अनिल..... मुझे लगता है मां को अब यही ले आना चाहिए...
ऐसे बीमार ...उनका अकेले रहना मुझे ....
मुझे बहुत चिंता रहती है ...सुधा ने अपने पति अनिल से कहा...
हां...उनका ऐसे अकेले ...ऊपर से बीमार रहना ...चिंता तो मुझे भी होती है उनकी ...मगर क्या वो यहां आकर रहेगी अपनी बेटी के पास, अनिल ने कुछ आशंकित भाव से सुधा की और देखते हुए पूछा...
याद नही पिछली बार जब पापा का अचानक चले जाने पर मैंने और तुमने यहां उनके मन बहलाने को कहा था तो उन्होंने साफ इंकार कर दिया था....
और वैसे भी अगर वो यहां आ भी जाएगी तो रहेगी कहा..... जानती हो ना टू बेडरूम सेट के कमरे में रहते है हम ....ऐसे मे कैसे मैनेज ....आइ मीन टू से.....
दूसरे कमरे मे अपने भगवान की पूजा करते हुए सुषमा जी बेटे बहु की बातें साफ साफ सुन रही थी ...तुरंत खडी हुई और अनिल और सुधा के कमरे के दरवाजे पर पहुंचकर बोली - मीन वीन कुछ नही .....बहु तुम कल ही गांव चलने की तैयारी करो ...मै चलूंगी तुम्हारे साथ , और उन्हें लेकर ही आएंगे, और बात जगह की नही होती ...मन मे रहने की होती है एक प्यार एक सम्मान की होती है ...चिंता और देखभाल की होती है ....
माना हमारा घर छोटा है टू बेडरूम ....बेटा एक कमरे में तुम दोनों रहना और दूसरे मे ...मै और समधन जी .....
इस घर मे जहां अनिल की मां का हक है उतना ही मेरी बहु की मां का भी है ....जैसे ही सुषमा जी ने अपनी बात समाप्त की अनिल और सुधा मां के पैरों मे भीगी पलकें लिए झुक गए....
अनिल जैन
0 टिप्पणियाँ