पछतावा

 “तूने फिर वही किया रवि?”

रसोई से बाहर निकलती हुई आरती ने बेटे की ओर देखा तो उसकी आंखों में गुस्सा और निराशा दोनों झलक रहे थे।
“इतनी मुश्किल से तेरे पापा ने तेरे लिए नौकरी लगवाई थी, और तूने सिर्फ़ दो हफ्ते में छोड़ दी? क्या सोचता है तू अपने बारे में? ज़िंदगी भर यूँ ही यूँ आवारा घूमता रहेगा?”

रवि चुपचाप खड़ा था। उसकी उम्र अब तेइस की हो चुकी थी, पर जिम्मेदारी का नाम तक नहीं।

आरती ने गुस्से में कहा —
“तेरे पापा की कितनी मिन्नतें करके शर्मा जी से बात करवाई थी मैंने, ताकि तू उनके गोदाम में काम सीख ले। लेकिन नहीं… तू तो बस आरामतलब जिंदगी जीने आया है। हर काम से जी चुराना, हर बात में बहाना। अब कौन रखेगा तुझे?”

रवि सिर झुकाए खड़ा रहा। उसके चेहरे पर पछतावे का नाम नहीं था।
आरती के अंदर जमा हुआ गुस्सा अब फूट पड़ा।
“तेरे बाप ने तुझे कितना समझाया था। बोले थे – ‘थोड़ा अनुशासन रख, थोड़ा परिश्रम कर, वक्त पर उठ, वक्त पर काम पर जा।’ लेकिन तूने तो कभी किसी की बात मानी ही नहीं। बस फोन, दोस्तों की मंडली और खाली बातें। आज उसी का नतीजा है, कोई काम नहीं टिकता तेरे हाथ में।”

यह कहकर आरती सोफे पर बैठ गई। उसकी आंखों से आंसू निकल पड़े।
“भगवान, क्या सज़ा दे रहे हो मुझे? मैंने तो बस यही चाहा था कि मेरा बेटा एक सलीकेदार इंसान बने, अपने पैरों पर खड़ा हो। लेकिन मैंने ही अपने हाथों से इसे बिगाड़ दिया। हमेशा ढील दी, हमेशा बचाया… और आज यही बेटा मेरी आंखों में शर्म भर रहा है।”

रवि के पिता महेश उस वक्त घर में दाखिल हुए। उन्होंने पत्नी को रोते देखा तो कारण पूछा।
“क्या हुआ?”
आरती ने गुस्से में कहा —
“क्या होगा? तुम्हारा लाड़ला फिर नौकरी छोड़ आया है। अब घर बैठा है, जैसे सबकुछ मज़ाक हो!”

महेश ने बेटे की ओर देखा,
“बोलो रवि, ये सब सच है?”
रवि धीरे से बोला —
“पापा, वो जगह अच्छी नहीं थी, काम बहुत था और पैसा बहुत कम…”
महेश ने बीच में ही टोक दिया —
“पैसा कम? अभी कुछ सीखा ही नहीं और तुझे पैसे चाहिए? मेहनत से डरने वाले को दुनिया में कहीं भी इज़्ज़त नहीं मिलती बेटा।”

रवि झल्लाते हुए बोला —
“पापा, आप समझते नहीं। अब जमाना बदल गया है। आजकल हर कोई आराम चाहता है। इतनी मेहनत कौन करता है?”

महेश ने गहरी साँस ली।
“तो तू भी वही करेगा जो सब कर रहे हैं? बेटा, जो भी आगे बढ़ते हैं, वो भीड़ के साथ नहीं चलते। मेहनत से ही रास्ता बनता है। लेकिन तू तो आसान रास्ता ढूंढने में लगा है।”

रवि ने सिर झुका लिया। महेश आगे बोले —
“तेरी माँ ने तुझ पर जितना विश्वास किया है, उतना किसी माँ ने शायद ही किया होगा। लेकिन तू उस विश्वास को बार-बार तोड़ता जा रहा है। जब भी मैं डांटता, तेरी माँ तेरा पक्ष लेती। और आज देखो, वही माँ तेरे कारण रो रही है।”

रवि को कुछ समझ नहीं आया। वह कमरे से बाहर निकल गया।
आरती फूट-फूटकर रोने लगी।
“मैंने अपने बेटे को प्यार दिया, सज़ा नहीं। सोचती थी, प्यार से सुधर जाएगा। पर मैंने उसे बिगाड़ दिया।”

महेश ने आरती के कंधे पर हाथ रखा।
“अभी वक्त गया नहीं है। वक्त सिखा देगा इसे। बस हमें अब इसे गिरने से नहीं बचाना चाहिए। इसे खुद संभलना होगा।”

रात का समय था। रवि छत पर बैठा आसमान देख रहा था। नीचे माँ की सिसकियाँ सुनाई दे रही थीं। उसका दिल भारी हो गया।
अचानक उसे याद आया — जब वो दस साल का था और परीक्षा में फेल हुआ था, तो पापा ने डांटा था, लेकिन माँ ने गले लगाकर कहा था —
“अगली बार तू जरूर पास होगा बेटा।”
माँ का वो भरोसा आज तक उसे शर्मिंदा कर रहा था।

उसने सोचा — “कितनी बार माँ ने मुझ पर भरोसा किया, और हर बार मैंने उसे तोड़ा।”
आँखों में आँसू आ गए। उसने ठान लिया कि अब वो खुद को बदलेगा।

अगले दिन सुबह-सुबह वह पापा के कमरे में गया।
“पापा, एक बात कहनी है।”
महेश ने अखबार से नजर उठाई —
“क्या हुआ?”
“पापा, मैं अब बदलना चाहता हूँ। जो गलतियाँ कीं, उनका एहसास है मुझे। मैं फिर से कोई काम करना चाहता हूँ। चाहे छोटा ही क्यों न हो, पर ईमानदारी से करूंगा।”

महेश ने कुछ पल बेटे की आँखों में देखा। उनमें सच्चाई झलक रही थी।
उन्होंने धीरे से कहा —
“ठीक है, एक मौका और दूँगा तुझे। लेकिन इस बार सिर्फ़ काम नहीं, जिम्मेदारी भी साथ देनी होगी। अगर एक भी झूठ पकड़ा, तो मैं खुद तुझे घर से निकाल दूँगा।”
रवि ने सिर झुकाकर कहा —
“ठीक है, पापा।”

महेश ने अपने पुराने दोस्त के यहाँ बात की। वह शहर के बाहर एक छोटी-सी प्रिंटिंग प्रेस चलाता था।
रवि को वहाँ बतौर हेल्पर रख दिया गया।

शुरू में काम मुश्किल लगा। सुबह सात बजे प्रेस पहुँचता, रात को थका-हारा लौटता। लेकिन इस बार उसने हार नहीं मानी।
धीरे-धीरे उसने मशीनों का काम सीख लिया। कुछ महीने बाद जब मालिक ने देखा कि रवि मेहनती है, तो उसे बढ़ोतरी दे दी।

रवि ने अपनी पहली तनख्वाह से माँ के लिए साड़ी खरीदी और पापा के लिए घड़ी।
घर लौटकर उसने साड़ी माँ के हाथ में रखी।
आरती हैरान रह गई —
“ये क्या है बेटा?”
रवि ने मुस्कुराते हुए कहा —
“माँ, आज पहली बार अपने पैसों से कुछ खरीदा है। अब तेरे बेटे ने तेरा सिर झुकाया नहीं, उठाया है।”

आरती की आँखें भर आईं। उसने बेटे को गले से लगा लिया।
“मेरा बेटा आखिर समझ गया।”

महेश दरवाज़े पर खड़े थे। उनके चेहरे पर एक संतोष भरी मुस्कान थी।
उन्होंने कहा —
“देखा आरती, जब तक इंसान खुद गिरकर नहीं उठता, तब तक उसे अपने पंखों की ताकत का एहसास नहीं होता।”

रवि ने पापा के पैरों को छुआ।
“अब आप दोनों को मुझ पर शर्म नहीं, गर्व होगा।”

आरती ने उसका सिर सहलाया और बोली —
“मेरे लिए तो हमेशा गर्व की बात थी तू, बस अब तूने खुद को भी गर्व करने लायक बना दिया।”

घर में पहली बार शांति थी, संतोष था, और माँ की आँखों में वह चमक लौट आई थी जो बरसों से गायब थी।
रवि ने माँ की आँखों की ओर देखा और मन ही मन कहा —
“अब कभी तेरी इज्जत को बट्टा नहीं लगने दूँगा, माँ।”

मंजू ओमर


एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ