बहू भुनभुना रही थी .....
" सारी जिम्मेदारी मेरे सर पर डाल दी...
सारे काम मेरे जिम्मे... दो मिनट की शांति नही.....
आजादी नही...... कैद हो कर रह गयी हूँ इस पिंजरे मे...
वो दालान में टंगे तोते के पिंजरे की तरफ़ देख बड़बड़ा रही थी
बुआ सब समझ रही थी.....
नई बहू को ससुराल में फर्क उसकी आजादी का लग रहा था शायद
घर के उस पिंजरे में एक तोती सालों रहती थी..
उसे जो भी खिलाया सिखाया जाता वही दिन भर खाती बोलती ...ऐसे घर मे रौनक सी बनी रहती...
बुआ ने बहु को बुलाया और बोली
'बिटिया देख तुझे एक मजे की बात दिखाती हूं...
उन्होंने पिंजरे का दरवाजा खोला तोती बाहर आ कर इधर उधर भागने दौड़ने चहकने लगी...
बहू की आँखों मे आश्चर्य भाव था कि वो ... उड़ी क्यूँ नही...
उसके बाद जो हुआ उसे देख कर बहू की आँखें दूसरी बार आश्चर्य से फैल गयी... ..
पंद्रह बीस मिनट बाद तोती खुद ही पिंजरे में चली गयी और दरवाज़ा नीचे खींच कर बन्द कर लिया...
बुआ ने फ़िर से तोती को बाहर निकाला और तोती फ़िर से बाहर निकली मीठी मीठी बोली बोलती ज़मीन पर चक्कर मारने लगी...
बहू की आँखें तीसरी बार आश्चर्य से फ़ैल गईं जब उसने देखा कि तोती की मीठी बोली अचानक बदहवास तेज़ चीख पुकार में बदल चुकी थी और वो पागलों की तरह पिंजरे को ढूढ़ रही थी ....
जिसे बुआ ने छुपा दिया था...
बुआ ने देखा...
बहू तोती के घर को (पिंजरे को ) उसके पास रख रही थी...
शायद अब घर ....अपना घर क्या होता है उसे समझ आ गया था .....
अनिल जैन
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