क्यो

 "बाबूजी आप इतने बड़े मकान में अकेले रहते हैं? मैंने 72 साल के उन वृद्ध सज्जन से प्रश्न पूछा।

वृद्ध ने अपनी आंखों से चश्मा उतार कर, रूमाल से माथा पोंछा, फिर ड्राइंगरुम की कुर्सी पर मुझे बैठने का इशारा किया। वे अन्दर गये, फ्रिज से ठंडे पानी की बोतल और एक गिलास लेकर आये। मुझे पानी देकर बोले-सुनो बेटा, तुमसे पार्क में भेंट हो गई, मन मिल गया, इसीलिए तुम्हे घर साथ लाया हूं। तुमसे बातें करके मन कुछ हल्का हो जायगा। देखो बेटा मैं पुरातत्व विभाग का रिटायर्ड हैड-क्लर्क हूं। बड़ी तमन्ना थी कि बच्चों को पढ़ा लिखाकर इंजीनियर और डाक्टर बनाऊंगा। परमात्मा ने मेरी हसरत पूरी कर दी। एक बेटा डाक्टर,एक बेटा इंजीनियर और एक बेटा प्रोफेसर बन गया। तीनों बेटे अलग- अलग अपने-अपने घऱों में,अपनी अपनी फैमिली के साथ रहते हैं। सभी सुखी और सम्पन्न हैं।

वृद्ध सज्जन ने एक लम्बी सांस खींची और फिर बोले-मैं उन्हे अपनी पूरी पेंशन देने को तैयार हूं, किन्तु तीनों में से कोई भी मुझे अपने साथ रखना नहीं चाहता। तीनों बेटों के लम्बे चौड़े घरों में इस बूढ़े बाप के लिए रहने के लिये जगह नहीं, लिहाजा इस लम्बे चौडे मकान में निपट अकेला ही रहता हूं। पिछले वर्ष तक पत्नी जीवित थी। मन लगा रहता था। अब अकेला पन अखरता है ‌।

कुछ देर तक रुककर उन्होंने मुझसे पूछा-बताओ बेटा, बच्चों के लिए सपने देखना और उन सपनों को पूरा करने के लिए जिन्दगी खपा देने के बाबजूद ऐसा क्यों है?

कुछ देर सोचने के बाद मैंने उन वृद्ध सज्जन से प्रश्न किया-बाबूजी क्या आपने अपने माता-पिता को वृद्धावस्था में अपने साथ रखा था?

मेरा प्रश्न सुनकर वे चौंके और आंखें झुकाकर मौन रह गये। शायद उन्हें अपने "क्यों?" का उत्तर मिल गया था।।

अनिल जैन


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