सुबह से उनके घर में बहुत रौनक थी....और क्यों ना हो ....
उनकी इकलौती बिटिया के विवाह के शुभावसर पर शाम को मेंहदी और संगीत का कार्यक्रम होना था
समय पर सब महिलाएं सजधज कर ढोलक की थाप पर नृत्य और चुलहबाजी कर रही थी ....
वेदिका यानि उनकी पुत्रवधू खूब चोटी लहरा कर नाच रही थी...
वहाँ उपस्थित सभी महिलाएं मंत्रमुग्ध थी कि अचानक जोर से चटाक की आवाज पर सब चौंक गई....
जैसे तुरंत कर्फ्यू सा लग गया... रौनकदार महफिल आनन फानन में बर्खास्त हो गई...
उनका बेटा आमोद नशे में झूमता आया था और अपनी खूबसूरत पत्नी को नाचते देख कर आपा खो बैठा था...
लेकिन अगली सुबह सब नार्मल था...
बहू वेदिका हँस हँस कर सबको चाय नाश्ता करवा रही थी.....
रिश्ते की बुआजी को कुछ मज़ा नही आया...
रात की घटना का कुछ और चटकारा चाह रही थी...
कुछ चूरन चटनी तो और होना चाहिए...."हाय ....हाय
जरा देखो तो...ढिठाई की हद है.. सबके सामने चाँटा खाकर भी इस बेहया पर कोई असर ही नही है.... कैसी आँखें मटकाती घूम रही है... हद है....
दूसरी बुआ भी जो भाई भाभी के वैभव से जली भुनी रहती हैं.... उन्हें भाभी की फटी चादर में टाँग फसाने में बहुत ठण्डक महसूस हो रही थी..."हाँ जिज्जी....
तुम ठीक कह रही हो, सुना है किसी गरीब घर की लड़की है... वर्ना तो.."
अचानक उनको आते देख कर वो रुक गई पर तीर छोड़ना नही भूली," इन मिडिल क्लास लड़कियों का कोई आत्मसम्मान तो होता नही है, बस पैसे की चमक पर मर मिटती हैं।"
वो तड़प उठी और विनम्र स्वर में बोली,"दिदिया, आप सही हैं... हमारी बहू मिडिल क्लास परिवार से आई है पर अब वो हमारे घर की इज्जत है... पर हम बड़े लोग इस इज्जत का मान नही कर पाऐ पर वो हमारी इज्जत का मान रख रही है.... दूसरी बात...शर्मिंदा तो हमें और आमोद को होना चाहिए ...जिसने गलती की है ..वो शर्मसार होगा...हमारी वेदिका क्यों और किस बात के लिए शर्मिंदा हो?"
आवेश में वो काँपने लगी...तुरंत वेदिका आगे आई,"मम्मी जी! आपका व्रत है, बेकार में तबीयत खराब होगी, ये नीबू पानी पी लीजिए।"
फिर बुआजी की ओर मुखातिब होकर बोली," ऐसा नही है कि मुझे खराब नही लगता पर हर वक्त तलवार तानने से भी तो काम नही चलता... घर तोड़ लेना बहुत आसान है... जोड़ना बहुत मुश्किल.... मैं बहुत आसानी से ये सब छोड़ कर जा सकती हूँ...पर बाहर भी ताक लगाए भेडिये बैठे हैं... यहाँ मम्मी पापा जी के साथ सुरक्षित तो हूँ...और आमोद जी एक बहुत अच्छे पर थोड़े कमजोर इंसान है.... कभी कभी गलती उनसे हो जाती है पर फिर प्यार दुलार भी तो वोही करते हैं।"
तब तक मीरा आकर बोल गई.... पापा बुला रहे हैं... तो वो कमरे में जाते जाते कहने लगी," मैं अपनी इस गुड़िया को कोई गलत संस्कार नही देना चाहती... इसके पापा की जान इसमें बसी है... मैं अपनी फूल सी बच्ची के सिर पर से बाप की छत्रछाया नही हटा सकती। बुआ जी ,ये मेरे मिडिल क्लास संस्कार हैं और इन्हीं संस्कारों ने मुझे ये विश्वास भी दिया है कि जल्दी ही सब ठीक हो जाऐगा....
अनिल जैन
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