कांच के रिश्ते

 शहर के जाने-माने व्यापारी सेठ रामदीन ने अपनी पुश्तैनी हवेली के दालान में बैठे-बैठे पंडित दीनानाथ जी से कहा था, "पंडित जी, मेरे इकलौते बेटे विकास के लिए कोई ऐसी लड़की बताइए जो घर को स्वर्ग बना दे। हमारा लड़का तो हीरा है, बस उसे तराशने वाली एक सुघड़ बहू चाहिए।" पंडित जी ने भी अपनी डायरी के पन्ने पलटते हुए मुस्कुरा कर कहा था, "रामदीन जी, आपकी चिंता आज खत्म समझिए। अभी पिछले ही हफ्ते पास के गाँव के मास्टर हरिशंकर जी ने अपनी बेटी अंजलि के लिए एक सुयोग्य वर तलाशने को कहा था। लड़की पढ़ी-लिखी है, सुंदर है और संस्कारी भी। दोनों की कुंडलियों के गुण ऐसे मिल रहे हैं जैसे राम-सीता की जोड़ी हो।"


बात तय हो गई और कुछ ही महीनों में विकास और अंजलि की शादी बड़ी धूमधाम से संपन्न हो गई। पूरे शहर में इस शादी की चर्चा थी। शुरुआती कुछ महीने किसी सुनहरे सपने की तरह बीते। घर में खुशियों का माहौल था, रामदीन और उनकी पत्नी कौशल्या अपनी नई बहू को देखकर फूले नहीं समाते थे। लेकिन, जैसे ही शादी की नई चमक फीकी पड़ने लगी, उस तथाकथित 'हीरे' की असली असलियत सामने आने लगी। 


विकास दरअसल एक गैर-ज़िम्मेदार और बिगड़ा हुआ इंसान था, जिसकी असलियत उसके पिता ने समाज और पंडित जी से छुपा कर रखी थी। व्यापार के तनाव और बुरी संगति के चलते विकास को शराब की भयंकर लत लग चुकी थी। शादी के कुछ महीनों बाद ही उसका असली रूप अंजलि के सामने आ गया। रात के बारह बजे शराब के नशे में धुत होकर घर लौटना विकास की दिनचर्या बन गई थी। शुरुआत में अंजलि ने प्यार से समझाने की कोशिश की, लेकिन नशे में चूर विकास को कुछ समझ नहीं आता था। बात-बात पर गालियां देना, अंजलि के चरित्र पर शक करना और फिर बात मारपीट तक पहुँच जाना, अब उस कमरे की रोज की कहानी बन गई थी। अंजलि के शरीर पर नील के निशान पड़ने लगे थे, लेकिन परिवार की इज्जत के खातिर वह अपने मायके वालों से या सास-ससुर से कुछ नहीं कह पाती थी। उसे लगता था कि शायद एक दिन सब ठीक हो जाएगा।


लेकिन जब इंसान शारीरिक और मानसिक दोनों तरह से टूट जाता है, तो वह सही और गलत के बीच का फर्क भूलने लगता है। रोज-रोज की इस प्रताड़ना ने अंजलि के अंदर की संवेदनाओं को मार दिया था। वह पत्थर सी होती जा रही थी। अब उसे न तो विकास के जुल्मों से रोना आता था और न ही इस घर के किसी रिश्ते से कोई लगाव रह गया था। उसकी आत्मा इस घर में घुटने लगी थी। 


इसी घुटन से भागने के लिए अंजलि ने सोशल मीडिया का सहारा लिया। एक दिन उसकी बात अपने स्कूल के एक पुराने दोस्त, राहुल से हो गई। राहुल ने जब अंजलि की उदासी को भांपा, तो वह उसका हमदर्द बन गया। अंजलि, जिसे अपने ही घर में सिर्फ गालियां और मार मिल रही थी, उसे राहुल की मीठी बातों में एक झूठा सुकून मिलने लगा। 


हालात इस कदर बिगड़ गए कि अब घर में दो अलग-अलग दुनिया बस चुकी थीं। रात को विकास नशे में हैवान बनकर अंजलि को मानसिक और शारीरिक रूप से नोचता था, और सुबह होते ही जैसे ही विकास अपने काम पर निकलता, अंजलि एक अलग ही इंसान बन जाती। विकास के घर से कदम बाहर रखते ही अंजलि अपने कमरे का दरवाजा बंद कर लेती और घंटों राहुल से फोन पर बात करती रहती। वह भूल चुकी थी कि वह किसी की पत्नी है, किसी घर की बहू है। 


बाहर दालान में उसके बूढ़े सास-ससुर खांसते रहते, कौशल्या देवी के घुटनों में दर्द होता और उन्हें दवा की जरूरत होती, लेकिन अंजलि के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती थी। वह कानों में ईयरफोन लगाए, दुनिया से बेखबर, फोन की स्क्रीन पर मुस्कुराते हुए अपनी एक अलग ही काल्पनिक दुनिया में जी रही थी। रामदीन और कौशल्या यह सब देखकर अंदर ही अंदर खून के आंसू रोते थे। जिस बेटे को उन्होंने हीरा समझा था, वह रोज़ शराब के नशे में अपनी जिंदगी बर्बाद कर रहा था, और जिस बहू से उन्होंने घर को स्वर्ग बनाने की उम्मीद की थी, वह उनके सामने ही उनके घर को नर्क बना रही थी। 


एक दिन कौशल्या देवी की तबीयत बहुत ज्यादा बिगड़ गई। उन्हें सीने में तेज दर्द उठा। रामदीन जी घबरा गए, उन्होंने अंजलि के कमरे का दरवाजा जोर-जोर से पीटा। "बहू... ओ बहू! बाहर आ, अपनी माँ जी को देख, इनकी जान जा रही है।" लेकिन अंदर अंजलि वीडियो कॉल पर इतनी मग्न थी कि उसने दरवाजे की आहट ही नहीं सुनी। रामदीन जी बदहवास होकर सड़क की तरफ भागे ताकि किसी पड़ोसी की मदद ले सकें। तभी सामने से विकास की गाड़ी आकर रुकी। आज वह दिन में ही पीकर आ गया था। 


विकास लड़खड़ाते हुए अंदर आया और अपनी माँ को जमीन पर तड़पते देखा। तभी उसकी नजर अंजलि के बंद दरवाजे पर गई, जहाँ से उसके हंसने की आवाजें आ रही थीं। विकास ने गुस्से में एक भारी लात मारकर दरवाजा खोल दिया। सामने अंजलि फोन पर बात कर रही थी। विकास का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया। उसने अंजलि के हाथ से फोन छीनकर दीवार पर दे मारा और उसे बालों से पकड़ कर घसीटते हुए बाहर आंगन में ले आया। 


उस दिन उस हवेली में जो हंगामा हुआ, उसने पूरे मोहल्ले को इकट्ठा कर दिया। विकास अंजलि को मार रहा था, अंजलि भी आज अपने बचाव में चीख-चीख कर विकास की शराब और नामर्दी के ताने दे रही थी, और वहीं जमीन पर पड़ी कौशल्या देवी हमेशा के लिए अपनी आंखें मूँद चुकी थीं। रामदीन जी दरवाजे पर खड़े पत्थर की मूरत बन गए थे। 


पंडित दीनानाथ जी का वह गुण मिलान आज आंगन में बिखरा पड़ा था। कुंडलियों के 36 गुण तो मिल गए थे, लेकिन चरित्र, समझ और इंसानियत का एक भी गुण नहीं मिला था। शादी सिर्फ दो लोगों का ही नहीं, बल्कि दो संस्कारों का मिलन होता है। लेकिन जब एक तरफ शराब और अहंकार हो, और दूसरी तरफ जिम्मेदारियों से भागने वाली स्वार्थपरता, तो रिश्ते कांच की तरह टूट कर ऐसे ही बिखर जाते हैं, जो सिर्फ चुभन और खून के अलावा कुछ नहीं देते।


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**क्या आपको नहीं लगता कि आज के समाज में सिर्फ कुंडलियां और बैंक बैलेंस देखने के बजाय, लड़के और लड़की के चरित्र और उनके संस्कारों को समझना ज़्यादा ज़रूरी है? अंजलि और विकास दोनों में से आपका नज़रिया किसके लिए क्या है? अपने विचार हमें कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताएं।**


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