माथे पर लगी बिंदी और चेहरे पर एक अजीब सा सुकून लिए जब पल्लवी आज मेरे घर से विदा हुई, तो मुझे लगा जैसे मेरे सीने पर पिछले पांच सालों से रखा एक बहुत भारी पत्थर अचानक से खिसक गया हो। मेरे पति, शशांक की महीनों की भागदौड़ और सिफारिशें आखिरकार रंग लाई थीं, और पल्लवी को शहर के एक बड़े स्कूल में शिक्षिका की पक्की नौकरी मिल गई थी। आज वह अपनी पहली तनख्वाह से हमारे लिए मिठाई लेकर आई थी। उसकी वह निश्छल मुसकान देखकर मेरे मन के किसी गहरे कोने में दबी हुई आत्मग्लानि को थोड़ी शांति मिली। मुझे लगा कि शायद आज मेरी उस भयानक गलती का आंशिक पश्चात्ताप हो गया है, जिसने कभी पल्लवी की हंसती-खेलती जिंदगी को तबाह कर दिया था।
यह बात कुछ साल पुरानी है, जब पल्लवी का रिश्ता मेरे छोटे भाई के लिए आया था। पल्लवी एक बेहद होनहार, संस्कारी और सीधी-सादी लड़की थी। सब कुछ तय हो चुका था, लेकिन मेरी किसी गलतफहमी और मेरे द्वारा लगाई गई एक झूठी शंका की आग ने उस रिश्ते को मंडप तक पहुंचने से पहले ही जला कर राख कर दिया था। उस टूटे हुए रिश्ते का पल्लवी के परिवार पर ऐसा असर पड़ा कि बदनामी के डर से उसके पिता ने जल्दबाजी में पल्लवी की शादी एक ऐसे लालची और शराबी इंसान से कर दी, जिसने कुछ ही सालों में पल्लवी को शारीरिक और मानसिक रूप से इस कदर तोड़ दिया कि उसे तलाक लेकर अपने मायके वापस लौटना पड़ा। इस सदमे को पल्लवी के पिता बर्दाश्त नहीं कर पाए और उनका देहांत हो गया। जब मुझे अपनी गलती और उसकी वजह से पल्लवी की बर्बाद हुई जिंदगी की सच्चाई का पता चला, तो मैं रातों को सो नहीं पाती थी। उसी दिन मैंने शशांक के सामने रोते हुए कसम खाई थी कि मैं पल्लवी को इस नरक से बाहर निकालूंगी।
पल्लवी के मायके लौटने के बाद उसकी जिंदगी किसी सजा से कम नहीं थी। पिता के जाने के बाद घर की पूरी कमान पल्लवी के बड़े भाई, सुधीर और उसकी पत्नी, रश्मि के हाथों में आ गई थी। रश्मि के लिए पल्लवी एक अनचाहे बोझ के सिवा और कुछ नहीं थी। दो वक्त की रोटी के लिए भी पल्लवी को अपनी भाभी के सैकड़ों ताने सुनने पड़ते थे। "तलाकशुदा ननद घर में बैठी रहे तो हमारी बेटियों पर क्या असर पड़ेगा?" ऐसे शब्द पल्लवी की आत्मा को हर दिन छलनी करते थे। शशांक ने जब यह सब देखा, तो उन्होंने अपने एक दोस्त के स्कूल में पल्लवी के लिए बात की। पल्लवी के पास योग्यता की कोई कमी नहीं थी, बस उसे एक अवसर की तलाश थी। और आज, वह अवसर उसकी जिंदगी का नया सवेरा बन गया था।
नौकरी लगने के कुछ हफ्तों बाद, एक दिन बाजार में मुझे पल्लवी की मां, सुलोचना चाची मिल गईं। उनके कपड़े अब भी साधारण थे, लेकिन उनके चेहरे पर एक पुरानी जोत फिर से लौट आई थी। मुझे देखते ही उनकी आंखें भर आईं। उन्होंने बीच बाजार में मेरे दोनों हाथ पकड़ लिए और रुंधे हुए गले से कहने लगीं, "बेटी, मैं किन शब्दों में तुम्हारा और दामाद जी का एहसान मानूं। तुमने मेरी पल्लवी को एक नई जिंदगी दी है। रश्मि के तानों से मेरी बच्ची तिल-तिल कर मर रही थी। अब जब से वह खुद कमाने लगी है, कम से कम उसे अपने ही घर में किसी के सामने हाथ नहीं फैलाने पड़ते। उसकी आंखों की चमक लौटने लगी है।"
मैंने सुलोचना चाची के आंसू पोंछते हुए कहा, "चाची, इसमें एहसान कैसा। पल्लवी मेरी भी छोटी बहन जैसी है। मैं तो बस यही प्रार्थना करती हूं कि अब उसका फिर से घर भी बस जाए। अभी उस की उम्र ही क्या है? पूरी जिंदगी पड़ी है उसके सामने।"
चाची ने एक ठंडी आह भरी और बोलीं, "पता नहीं बेटी, हमारे समाज में एक तलाकशुदा औरत को कौन अपनाएगा। और सुधीर तो अब उसकी दूसरी शादी के नाम पर एक पैसा भी खर्च नहीं करना चाहता।" मैंने उन्हें ढांढस बंधाया और हम अपने-अपने रास्ते चले गए।
शायद उस दिन मेरे मुंह से निकली वह बात सीधे भगवान के दरबार में कबूल हो गई थी। मेरी जबान सच में फलीभूत हुई। करीब आठ महीने बाद सुलोचना चाची एक दिन चुपचाप मेरे घर आईं। उनके हाथ में लड्डू का एक डिब्बा था। उन्होंने दरवाजा बंद किया और मेरे पास बैठकर फुसफुसाते हुए लेकिन एक गहरी खुशी के साथ बताया कि पल्लवी ने अपने स्कूल के ही एक सहकर्मी, विकास के साथ आर्यसमाज मंदिर में शादी कर ली है। विकास एक बहुत ही सुलझा हुआ इंसान था, जिसकी पहली पत्नी का बीमारी के कारण निधन हो गया था। विकास को पल्लवी की सादगी और उसके संघर्ष ने प्रभावित किया था, और उसने पल्लवी को उसके अतीत के साथ पूरे सम्मान के साथ अपना लिया था।
यह सुनकर मेरी खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा। लेकिन जब मैंने चाची से पूछा कि सुधीर और रश्मि का इस शादी पर क्या कहना है, तो चाची के चेहरे पर एक व्यंग्यात्मक मुस्कान आ गई।
"अरे, पूछो मत," चाची ने कहा, "सुधीर और रश्मि ने तो पूरे मोहल्ले में आसमान सिर पर उठा रखा है। लोगों के सामने छाती पीट-पीट कर कह रहे हैं कि पल्लवी ने खानदान की नाक कटवा दी। बिना भाई-भाभी की मर्जी के मंदिर में जाकर भाग कर शादी कर ली, हमें तो समाज में मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा।"
"तो क्या वे सच में पल्लवी से नाराज हैं?" मैंने हैरानी से पूछा।
चाची हंस पड़ीं, "सब दिखावा है बेटी! ऊपर से तो वे दोनों इतना रोष जता रहे हैं, लेकिन मैं उनकी मां हूं, उनकी रग-रग पहचानती हूं। दोनों के कमरे से कल रात मुझे हंसने की आवाजें आ रही थीं। वे मन ही मन बहुत खुश हैं कि चलो, सिर से बहुत बड़ी बला टली। ना तो दूसरी शादी में कोई दान-दहेज देना पड़ा, ना बारातियों का स्वागत करना पड़ा, और ना ही जिंदगी भर पल्लवी का खर्च उठाना पड़ेगा। वे तो बस समाज के सामने झूठी इज्जत का नाटक कर रहे हैं, ताकि कोई उन्हें यह ना कहे कि उन्होंने अपनी बहन को घर से निकाल दिया।"
चाची की बातें सुनकर मुझे समाज की दोहरी मानसिकता पर बहुत तरस आया। लेकिन इन सब के बीच मुझे सबसे ज्यादा सुकून इस बात का था कि पल्लवी अब एक सुरक्षित और प्यार करने वाले इंसान के हाथों में थी। उसने अपनी जिंदगी की डोर खुद अपने हाथों में थाम ली थी। मेरे मन पर छाया हुआ अपराधबोध अब पूरी तरह से खत्म हो चुका था। मैंने आसमान की तरफ देखकर ईश्वर का धन्यवाद किया, जिसने मेरी एक गलती को सुधारने का मुझे मौका दिया और पल्लवी को उसकी मंजिल तक पहुंचा दिया।
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