सुबह का वक्त था। शर्मा परिवार में हलचल मची हुई थी। लता रसोई में चाय बना रही थी जब दरवाज़े पर घंटी बजी।
दरवाज़ा खोलते ही उसका छोटा भाई विकास पत्नी कविता के साथ अंदर आया।
“अरे, भैया! आप लोग आए, बहुत अच्छा हुआ!”
लता ने खुशी से कहा।
विकास मुस्कुराते हुए बोला,
“दीदी, एक जरूरी बात थी। हमारे घर में एक महीने बाद नेहा की शादी है। आप और जीजाजी को कम से कम पंद्रह दिन पहले आना होगा। सारी तैयारियाँ आपको ही देखनी हैं।”
लता के पति माधव शर्मा अखबार से सिर उठाकर बोले,
“नेहा की शादी? अरे वाह, यह तो बहुत अच्छी बात है! लड़का कौन है?”
कविता मुस्कुराई,
“दीदी, लड़का बहुत अच्छा है — अमन नाम है उसका। वही, जो नेहा के ऑफिस में साथ काम करता था।”
माधव के चेहरे का रंग बदल गया।
“मतलब कि नेहा ने अपनी मर्जी से लड़का चुना? कौन है वो? कौन-सी जात का है?”
विकास ने धीरे से कहा,
“भैया, वो सिख परिवार से है… पंजाबी है।”
बस इतना सुनते ही माधव जैसे फट पड़े —
“क्या कहा! गैर जात का लड़का? शर्मा खानदान की इज्जत मिट्टी में मिला दी तुम्हारी लड़की ने!”
घर का माहौल एकदम भारी हो गया। लता चुपचाप खड़ी थी।
विकास ने शांत स्वर में कहा,
“भैया, लड़का भले अलग बिरादरी का है, लेकिन बहुत अच्छा इंसान है। नेहा उससे खुश है। उसका परिवार भी बहुत सुलझा हुआ है। आप एक बार मिल तो लीजिए।”
माधव गरजे,
“विकास! तुझे बस बेटी की खुशी दिखती है, खानदान की इज्जत नहीं? लोग क्या कहेंगे कि शर्मा परिवार की लड़की ने गैर बिरादरी में शादी की?”
विकास ने गहरी साँस ली।
“भैया, जमाना बदल गया है। अब लोग इज्जत जात से नहीं, इंसानियत से तौलते हैं। मुझे अपनी बेटी की खुशी सबसे पहले चाहिए।”
माधव का चेहरा तमतमाया हुआ था।
“तुम्हें शर्म नहीं आती? लोग क्या सोचेंगे? खानदान में किसी ने आज तक ऐसा नहीं किया!”
विकास ने धीरे-धीरे कहा,
“भैया, आपकी बेटी पूनम की शादी भी तो आपने अपनी मर्जी से की थी। बिरादरी के दबाव में आपने उसकी इच्छा को कुचल दिया था। आज वो अपनी जिंदगी में खुश नहीं है। मैं नहीं चाहता कि मेरी बेटी भी उसी रास्ते पर जाए।”
यह सुनकर कमरे में सन्नाटा छा गया। लता का चेहरा उतर गया। वह जानती थी, विकास की बात सच थी।
पूनम, उनकी बड़ी बेटी, सालों से एक ऐसे रिश्ते में बंधी थी जिसमें प्रेम नहीं था, बस समझौता था।
माधव कभी मानने को तैयार नहीं हुए कि उनकी ज़िद ने उनकी बेटी की ज़िंदगी तबाह कर दी।
माधव अब भी अपने अहंकार के घेरे में बंद थे।
“तूने तो खानदान की नाक ही कटवा दी! अब लोग उंगली उठाएँगे। हम इस शादी में शामिल नहीं होंगे। ये हमारे संस्कारों के खिलाफ है।”
विकास ने शांत स्वर में कहा,
“भैया, मेरे बच्चों को बिरादरी ने नहीं, मैंने पाला है। उनके हर सुख-दुख का जिम्मेदार मैं हूँ। अगर मेरी बेटी अपने फैसले में खुश है, तो मुझे किसी समाज की मुहर की ज़रूरत नहीं। मैं नहीं चाहता कि मेरी संतान मेरे निर्णय से घुटे।”
कविता की आँखों में आँसू आ गए, पर उसके चेहरे पर गर्व की झलक भी थी।
“विकास, तुम बिल्कुल सही कर रहे हो,” उसने धीमे से कहा।
माधव ने गुस्से में कहा,
“अगर तुझे खानदान की इज्जत की इतनी परवाह नहीं, तो फिर हमें मत बुलाना। हम इस पाप के भागीदार नहीं बनेंगे।”
विकास ने दोनों हाथ जोड़ लिए।
“भैया, आपकी मौजूदगी हमारे लिए सम्मान की बात होगी। अगर आप नहीं आएंगे, तो भी हमें अफसोस नहीं होगा। लेकिन मेरी बेटी का भविष्य किसी झूठी ‘इज्जत’ से बड़ा है।”
इतना कहकर विकास और कविता वहाँ से चले गए।
पीछे रह गया माधव का कठोर चेहरा और लता का मौन दर्द।
रात को माधव बरामदे में बैठे थे।
लता धीरे-धीरे पास आईं, बोलीं,
“आप जानते हैं, विकास गलत नहीं है। आज के बच्चे समझदार हैं। अगर लड़की ने किसी अच्छे परिवार में, अपने मन से शादी का फैसला लिया है, तो हमें उसे आशीर्वाद देना चाहिए।”
माधव ने कुछ नहीं कहा, बस आकाश की ओर देख लिया।
“लता, तुम नहीं समझोगी। खानदान की इज्जत…”
लता ने बीच में ही कहा,
“इज्जत बेटी की खुशी में होती है, उसके आँसुओं में नहीं। आपने अपनी बेटी पूनम के साथ जो किया, आज तक वो मुस्कुराना भूल गई है। क्या वही इज्जत चाहिए आपको?”
माधव का चेहरा ढह गया।
लता के शब्दों में वो दर्द था जो सच से भी ज्यादा गहरा था।
एक महीने बाद नेहा की शादी थी। विकास का घर रोशनी से जगमगा रहा था।
बिरादरी के कुछ लोग दूर खड़े कानाफूसी कर रहे थे —
“देखो, शर्मा की लड़की ने गैर जात में शादी की है…”
लेकिन विकास और कविता सबकी परवाह किए बिना बेटी के साथ खुश थे।
अचानक शादी के दिन एक गाड़ी घर के बाहर आकर रुकी।
दरवाज़ा खुला, और माधव शर्मा धीरे-धीरे बाहर निकले।
उनके हाथ में एक थैला था — अंदर सोने का कड़ा और एक लिफाफा।
विकास ने आगे बढ़कर कहा,
“भैया… आप?”
माधव की आँखें भीग गईं।
“मुझे देर लग गई, पर अब समझ आया कि असली इज्जत समाज की नहीं, अपने बच्चों की मुस्कुराहट में है।”
उन्होंने नेहा के सिर पर हाथ रखा और कहा,
“बेटी, खुश रहो। अपने घर को प्यार से बसाना, यही हमारे खानदान की असली पहचान है।”
विकास की आँखों में कृतज्ञता थी। कविता ने राहत की साँस ली।
और लता, जो कुछ दूरी पर खड़ी थी, आँसुओं के बीच मुस्कुरा उठी।
उस दिन के बाद माधव बदल गए। उन्होंने समझ लिया कि
“खानदान की इज्जत जात-पात से नहीं, सोच से बनती है।”
विकास की बेटी नेहा अपनी नई जिंदगी में खुश थी।
और जब भी माधव किसी पुराने रिश्तेदार को यह कहते सुनते —
“गैर बिरादरी में शादी कर शर्म नहीं आई?”
तो वे मुस्कुराकर जवाब देते —
“मुझे अपनी बेटी पर गर्व है, क्योंकि उसने वही किया जो सही था।”
रिश्तों का सम्मान तब तक अर्थहीन है जब तक उसमें इंसानियत और प्रेम की जगह नहीं।
इज्जत वो नहीं जो समाज तय करे,
इज्जत वो है जो एक पिता अपनी बेटी की मुस्कान में देखे।
संगीता अग्रवाल
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