**शिखर का मौन**

 बनारस के एक पुराने मोहल्ले में पंडित विद्याधर का पुश्तैनी मकान था। उस घर के आंगन में एक विशाल आम का पेड़ था और घर के भीतर हमेशा मेहमानों की चहल-पहल रहती थी। विद्याधर जी के दो बेटे थे—बड़ा बेटा माधव, जो पिता के साथ पुश्तैनी कपड़े का व्यापार संभालता था, और छोटा बेटा मयंक, जो पढ़ने में बहुत होशियार था। माधव ने परिवार की आर्थिक स्थिति को देखते हुए अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी थी ताकि वह छोटे भाई मयंक को शहर के सबसे बड़े कॉलेज में भेज सके और उसके सपने पूरे कर सके। मयंक ने भी अपने भाई और पिता को निराश नहीं किया। अपनी अथक मेहनत के दम पर वह देश की एक बहुत बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट बन गया। उसकी तनख्वाह करोड़ों में थी और शहर में उसका बहुत नाम था।


कई सालों बाद, मयंक अपने माता-पिता की पच्चीसवीं शादी की सालगिरह पर घर लौटा। उसके साथ उसकी चमकती हुई महंगी गाड़ी, शानदार कपड़े और बड़े शहर का रौब भी था। लेकिन इस बार, घर की चौखट पार करने वाला मयंक वह सीधा-सादा लड़का नहीं था जिसे माधव ने शहर भेजा था, बल्कि एक ऐसा इंसान था जिसके सिर पर सफलता, दौलत और रुतबे का अहंकार सवार था। घर आते ही उसने हर चीज़ में नुक्स निकालना शुरू कर दिया। कभी वह पुराने सोफे के कवर को फूहड़ बताता, तो कभी घर की सादगी भरी सजावट को 'आउटडेटेड' और अपने स्टैंडर्ड से नीचे का कहता। माधव, जो हमेशा अपने भाई की सफलता पर गर्व करता था, मयंक की इन चुभने वाली बातों को सिर्फ यह सोचकर अनसुना कर देता कि मयंक अब बड़ा आदमी बन गया है, उसका रहने का तौर-तरीका अब बदल गया होगा।


लेकिन बर्दाश्त की हद तो तब हो गई जब सालगिरह वाले दिन घर के पुराने और वफादार नौकर, रामदीन काका ने मयंक को दालान में चाय लाकर दी। रामदीन काका की उम्र साठ के पार हो चुकी थी और कमज़ोरी के कारण उनके हाथ थोड़े कांपते थे। चाय की ट्रे मेज़ पर रखते समय प्याली से कुछ बूंदें छलक कर मयंक के महंगे डिज़ाइनर सूट पर गिर गईं।


यह देखते ही मयंक का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया। वह अपनी कुर्सी से उछला और रामदीन काका पर ज़ोर से चिल्लाया, "अंधे हो गए हो क्या काका? तुम्हें पता भी है यह सूट कितने हज़ारों का है? तुम्हारी पूरी ज़िंदगी की पगार से भी ज्यादा इसकी कीमत है! तुम जैसे जाहिल लोगों को काम करने की तमीज़ ही नहीं है। पता नहीं भैया ने तुम्हें काम से क्यों नहीं निकाला।" मयंक की तेज़ और कड़वी आवाज़ से पूरा घर सन्न रह गया। रामदीन काका डर के मारे कांपने लगे और अपने दोनों हाथ जोड़कर रुआंसी आवाज़ में माफ़ी मांगने लगे, लेकिन मयंक का गुस्सा शांत नहीं हो रहा था। उसने पास खड़े माधव को भी ताना मारते हुए कह दिया, "भैया, आप इन गँवारों को काम पर रखते ही क्यों हैं? मेरा स्टैंडर्ड अब ऐसा नहीं रहा कि मैं इन फटेहाल और नासमझ लोगों के बीच रह सकूं।"


विद्याधर जी, जो दूर एक चारपाई पर बैठकर यह सब तमाशा देख रहे थे, बहुत शांति से उठे। उन्होंने रामदीन काका के हाथ से चाय की ट्रे ली, उनके कंधे पर प्यार से हाथ रखा और उन्हें अंदर रसोई में जाने को कहा। फिर वे धीमे कदमों से मयंक के पास आए। मयंक को लगा कि आज पिताजी भी उसकी बात का ही समर्थन करेंगे क्योंकि नुकसान उसका हुआ था। लेकिन विद्याधर जी ने बहुत ही शांत, गंभीर और धीमी आवाज़ में कहा, "बेटा मयंक, मेरे साथ ज़रा बाहर आंगन में आना।"


मयंक झल्लाते हुए अपने पिता के पीछे-पीछे आंगन में गया। विद्याधर जी उस पुराने आम के पेड़ के पास जाकर खड़े हो गए। गर्मियों का मौसम था और पेड़ पर उस समय बहुत सारे मीठे आम लदे हुए थे, जिसके भारीपन के कारण पेड़ की डालियां नीचे ज़मीन की तरफ झुक गई थीं।


विद्याधर जी ने उस झुकी हुई डाली की तरफ इशारा करते हुए कहा, "मयंक, इस पेड़ को बहुत ध्यान से देखो। जब इसमें कोई फल नहीं होता, तो इसकी टहनियां बिल्कुल सीधी, कठोर और अकड़ी हुई ऊपर की तरफ रहती हैं। लेकिन जब यह मीठे फलों से पूरी तरह लद जाता है, इसका मूल्य सबसे अधिक बढ़ जाता है, तो यह अत्यंत विनम्र होकर ज़मीन की तरफ झुक जाता है ताकि हर कोई इसके फलों तक पहुँच सके और इसका आनंद ले सके।"


मयंक खामोशी से अपने पिता की बातें सुन रहा था। विद्याधर जी ने उसकी आँखों में आँखें डालते हुए आगे कहा, "बेटा, ज़िंदगी का भी यही उसूल है। जब इंसान का खुद का मूल्य बढ़ जाए, जब वह सफलता के सबसे ऊँचे शिखर पर पहुँच जाए, तो उसे औरों पर चिल्लाना नहीं चाहिए। उसे इस पेड़ की तरह और भी शांत और विनम्र होना सीखना चाहिए। जो बर्तन अंदर से खाली होता है, अक्सर वही सबसे ज्यादा आवाज़ करता है। तुमने पैसा और रुतबा तो बहुत कमा लिया, लेकिन तुम्हारा मन अभी भी अहंकार से भरा और इंसानियत से खाली है। जिस रामदीन काका पर तुम आज अपनी अमीरी का रौब झाड़ रहे हो, उन्होंने बचपन में तुम्हें अपने कंधों पर बिठाकर मीलों दूर तक रामलीला दिखाई है। तुम्हारे बड़े भैया ने अपनी जवानी की सारी ख्वाहिशें मारकर तुम्हारी लाखों की फीस भरी है। तुम्हारा यह सूट भले ही पचास हज़ार का हो, लेकिन जिस रिश्ते, सम्मान और अपनेपन को तुमने अपनी इस तेज़ आवाज़ से आज तार-तार किया है, उसकी कोई कीमत नहीं चुकाई जा सकती।"


पिता के इन चंद शांत शब्दों ने मयंक के भीतर के उस खोखले अहंकार को किसी कांच के महल की तरह चकनाचूर कर दिया। उसे अचानक अपनी ओछी हरकत का बहुत गहरा अहसास हुआ। जिस सफलता पर उसे इतना गुमान था, वह अपने ही पिता की सादगी के आगे बहुत बौनी लग रही थी। मयंक की आँखों से पश्चाताप के आंसू बहने लगे। वह बिना एक पल गंवाए दौड़कर अंदर गया और रामदीन काका के पैरों में गिर पड़ा। "मुझे माफ़ कर दीजिए काका, पैसों की चकाचौंध ने मेरी अक्ल पर पर्दा डाल दिया था। मैं सच में बहुत छोटा हो गया था।" उसने अपने बड़े भाई माधव और पिता से भी हाथ जोड़कर क्षमा मांगी। उस दिन मयंक ने सिर्फ एक करोड़ों की नौकरी नहीं की थी, बल्कि उसने ज़िंदगी का सबसे बड़ा और अनमोल सबक सीखा था—कि इंसान का बड़प्पन उसकी आवाज़ उठाने में नहीं, बल्कि झुककर दूसरों को सम्मान देने में है।


क्या आपको भी लगता है कि अक्सर कामयाबी और पैसा मिलने के बाद इंसान अपने पुराने रिश्तों और ज़मीनी हकीकत को भूल जाता है? क्या सच में पैसा इंसान का मूल स्वभाव बदल देता है? अपने विचार और अपने अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में हमारे साथ ज़रूर साझा करें।


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