भी क्या तुम यही कहते? एक पढ़ी-लिखी बेसहारा लड़की को उसका हक दिलाना कोई 'फटे में टांग अड़ाना' नहीं है, यह इंसानियत है। अगर तुमने उसकी मदद नहीं की, तो मैं खुद बुढ़ापे में धक्के खाने शहर आ जाऊंगी।"
मां की इस भावनात्मक फटकार ने प्रतीक को पसीज दिया। वह काम्या की मदद करने के लिए तैयार हो गया। अगले ही दिन प्रतीक ने काम्या को शहर बुलाया। काम्या बहुत डरी हुई थी, लेकिन सुशीला जी ने उसे हिम्मत दी। प्रतीक ने उसे विभाग के अधिकारियों से मिलवाया। जब सुमित को भनक लगी कि काम्या अपना दावा पेश कर रही है, तो उसने घर में बहुत हंगामा किया। सास-ससुर ने काम्या का चरित्र हनन करने की कोशिश की और उसे गालियां दीं। लेकिन काम्या ने इस बार रोने के बजाय अपनी आँखें पोंछीं और दृढ़ता से उनका सामना किया। उसने साफ कह दिया कि वह किसी भी कागज पर हस्ताक्षर नहीं करेगी और अपना हक लेकर रहेगी।
प्रतीक की मदद से सारे कानूनी दस्तावेज सही समय पर जमा हो गए। क्योंकि नियमतः विधवा का पहला अधिकार होता है, इसलिए विभाग ने सुमित की अर्जी खारिज कर दी। कुछ महीनों की लंबी और थका देने वाली कागजी कार्रवाई के बाद, वह दिन भी आ गया जब काम्या के हाथ में उसकी नियुक्ति का पत्र था।
आज काम्या उसी दफ्तर में एक गरिमापूर्ण पद पर काम कर रही है। उसने अपने पति का घर छोड़ दिया है और एक छोटे से किराए के फ्लैट में सम्मान के साथ अपनी नई जिंदगी शुरू की है। सुशीला जी और प्रतीक के उस निस्वार्थ साथ ने न सिर्फ उसकी जान बचाई, बल्कि उसे वह पंख दे दिए जिनसे उसने अपने आत्मसम्मान का खुला आसमान छू लिया।
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