टेक्सटाइल मिल के वातानुकूलित केबिन में एक अजीब सी बेचैनी पसरी हुई थी। बाईस साल का रोहन गुस्से में कमरे के इस छोर से उस छोर तक चक्कर काट रहा था। उसका चेहरा लाल था और मुट्ठियां भींची हुई थीं। तभी केबिन का दरवाजा खुला और उसके पिता, दिनेश बाबू, एक फाइल हाथ में लिए बेहद शांत भाव से अंदर दाखिल हुए। दिनेश बाबू इस पूरी मिल के मैनेजिंग डायरेक्टर थे, और उनके ही कुशल नेतृत्व में पिछले दस सालों से यह मिल मुनाफे की नई ऊंचाइयां छू रही थी।
दिनेश बाबू को देखते ही रोहन का गुस्सा फूट पड़ा। "दादाजी ने सारे स्टाफ और लेबर के सामने आपको इतनी बुरी तरह डांटा और आप चुपचाप सिर झुकाकर सुनते रहे? मुझे तो यह बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं हुआ पापा। आप इस पूरी कंपनी का सारा कामकाज देखते हैं। दिन-रात एक करके आपने इस बिजनेस को यहां तक पहुंचाया है। अगर आज माल भेजने के एक छोटे से ऑर्डर में थोड़ी सी गलती हो भी गई, तो क्या तूफान आ गया? ऑफिस में सभी आपका इतना सम्मान करते हैं, सब आपको अपना आदर्श मानते हैं। उनके सामने दादाजी आपको इस तरह डांटकर बेइज्जत कैसे कर सकते हैं?"
रोहन की सांसें तेज चल रही थीं। उसे अपने पिता का यह अपमान अपने स्वाभिमान पर लगी चोट जैसा लग रहा था।
दिनेश बाबू ने अपनी फाइल आराम से मेज पर रखी। उन्होंने अपने बेटे के उस उबलते हुए चेहरे को देखा और उनके होठों पर एक बहुत ही सौम्य, ठहरी हुई मुस्कान आ गई। उन्होंने आगे बढ़कर रोहन के कंधे पर हाथ रखा और बड़े प्यार से उसे सोफे की तरफ ले जाते हुए बोले—
"देखो बेटा... यहां आओ। मेरे पास आराम से बैठो। सबसे पहले तो अपने दिमाग से ये गुस्सा निकाल दो। क्रोध हमेशा हमारे भीतर नकारात्मकता का बीज बोता है। यह हमारी सोचने-समझने की शक्ति को खा जाता है और हमें सही और गलत की दिशा से भटका देता है। जब इंसान गुस्से में होता है, तो उसे सिर्फ अपना अहंकार नजर आता है, सामने वाले का उद्देश्य नहीं। अब अपने इस शांत मन से मेरी बात बहुत ध्यान से सुनो।"
रोहन सोफे पर बैठ तो गया, लेकिन उसकी आंखों में अभी भी असंतोष था। दिनेश बाबू ने उसके बगल में बैठते हुए अपनी बात शुरू की।
"बेटा, तुम्हें लगता है कि दादाजी ने आज स्टाफ के सामने मेरी बेइज्जती की? तुम्हें लगता है कि मैं इतना बड़ा अफसर बन गया हूं कि अब मुझे किसी की डांट नहीं सुननी चाहिए? तो सुनो, ये जो एयर-कंडीशंड केबिन है, ये जो चमचमाती हुई गाड़ियां हैं, और ये जो हजारों मजदूरों की मिल है—ये सब मेरी काबिलियत से ज्यादा तुम्हारे दादाजी के उन पसीनों की देन है जो उन्होंने कड़ी धूप में साइकिल पर कपड़ा बेचते हुए बहाए थे। जब उन्होंने यह काम शुरू किया था, तब उनके पैरों में छाले होते थे और आज उसी की बदौलत हमारे पैरों में महंगे जूते हैं।"
दिनेश बाबू की आवाज में एक गहरा सम्मान झलक रहा था। "बेटा, एक पेड़ की शाखाएं आसमान तक क्यों न पहुंच जाएं, लेकिन वह अपनी जड़ों को यह नहीं कह सकतीं कि अब मुझे तुम्हारी जरूरत नहीं है। दादाजी इस परिवार और इस व्यापार की नींव हैं। जब कोई ईंट अपनी जगह से थोड़ी भी खिसकती है, तो नींव को उसे वापस सही जगह पर लाने के लिए थोड़ी सख्ती करनी ही पड़ती है।"
"लेकिन पापा, गलती तो किसी से भी हो सकती है ना? इसके लिए सबके सामने तमाशा बनाने की क्या जरूरत थी? वो आपको अकेले में भी तो समझा सकते थे।" रोहन ने अभी भी अपना तर्क रखा।
दिनेश बाबू मुस्कुराए। "गलती बेशक छोटी थी रोहन, लेकिन व्यापार में एक छोटी सी लापरवाही कितनी बड़ी तबाही ला सकती है, यह दादाजी से बेहतर कोई नहीं जानता। वो मुझे इसलिए नहीं डांट रहे थे कि उन्हें मुझे नीचा दिखाना था या अपना रौब झाड़ना था। वो इसलिए डांट रहे थे क्योंकि उन्हें मुझसे परफेक्शन की उम्मीद है। वे जानते हैं कि अगर आज जनरल मैनेजर की छोटी गलती को नजरअंदाज कर दिया गया, तो कल नीचे का स्टाफ बड़ी गलतियां करने में नहीं हिचकिचाएगा। उन्होंने जो डांट लगाई, वो मेरी बेइज्जती नहीं थी, वो इस पूरी कंपनी के लिए एक अनुशासन का पाठ था।"
दिनेश बाबू ने रोहन का हाथ अपने हाथों में लिया और एक पुरानी बात याद करते हुए बोले, "तुम्हें पता है रोहन, आज से पंद्रह साल पहले जब मैंने नया-नया काम संभाला था, तो मेरी एक बहुत बड़ी बेवकूफी की वजह से कंपनी को लाखों का नुकसान हुआ था। बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की मीटिंग में सब मुझे कच्चा चबा जाने को तैयार थे। तब तुम्हारे दादाजी ने सबके सामने खड़े होकर कहा था कि 'यह फैसला मेरा था, दिनेश का नहीं। नुकसान की भरपाई मैं करूंगा।' उन्होंने उस दिन मेरी नौकरी और मेरी इज्जत बचाने के लिए सारा इल्जाम अपने सिर ले लिया था। जो पिता अपने बेटे को बचाने के लिए पूरी दुनिया से लड़ सकता है, क्या उसे अपने बेटे की छोटी सी लापरवाही पर उसका कान मरोड़ने का हक नहीं है?"
रोहन के पास अब कोई जवाब नहीं था। उसकी आंखों से गुस्से का पर्दा हट चुका था और वहां अब समझदारी के आंसू तैरने लगे थे।
"बेटा," दिनेश बाबू ने अपनी बात खत्म करते हुए कहा, "जिस घर में, जिस आंगन में बड़ों की डांट गूंजती रहती है, समझ लेना वहां संस्कारों की छत एकदम सलामत है। जिस दिन बड़े-बुजुर्ग हमें टोकना छोड़ देते हैं, हमारी गलतियों पर डांटना छोड़ देते हैं, समझ लेना हमने अपना सबसे बड़ा सुरक्षा कवच खो दिया है। एक पिता की डांट उस कुम्हार की थाप जैसी होती है, जो घड़े को बाहर से भले ही चोट मारती है, लेकिन अंदर से उसे सहारा देकर एक मुकम्मल आकार भी देती है। मुझे इस बात का कोई दुख नहीं कि दादाजी ने मुझे डांटा, बल्कि मुझे इस बात का गर्व है कि आज भी मेरे सिर पर एक ऐसा हाथ मौजूद है जो मेरे भटकने से पहले ही मुझे सही रास्ते पर ला सकता है।"
रोहन का हृदय ग्लानि और असीम सम्मान से भर उठा। उसने उठकर अपने पिता के पैर छू लिए। आज उसे समझ आ गया था कि पद, पैसा और रुतबा चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो जाए, बड़ों के प्रति सम्मान और उनकी सीख के आगे वह हमेशा छोटा ही रहता है।
दोस्तों, क्या आपको भी लगता है कि आज के दौर में हम बड़ों की टोक-टाक और उनकी डांट को अपना अपमान समझने लगे हैं? क्या हमने उनके उस अनुभव को अनदेखा करना शुरू कर दिया है जो उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी तपा कर हासिल किया है? अपने विचार हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।
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