बारिश की बूंदें खिड़की के कांच पर गिरकर एक अजीब सा खामोश संगीत पैदा कर रही थीं। शहर के सबसे पॉश इलाके में बनी उस तीन मंजिला भव्य हवेली के एक आलीशान कमरे में राधिका खिड़की के पास उदास खड़ी थी। आज उसने गहरे हरे रंग की रेशमी साड़ी पहनी हुई थी, जिस पर सुनहरे धागों और फूलों का बहुत ही बारीक काम था। यह साड़ी उसके पति विनीत ने उसे शादी की सालगिरह पर तोहफे में दी थी। बाहर से देखने वालों के लिए राधिका इस शहर की सबसे खुशकिस्मत औरत थी। उसके पास वह सब कुछ था जिसका सपना कोई भी लड़की देख सकती है—बड़ी-बड़ी विदेशी गाड़ियां, हुक्म का इंतजार करते दर्जनों नौकर, समाज में एक ऊंचा रुतबा और एक ऐसा पति जो शहर का जाना-माना और बेहद सफल उद्योगपति था। लेकिन कांच पर फिसलती बारिश की बूंदों की तरह ही, राधिका की आंखों से भी खामोशी से आंसू बह रहे थे। इस बड़ी सी हवेली का सन्नाटा उसे अंदर ही अंदर काटने को दौड़ता था।
तभी कमरे का भारी लकड़ी का दरवाजा खुला और उसकी जेठानी, सुमेधा भाभी अंदर आईं। राधिका को इस तरह आंसुओं में डूबा और खिड़की से बाहर शून्य में घूरता देखकर सुमेधा का दिल पसीज गया। वह जानती थीं कि इस घर की दीवारों पर जितना मोटा सोने का रंग चढ़ा है, इसके अंदर रहने वालों के दिल उतने ही खोखले हैं। उन्होंने आगे बढ़कर राधिका के कंधे पर प्यार से हाथ रखा और बहुत ही कोमल स्वर में पूछा, "क्या हुआ राधिका? आज फिर विनीत ने तुमसे बात नहीं की? या फिर से उसे किसी बिजनेस टूर पर अचानक बाहर जाना पड़ गया?"
सुमेधा भाभी के इस प्यार भरे स्पर्श को पाते ही राधिका का बांध टूट गया। वह फफक कर रो पड़ी। उसने मुड़कर सुमेधा भाभी को कसकर गले लगा लिया और अपनी रुंधे हुए गले से अपने मन के गुबार को शब्दों में पिरोते हुए बोली, "भाभी, मैं आपको क्या बताऊं कि मेरे दिल पर क्या बीत रही है? बाहर की दुनिया सोचती है कि मेरी शादी एक बहुत बड़े घर में हुई है और मैं राज कर रही हूँ। मेरे मायके वाले भी मेरी किस्मत पर रश्क करते हैं। पर सच कहूं भाभी, तो यह शादी मेरे लिए किसी सजा से कम नहीं है। यह हवेली एक सोने का पिंजरा है जिसमें मेरी रूह हर दिन घुट-घुट कर मर रही है। यहाँ प्यार का, अपनेपन का नामोनिशान तक नहीं है। विनीत के पास मुझे देने के लिए क्रेडिट कार्ड हैं, महंगे आभूषण हैं, लेकिन वो फुर्सत के दो पल नहीं हैं जिनमें वह मेरी आंखों में देखकर यह पूछ सके कि मेरे मन में क्या चल रहा है।"
राधिका ने अपने आंसू पोंछे और गहरी सांस लेते हुए आगे कहा, "यह कैसी आर्थिक और सामाजिक स्वतंत्रता है, भाभी? यह बड़ी हवेली, ये महंगी गाड़ियां, ये नौकर-चाकर... अगर इन्हीं भौतिक चीजों से जीवन की सच्ची खुशियां मिलतीं, तो आज मैं इस तरह बंद कमरे में नहीं रो रही होती। मुझे ऐसी खोखली खुशियां नहीं चाहिए। मैंने कभी दौलत की चाह नहीं की थी। मुझे तो बस अपने पति का एक प्यारा सा साथ चाहिए था। एक ऐसा प्यार से भरा छोटा सा संसार, जहां मेरे हृदय की खामोशी को पढ़ा जा सके। जहां मेरी कल्पनाओं, मेरे छोटे-छोटे सपनों को एक साकार रूप मिल सके। मुझे विनीत की दौलत नहीं, सिर्फ विनीत चाहिए था। लेकिन उनके लिए उनका व्यापार, उनकी मीटिंग्स और उनके क्लाइंट्स ही उनका सब कुछ हैं। मैं तो बस इस सजे हुए घर का एक महंगा शोपीस बनकर रह गई हूँ, जिसे सिर्फ समाज की पार्टियों में दिखाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।"
सुमेधा भाभी ने राधिका को अपने पास सोफे पर बिठाया और उसे पानी पिलाया। राधिका की व्यथा सुनकर परिवार के अन्य लोग भी, जो कभी-कभी ऐसी बातें सुन लेते थे, सब समझते थे। विनीत के माता-पिता भी भली-भांति जानते थे कि उनका बेटा व्यापार की अंधी दौड़ में अपनी पत्नी की भावनात्मक जरूरतों को पूरी तरह भूल चुका है। लेकिन हमारे देश और समाज की परंपराएं भी तो कितनी अजीब हैं। यहाँ विवाह को जन्म-जन्मांतर का एक ऐसा अटूट और पवित्र बंधन माना जाता है, जिसे किसी भी हाल में निभाना ही पड़ता है। शादी को तोड़ना या इस घुटन से बाहर निकलना यहाँ कहीं से भी आसान नहीं होता, खासकर तब जब मामला समाज के एक 'प्रतिष्ठित' परिवार का हो। समाज तो यही कहेगा कि लड़की को इतने बड़े घर में सब सुख-सुविधाएं तो मिल रही थीं, फिर क्या परेशानी थी? कोई भी उस 'सब कुछ' के पीछे छुपे उस भयानक खालीपन को नहीं देख पाता जो एक औरत को अंदर से खोखला कर देता है।
सुमेधा भाभी ने राधिका के हाथ सहलाते हुए बड़ी ही परिपक्वता से समझाया, "राधिका, मैं तुम्हारा दर्द बहुत अच्छी तरह समझती हूँ। लेकिन हम औरतें हैं। हमारे समाज में शादी की नींव अक्सर समझौते पर ही टिकी होती है। हर किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता। जो मिला है, उसी में संतोष करना पड़ता है। विनीत कोई बुरा इंसान नहीं है, बस वह अपनी जिम्मेदारियों और काम में कुछ ज्यादा ही उलझ गया है। तुम खुद को यूं कमजोर मत बनाओ। यही हमारी नियति है, यही हमारा सच है। अगर तुम विद्रोह करोगी, तो सिर्फ तुम्हारे और तुम्हारे मायके वालों के लिए बदनामी ही होगी।"
राधिका खामोश हो गई। सुमेधा भाभी की बातें उसके कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतर रही थीं। 'समझौता', 'नियति', 'सच'। उसने अपनी हरी साड़ी के पल्लू से चेहरे को साफ किया। उसे एहसास हो गया कि वह चाहे जितना चीख ले, जितना रो ले, इस समाज की मजबूत और ऊंची दीवारों के आगे उसकी आवाज कहीं दब कर रह जाएगी। उसे भी अपनी बाकी जिंदगी इसी सोने के पिंजरे में, इन ठंडी और महंगी दीवारों के बीच ही गुजारनी है।
उसने एक गहरी ठंडी सांस ली और अपने आंसुओं को हमेशा के लिए अपनी आंखों के किसी गहरे कोने में दफन कर दिया। नैना की तरह ही अब राधिका भी यही समझने लगी थी कि उसका जीवन अब इसी सांचे में ढलेगा। वह शादी को एक खूबसूरत और भावनात्मक रिश्ते की बजाय एक सामाजिक समझौता मानकर अपने जीवन का निर्वाह करने के लिए तैयार हो गई। उसने आईने में खुद को देखा, अपने चेहरे पर एक झूठी लेकिन सधी हुई मुस्कान सजाई और कमरे से बाहर परिवार के बीच जाने के लिए अपने कदम बढ़ा दिए।
लेकिन उसके मन के एक कोने में अब भी एक सवाल सुलग रहा था। वह चलते-चलते रुक गई और सोचने लगी, 'कैसी विडंबना है इस दुनिया की! इंसान चांद तक पहुंच गया, उसने मशीनों की भाषा को पढ़ना सीख लिया, लेकिन एक नारी के मन को, उसके हृदय की उस छोटी सी पुकार को पति क्यों नहीं जान पाते? क्यों हमेशा एक औरत को ही अपने सपनों और भावनाओं की बलि चढ़ाकर समझौते की वेदी पर खामोशी से बैठना पड़ता है?'
क्या आपको भी लगता है कि भौतिक सुख-सुविधाएं कभी भी पति-पत्नी के बीच प्यार और समय की कमी को पूरा नहीं कर सकतीं? क्या शादी में आज भी समझौते का पूरा बोझ औरतों के ही हिस्से आता है? अपने विचार हमें कमेंट करके जरूर बताएं।
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