रात के सन्नाटे में अचानक बजी डोरबेल ने पूरे घर का सुकून तोड़ दिया।
ममता की नींद जैसे किसी झटके से टूटी। उसने करवट बदलकर देखा — पति मोहन और बच्चे गहरी नींद में सो रहे थे।
“इतनी रात को कौन आ गया?” उसने सोचा और धीरे-धीरे उठकर दरवाज़े की ओर चली गई।
घड़ी में रात के साढ़े बारह बज रहे थे।
जैसे ही उसने दरवाज़ा खोला, सामने खड़ी आकृति को देखकर वह दंग रह गई — “बुआ जी?!”
“आप इतनी रात को… सब ठीक तो है ना?”
बुआ जी का चेहरा लाल और आँखें सूजी हुई थीं। कपड़े अस्त-व्यस्त, हाथ काँप रहे थे।
वो थकी और टूटी आवाज़ में बोलीं —
“कुछ ठीक नहीं है, ममता! अब मैं अपने ससुराल नहीं जाऊँगी। बस यहीं रहूँगी तुम्हारे पास… अब हिम्मत नहीं बची।”
ममता समझ नहीं पा रही थी कि आखिर हुआ क्या है।
“ठीक है बुआ, आप बैठिए, मैं पानी लेकर आती हूँ।”
वो पानी लाने ही गई थी कि पीछे से मोहन की आवाज़ आई —
“कौन आया है इतनी रात को?”
“बुआ जी हैं…” ममता ने धीमे से कहा।
मोहन जैसे ही बाहर आया और बुआ जी की हालत देखी, तो गुस्से में भर गया —
“ये किसकी हिम्मत हुई जो आप पर हाथ उठाया? अब मैं छोड़ूंगा नहीं उसे! आज ही पुलिस में रिपोर्ट करवाता हूँ!”
“मोहन, नहीं… अभी नहीं…” ममता ने धीरे से कहा, लेकिन मोहन जैसे ज्वालामुखी बन चुका था।
“नहीं ममता! अब बहुत हो गया! मेरी बुआ ने सारी ज़िंदगी उस घर के लिए क्या नहीं किया? और बदले में मिला क्या? ये अत्याचार!”
बुआ जी रोती जा रही थीं —
“नहीं बेटा, मैंने सब कुछ सहा, लेकिन आज तो हद हो गई। मुझे धक्का दे दिया, बोले — ‘जा, तेरा यहाँ कोई नहीं।’ अब वहाँ कदम भी नहीं रखूँगी।”
मोहन ने मुँह पर हाथ मारा —
“बस! अब मैं चलता हूँ उसी के घर, देखता हूँ उसे!”
ममता ने तुरंत बीच में आकर उसका हाथ थाम लिया।
“मोहन, ज़रा ठहरो। ये वक्त गुस्से का नहीं, समझदारी का है। रात के इस पहर आप पुलिस या झगड़ा करेंगे तो बात और बिगड़ जाएगी। पहले बुआ को शांत करो। सुबह सारा मामला समझेंगे।”
“पर ममता…”
“नहीं मोहन,” उसने दृढ़ता से कहा, “आप आग में घी डालने का काम मत करो। अगर सच्चाई जानी बिना किसी के खिलाफ़ कदम उठाओगे तो पछताना पड़ेगा। पहले दोनों की बात सुनो — बुआ और फूफा जी की। फिर फैसला लो।”
मोहन कुछ देर तक चुप रहा, फिर धीरे-धीरे कुर्सी पर बैठ गया।
ममता ने बुआ का हाथ थामा और उन्हें अंदर कमरे में ले गई।
“बुआ, आप अब आराम कीजिए। सुबह सब ठीक से बात करेंगे।”
बुआ की आँखों में अब भी आँसू थे — “बेटी, वो अब सुधरने वाला नहीं।”
ममता ने प्यार से सिर पर हाथ फेरा —
“रात को लिए गए फैसले हमेशा गलत होते हैं बुआ। अभी आप थक चुकी हैं, कल सुबह बात करेंगे। भगवान सब ठीक करेगा।”
बुआ चुपचाप बिस्तर पर लेट गईं। ममता कमरे का दरवाज़ा बंद कर बाहर आई तो देखा, मोहन अब भी बेचैनी से टहल रहा था।
“मोहन, आपको पता है,” ममता ने शांत स्वर में कहा,
“पति-पत्नी का रिश्ता बहुत अजीब होता है। नाजुक भी और सबसे मजबूत भी। कई बार छोटी-छोटी बातों पर ऐसे टूट जाता है जैसे धागा। और कई बार सालों के तूफान झेलकर भी बना रहता है। हमें नहीं पता बुआ-फूफा जी के बीच क्या हुआ, लेकिन ये हमारा हक नहीं कि हम एक पक्ष लेकर दूसरे को दोष दें।”
“पर जब औरत पर अत्याचार हो…” मोहन ने तर्क दिया।
“बिलकुल, तब आवाज़ उठानी चाहिए,” ममता ने कहा,
“लेकिन हर बार मामला सीधा नहीं होता। हो सकता है कोई गलतफ़हमी हो, या गुस्से में कही बात ने आग बढ़ा दी हो। अगर हम सच में बुआ की मदद करना चाहते हैं, तो सुलह की कोशिश करनी होगी, न कि दुश्मनी की।”
मोहन कुछ सोचने लगा।
“अगर हम आज जाकर हंगामा करेंगे, तो फूफा जी का अहंकार और बढ़ेगा। फिर रिश्ते की डोर टूट जाएगी। एक बार कोशिश तो करनी चाहिए उसे जोड़ने की।”
मोहन ने गहरी साँस ली।
“तुम सही कहती हो ममता। गुस्से में मैं भूल गया कि हमारा मकसद लड़ाई नहीं, समाधान होना चाहिए।”
अगली सुबह, सूरज की हल्की किरणों के साथ माहौल कुछ शांत था।
ममता चाय बनाकर लाई और बुआ जी के पास बैठ गई।
“बुआ, अब थोड़ा अच्छा लग रहा है?”
“हाँ बेटी, पर मन भारी है,” बुआ बोलीं।
“क्या हुआ था?”
बुआ ने आँसू पोंछते हुए बताया —
“कल रात फूफा जी से किसी बात पर बहस हो गई। मैंने कहा कि अब बच्चों की जिम्मेदारी संभालो, हमेशा दोस्तों में मत उलझो। बस, वही बात उन्हें बुरी लग गई। बोले — ‘तू मुझे सिखाएगी?’ और फिर गुस्से में धक्का दे दिया।”
ममता ने उनकी बात ध्यान से सुनी।
“बुआ, क्या आप उनसे बात करना चाहेंगी अगर वो माफ़ी माँग लें?”
बुआ ने चौंककर उसकी ओर देखा — “माफ़ी? वो और माफ़ी? असंभव है!”
इसी बीच मोहन बाहर से आया।
“मैंने फूफा जी को फोन किया है,” उसने कहा,
“उन्होंने भी रात की बात पर अफसोस जताया है। कह रहे थे, गुस्से में गलती हो गई। वो खुद आना चाहते हैं।”
बुआ कुछ क्षण के लिए चुप रहीं।
“क्या सच में उन्होंने ऐसा कहा?”
“हाँ बुआ,” मोहन ने कहा, “वो रो रहे थे। बोले, ‘मुझसे गलती हो गई। अगर रमा मुझे माफ़ कर दे तो मैं खुद आकर ले जाऊँ।’”
बुआ के होंठ काँपे। आँखें भर आईं।
“इतने सालों में कभी नहीं सोचा था कि वो ऐसा भी कहेंगे।”
ममता मुस्कुराई —
“देखिए बुआ, अगर गुस्से में एक कदम पीछे हट जाएँ तो प्यार फिर से लौट आता है। रिश्ता वो पौधा है जिसे रोज़ थोड़ा-थोड़ा पानी चाहिए, नहीं तो सूख जाता है।”
थोड़ी देर बाद दरवाज़ा फिर से बजा।
बुआ का दिल धड़क उठा।
मोहन ने दरवाज़ा खोला — सामने फूफा जी खड़े थे, आँखों में पछतावा, हाथों में फूलों का गुलदस्ता।
उन्होंने झुककर कहा —
“रमा, मुझे माफ़ कर दो। मुझसे गलती हो गई।”
बुआ की आँखों से आँसू बह निकले।
ममता ने उनके कंधे पर हाथ रखा — “देखा बुआ, सच्चे रिश्ते कभी पूरी तरह नहीं टूटते।”
बुआ आगे बढ़ीं और बोलीं — “अब कोई बात नहीं, बस ऐसी बात दोबारा नहीं होनी चाहिए।”
फूफा जी ने सिर झुका लिया — “वादा करता हूँ।”
ममता ने भीतर ही भीतर राहत की साँस ली।
मोहन ने उसकी तरफ़ देखा, आँखों से धन्यवाद कहा।
रात को जब सब शांत हुए, ममता बालकनी में बैठी थी।
मोहन आया और बोला —
“तुम्हारी बात मान ली होती तो कल ही सब ठीक हो जाता। सच कहती हो, रिश्ते में आग लगाने से बेहतर है उसे बुझाने की कोशिश की जाए।”
ममता मुस्कुरा दी।
“हाँ मोहन, पति-पत्नी के झगड़े में तीसरे को कभी आग में घी नहीं डालना चाहिए।
जो सुलह करा दे, वही सच्चा अपनों का साथ निभाता है।”
उस रात घर में सुकून था —
क्योंकि वहाँ किसी ने झगड़े में नहीं, प्यार में जीत हासिल की थी।
रंजीता पाण्डेय
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