सुबह के नौ बजे थे। आँगन में फैली खामोशी को महावीर सिंह की गुस्साई आवाज़ ने चीर दिया —
“देखो अपने लाड़ले पर ज़रा लगाम कसो, रमा! नहीं तो कल को मेरे हाथों कुछ हो गया तो मुझे दोष मत देना! भगवान जानें, कितनी मन्नतों के बाद ये बेटा मिला था और आज देखो — हमारी किस्मत पर कलंक लगाने में लगा है!”
उनकी आँखों में गुस्सा, निराशा और कहीं गहराई में छिपा डर झलक रहा था।
कमरे के कोने में साड़ी का पल्लू मुँह में दबाए रमा सिसकियाँ रोकने की नाकाम कोशिश कर रही थी।
पति के शब्द उसके दिल में नुकीली कीलों की तरह उतर रहे थे।
वो जानती थी, बात फिर उसी जगह जा पहुँची थी — उनके बेटे किशन की।
वो किशन, जिसके जन्म के लिए उन्होंने और महावीर ने सालों तक मंदिरों में माथा टेका, व्रत रखे, चढ़ावे चढ़ाए।
वो बेटा, जो सबका सपना था — पर अब सबकी चिंता बन गया था।
महावीर सिंह के तीन छोटे भाई थे, और उनके घर बेटियाँ ही बेटियाँ थीं।
शुरू-शुरू में सबने खुश होकर कहा था — “घर लक्ष्मी से भर गया है।”
पर उनकी माँ कहती रहतीं — “भगवान, बस एक पोते का मुँह दिखा दे।”
सबसे बड़े बेटे के नाते यह भार महावीर के कंधों पर आ गया।
वक़्त गुजरता गया, पर घर में किलकारी नहीं गूँजी।
लोग पीछे से कहते — “कितनी भी मन्नतें कर लो, तक़दीर में जो लिखा है वही होगा।”
लेकिन महावीर हार मानने वालों में से नहीं थे।
और फिर बारह साल बाद, चमत्कार हुआ — रमा गर्भवती हुई।
पूरे घर में उत्सव का माहौल था।
माँ ने तो व्रत रख लिया कि अगर पोता हुआ तो मंदिर में सौ दीपक जलाएगी।
रमा का ध्यान ऐसे रखा जा रहा था जैसे कोई राजकुमारी हो।
जब बच्चा पैदा हुआ और डॉक्टर ने कहा “लड़का हुआ है,” तो घर में मानो दीपावली मन गई।
महावीर सिंह की माँ खुशी के मारे रो पड़ीं —
“अब मेरा कुल बच गया!”
किशन उनके घर की आँखों का तारा था।
बहनों ने उसे खिलौनों से सजाया, चाचियों ने सोने की पायलें पहनाईं, और मोहल्ले में सब कहते —
“देखो, इतने सालों बाद भगवान ने इस घर को बेटा दिया है।”
किशन बचपन से ही सबका दुलारा था।
वो अपने आस-पास की हर चीज़ से जल्दी जुड़ जाता।
बहनों के साथ खेलता, उनकी फ्रॉक पहनकर आईने में खुद को देख खुश होता।
रमा हँसकर कहती — “अरे बेटा, ये लड़कियों वाला खेल है।”
किशन मासूमियत से कहता — “माँ, मुझे अच्छा लगता है।”
रमा इसे बच्चों की नादानी समझकर टाल देती, लेकिन जब किशन बड़ा होने लगा तो वही बातें उसकी आदत बन गईं।
किशन के हावभाव, चलने-बोलने का तरीका, सब कुछ लड़कियों जैसा हो गया था।
मोहल्ले के लोग फुसफुसाने लगे —
“महावीर का बेटा कुछ ठीक नहीं लगता।”
“अरे, वो लड़कियों जैसी बातें करता है।”
रमा हर ताने के साथ चुप रह जाती, पर भीतर से घुटती थी।
वो जानती थी, उसका बेटा अलग है, लेकिन गलत नहीं।
कॉलेज के दिनों में किशन की ज़िंदगी ने नया मोड़ लिया।
वो पढ़ाई में अच्छा था, सबका प्रिय छात्र था।
लेकिन जब उसकी दोस्ती रवि नाम के लड़के से हुई, तो सबकी नज़रें उन पर ठहरने लगीं।
दोनों हर वक़्त साथ रहते।
रमा खुश होती कि बेटा अच्छे दोस्तों के साथ है, लेकिन महावीर को यह बात खटकती थी।
“हर वक़्त उसी रवि के साथ रहता है। अब कोई लड़की नहीं दिखती इसकी ज़िंदगी में,” महावीर बुदबुदाते।
फिर वो दिन आया — वैलेंटाइन डे।
कॉलेज में सबने अपने-अपने तरीक़े से प्यार का इज़हार किया।
लेकिन जब किशन ने पूरे कॉलेज के सामने रवि को गुलाब देकर गले लगाया और चुंबन ले लिया — तो सब थम गया।
किसी को यक़ीन नहीं हुआ कि महावीर सिंह का बेटा ये कर सकता है।
कुछ ही घंटों में बात घर तक पहुँच गई।
लोगों ने ताने मारने शुरू कर दिए —
“इतने सालों में एक बेटा हुआ, वो भी…”
बात अधूरी छोड़ दी जाती, पर ज़हर पूरा पहुँच जाता।
घर पहुँचा तो तूफ़ान तैयार था।
महावीर सिंह दरवाज़े पर खड़े थे, आँखों में आग और हाथों में बेल्ट।
“किशन! ये क्या सुन रहा हूँ मैं?”
रमा बीच में आई — “सुनो तो पहले—”
“चुप रहो! तुम्हारी परवरिश का नतीजा है ये सब!”
किशन सामने खड़ा था, काँपते होंठों से बोला —
“पापा, मुझे नहीं पता ये सब कब हुआ, कैसे हुआ, पर मैं अपने ही शरीर में अजनबी महसूस करता हूँ। मुझे लड़कियों की तरह रहना अच्छा लगता है।”
महावीर का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
“क्या बकवास है ये?”
“पापा, ये बकवास नहीं, मेरी सच्चाई है। अगर आप लोगों को लगता है मैं आपके नाम पर बट्टा लगा रहा हूँ, तो मैं यहाँ से चला जाऊँगा। पर मैं जैसा हूँ, वैसा ही रहूँगा।”
महावीर ने उसे थप्पड़ मारा —
“मर जाऊँ मैं, इससे पहले कि लोग मेरा मुँह देखें! लड़के होकर लड़कियों जैसे कपड़े पहनता है! हमारे खानदान की नाक कटवा दी तूने!”
किशन बिना कुछ बोले कमरे में चला गया।
रमा उसके पीछे गई —
“बेटा, तू गुस्से में कुछ मत कर।”
किशन ने धीरे से कहा —
“माँ, अब यहाँ रहना मुश्किल है। मैं नहीं चाहता कि मेरी वजह से आपको और अपमान झेलना पड़े।”
रमा की आँखों में आँसू थे, लेकिन शब्द नहीं निकल रहे थे।
कुछ ही देर बाद किशन एक छोटा बैग लेकर निकल गया।
दरवाज़े पर खड़ी रमा उसे जाते हुए देखती रही —
उसकी रग-रग ममता चीत्कार कर रही थी — “रुक जा, बेटा!”
पर होंठ कुछ न कह सके।
किशन के जाने के बाद घर सूना हो गया।
महावीर सिंह कुछ दिन तक बाहर निकलना बंद कर दिए।
लोगों की नज़रें उन्हें चुभतीं।
रमा अब भी हर सुबह बेटे की तस्वीर के आगे दीपक जलाती और चुपचाप रो लेती।
कभी-कभी उसे लगता, काश उसने उसी दिन हिम्मत की होती, बेटे का हाथ थाम लिया होता।
धीरे-धीरे तीन महीने गुजर गए।
एक दिन दरवाज़े पर दस्तक हुई।
रमा ने दरवाज़ा खोला — सामने किशन खड़ा था।
लंबे बाल, सलीके से साड़ी पहने हुए, चेहरा आत्मविश्वास से भरा।
“माँ…” उसने कहा।
रमा का गला भर आया।
“तू… तू वापस आ गया?”
“हाँ माँ, अब मैं अपने आप से भागना छोड़ चुका हूँ। मैं वही हूँ जो हमेशा से था। अब मैं खुद से नफरत नहीं करता।”
महावीर पीछे से निकले।
उनका चेहरा गुस्से और शर्म के बीच कहीं अटका था।
“ये कौन तमाशा है?”
किशन शांत स्वर में बोला —
“पापा, अब तमाशा नहीं, सच्चाई है। मैं आपकी उम्मीदों पर नहीं, अपनी सच्चाई पर जिंदा रहना चाहता हूँ।”
महावीर कुछ पल उसे घूरते रहे, फिर चुपचाप अंदर चले गए।
रमा ने बेटे का हाथ थामा —
“बेटा, दुनिया को समझने में वक़्त लगेगा, पर तू मत डर। मुझे तुझ पर गर्व है।”
किशन ने माँ को गले लगाया —
“माँ, बस यही चाहिए था मुझे।”
उस रात रमा देर तक छत पर बैठी रही।
आसमान में तारे टिमटिमा रहे थे।
वो सोच रही थी — कितना आसान होता है किसी को ठुकरा देना, पर कितना मुश्किल होता है उसे स्वीकार करना जैसे वो है।
नीचे कमरे में किशन माँ की साड़ी धो रहा था, और महावीर सिंह खिड़की से देख रहे थे।
पहली बार उनके चेहरे पर नफरत नहीं, उलझन थी।
वो सोच रहे थे — शायद बेटा सच में गलत नहीं, बस अलग है।
धीरे-धीरे समय बदलेगा, समाज बदलेगा —
पर रमा का दिल पहले ही बदल चुका था।
वो अब जान चुकी थी —
माँ का प्यार किसी भी पहचान से बड़ा होता है।
रश्मि प्रकाश
0 टिप्पणियाँ